नीट परीक्षा में कथित पेपर लीक और परीक्षा प्रणाली में गड़बड़ियों को लेकर देशभर में जारी विरोध-प्रदर्शनों के बीच लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने केंद्र सरकार पर तीखा हमला बोला है। प्रधानमंत्री आवास के बाहर प्रदर्शन के बाद हिरासत में लिए जाने के बावजूद राहुल गांधी ने कहा कि छात्रों की आवाज को दबाया नहीं जा सकता। उन्होंने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें रखते हुए शिक्षा व्यवस्था में जवाबदेही तय करने की जरूरत बताई।
राहुल गांधी ने कहा कि यह मुद्दा केवल एक परीक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि करोड़ों युवाओं के भविष्य, उनके सपनों और देश की शिक्षा व्यवस्था की विश्वसनीयता से जुड़ा हुआ है। उनके मुताबिक, जब छात्र महीनों और वर्षों तक कठिन मेहनत करने के बाद परीक्षा देते हैं और बाद में उन्हें पेपर लीक या परीक्षा में अनियमितताओं की खबर मिलती है, तो उनका भरोसा पूरी व्यवस्था से उठ जाता है।
उन्होंने कहा कि देश के अलग-अलग हिस्सों से हजारों छात्र अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से प्रदर्शन कर रहे हैं, लेकिन उनके साथ जिस तरह का व्यवहार किया गया, वह लोकतांत्रिक मूल्यों के खिलाफ है। राहुल गांधी के अनुसार, छात्रों को अपनी बात रखने का पूरा अधिकार है और उनकी आवाज सुनने के बजाय उन पर सख्ती करना किसी भी लोकतांत्रिक सरकार के लिए उचित नहीं माना जा सकता।
राहुल गांधी ने सवाल उठाया कि आखिर छात्र ऐसा कौन-सा अपराध कर रहे हैं जिसके कारण उनके सामने सुरक्षा बल तैनात किए जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि ये युवा केवल निष्पक्ष परीक्षा प्रणाली और अपने भविष्य की सुरक्षा की मांग कर रहे हैं। अगर कोई छात्र मेहनत करके परीक्षा देता है और बाद में उसे दोबारा उसी प्रक्रिया से गुजरना पड़े, तो यह उसके साथ अन्याय है।
उन्होंने यह भी कहा कि परीक्षा में गड़बड़ियों का सबसे बड़ा असर छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर पड़ता है। लंबे समय तक तैयारी, प्रतियोगिता का दबाव और भविष्य की चिंता पहले ही युवाओं को तनाव में रखती है। ऐसे में जब परीक्षा की निष्पक्षता पर सवाल खड़े होते हैं, तो कई छात्रों का मनोबल टूट जाता है। राहुल गांधी ने दावा किया कि ऐसी परिस्थितियों में कुछ छात्रों ने आत्महत्या जैसा कठोर कदम भी उठाया है, जो बेहद चिंताजनक है।
अपने बयान में राहुल गांधी ने परीक्षा की तैयारी में होने वाले आर्थिक खर्च का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि देशभर के परिवार अपने बच्चों को मेडिकल प्रवेश परीक्षा की तैयारी कराने के लिए बड़ी रकम खर्च करते हैं। कोचिंग, किताबें, हॉस्टल, यात्रा और परीक्षा से जुड़े अन्य खर्चों को जोड़ने पर हर साल परिवारों द्वारा खर्च की जाने वाली कुल राशि लगभग 1.32 लाख करोड़ रुपये तक पहुंच जाती है। उन्होंने इसकी तुलना केंद्र सरकार के शिक्षा बजट से करते हुए कहा कि शिक्षा पर सरकार जितना खर्च करती है, लगभग उतनी ही राशि परिवार अपने स्तर पर खर्च करने को मजबूर हैं।
राहुल गांधी ने कहा कि जब परिवार अपनी मेहनत की कमाई बच्चों की पढ़ाई पर लगाते हैं और बदले में उन्हें पेपर लीक जैसी घटनाएं देखने को मिलती हैं, तो यह उनके साथ अन्याय है। उन्होंने आरोप लगाया कि व्यवस्था की कमजोरियों का खामियाजा सीधे छात्रों और उनके परिवारों को भुगतना पड़ रहा है।
इस दौरान राहुल गांधी ने सरकार के सामने तीन प्रमुख मांगें भी रखीं। पहली मांग शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान को लेकर थी। राहुल गांधी का कहना था कि लगातार सामने आ रही परीक्षा संबंधी गड़बड़ियों के कारण शिक्षा मंत्रालय अपनी जिम्मेदारी निभाने में विफल रहा है। उनके अनुसार, यदि किसी विभाग में लगातार ऐसी घटनाएं हो रही हैं, तो उसके लिए राजनीतिक जवाबदेही तय होनी चाहिए। इसी आधार पर उन्होंने शिक्षा मंत्री को पद से हटाने की मांग दोहराई।
दूसरी मांग उन अधिकारियों और कर्मियों के खिलाफ कार्रवाई को लेकर थी, जिन्होंने प्रदर्शन कर रहे छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग किया या ऐसा करने के आदेश दिए। राहुल गांधी ने कहा कि शांतिपूर्ण विरोध प्रदर्शन लोकतंत्र का अभिन्न हिस्सा है। यदि किसी छात्र के साथ मारपीट हुई है या उसके अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, तो इसकी निष्पक्ष जांच कर जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई होनी चाहिए। उन्होंने कहा कि कानून सभी के लिए समान होना चाहिए और किसी भी स्तर पर जवाबदेही से बचने की अनुमति नहीं दी जानी चाहिए।
तीसरी मांग प्रधानमंत्री से जुड़ी थी। राहुल गांधी ने कहा कि देश के सर्वोच्च नेतृत्व को इस पूरे घटनाक्रम की नैतिक जिम्मेदारी स्वीकार करनी चाहिए। उनके मुताबिक, जिन लाखों छात्रों का भविष्य प्रभावित हुआ है, उनके प्रति संवेदनशीलता दिखाते हुए सरकार को उनसे सार्वजनिक रूप से माफी मांगनी चाहिए। उन्होंने कहा कि इससे छात्रों के बीच यह संदेश जाएगा कि सरकार उनकी पीड़ा को समझती है और उनकी चिंताओं को गंभीरता से ले रही है।
राहुल गांधी ने दावा किया कि पिछले एक दशक के दौरान विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में पेपर लीक की घटनाएं बार-बार सामने आई हैं। उन्होंने कहा कि यदि इन घटनाओं का रिकॉर्ड देखा जाए तो बड़ी संख्या में परीक्षाएं प्रभावित हुई हैं, जिससे लाखों अभ्यर्थियों को दोबारा तैयारी करनी पड़ी। उनका कहना था कि ऐसी स्थिति में केवल जांच या बयान पर्याप्त नहीं हैं, बल्कि परीक्षा प्रणाली में व्यापक सुधार की जरूरत है।
उन्होंने कहा कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसका युवा वर्ग है और यदि युवाओं का विश्वास शिक्षा व्यवस्था से उठ गया, तो इसका असर पूरे देश के भविष्य पर पड़ेगा। उनके अनुसार, देश की परीक्षा प्रणाली ऐसी होनी चाहिए, जिसमें पारदर्शिता, निष्पक्षता और जवाबदेही स्पष्ट रूप से दिखाई दे।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि सरकार को छात्रों की मांगों को राजनीतिक नजरिए से देखने के बजाय उन्हें एक गंभीर सामाजिक मुद्दे के रूप में लेना चाहिए। उन्होंने कहा कि लाखों छात्र केवल निष्पक्ष अवसर चाहते हैं और उनकी मांग किसी राजनीतिक दल के समर्थन या विरोध से जुड़ी नहीं है। इसलिए सरकार को उनके साथ संवाद स्थापित कर जल्द समाधान निकालना चाहिए।
उन्होंने छात्रों के आंदोलन का खुलकर समर्थन करते हुए कहा कि जो युवा अपने भविष्य की रक्षा के लिए सड़कों पर उतर रहे हैं, वे लोकतांत्रिक अधिकारों का इस्तेमाल कर रहे हैं। ऐसे में उनकी बात सुनी जानी चाहिए, न कि उन्हें डराने या रोकने की कोशिश की जानी चाहिए।
राहुल गांधी ने यह भी कहा कि यदि परीक्षा प्रणाली में समय रहते सुधार नहीं किए गए तो भविष्य में भी ऐसी घटनाएं दोहराई जा सकती हैं। उन्होंने सुझाव दिया कि परीक्षा आयोजित करने वाली एजेंसियों की कार्यप्रणाली की समीक्षा की जाए, सुरक्षा व्यवस्था को और मजबूत बनाया जाए तथा दोषियों के खिलाफ त्वरित और सख्त कार्रवाई सुनिश्चित की जाए ताकि छात्रों का भरोसा फिर से बहाल हो सके।
अपने संबोधन के अंत में राहुल गांधी ने दोहराया कि कांग्रेस पार्टी छात्रों की मांगों के साथ खड़ी है और शिक्षा व्यवस्था में पारदर्शिता लाने के लिए लगातार आवाज उठाती रहेगी। उन्होंने कहा कि युवाओं का भविष्य किसी भी देश की सबसे बड़ी पूंजी होता है और उसे सुरक्षित रखना सरकार की पहली जिम्मेदारी है। उनके अनुसार, जब तक छात्रों को निष्पक्ष परीक्षा और न्यायपूर्ण व्यवस्था का भरोसा नहीं मिलेगा, तब तक ऐसे मुद्दों पर संघर्ष जारी रहेगा।