दिल्ली में 20 जुलाई को हुए NEET पेपर लीक विरोध प्रदर्शन के दौरान पुलिस और सुरक्षाबलों की कार्रवाई को लेकर उठे विवाद के बीच केंद्रीय रिजर्व पुलिस बल (CRPF) ने अपनी ओर से स्थिति स्पष्ट की है। प्रदर्शन के दौरान पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर कई तरह के सवाल खड़े किए गए थे और सोशल मीडिया से लेकर राजनीतिक गलियारों तक इस मुद्दे पर बहस छिड़ गई थी। अब CRPF की आंतरिक समीक्षा रिपोर्ट में कहा गया है कि उस दिन की गई कार्रवाई पूरी तरह निर्धारित प्रक्रियाओं और स्टैंडर्ड ऑपरेटिंग प्रोसीजर (SOPs) के अनुसार की गई थी।
रिपोर्ट के अनुसार, दंगा-रोधी बल रैपिड एक्शन फोर्स (RAF) ने भीड़ को नियंत्रित करने के लिए किसी भी प्रकार का बल प्रयोग अचानक या बिना अनुमति के नहीं किया। बल प्रयोग का प्रत्येक चरण निर्धारित नियमों के अनुसार अपनाया गया और पैलेट गन का इस्तेमाल अंतिम विकल्प के रूप में किया गया, जब अन्य सभी उपाय प्रभावी साबित नहीं हुए।
पहले अपनाए गए सामान्य उपाय
CRPF से जुड़े सूत्रों के अनुसार, प्रदर्शनकारियों को नियंत्रित करने के लिए शुरुआत में सार्वजनिक घोषणाओं के माध्यम से उन्हें हटने की अपील की गई। इसके बाद भीड़ को शांत करने के लिए आंसू गैस के गोले छोड़े गए और आवश्यकता पड़ने पर सीमित लाठीचार्ज भी किया गया। जब इन सभी उपायों के बावजूद स्थिति नियंत्रण से बाहर बनी रही और सुरक्षाबलों पर हमले जारी रहे, तब अधिकृत अधिकारियों की अनुमति मिलने के बाद पंप-एक्शन गन का इस्तेमाल किया गया।
अधिकारियों का कहना है कि यह हथियार गैर-घातक श्रेणी में आता है और इसका उद्देश्य केवल भीड़ को तितर-बितर करना होता है, न कि गंभीर शारीरिक नुकसान पहुंचाना। समीक्षा रिपोर्ट में यह भी कहा गया कि इस कार्रवाई के दौरान बल प्रयोग की तय क्रमबद्ध प्रक्रिया का पूरी तरह पालन किया गया।
प्रदर्शन के दौरान दोनों पक्षों को लगी चोटें
रिपोर्ट में बताया गया कि पैलेट गन के इस्तेमाल से तीन से पांच प्रदर्शनकारियों के घायल होने की जानकारी सामने आई है। दूसरी ओर, सुरक्षाबलों को भी काफी नुकसान झेलना पड़ा। RAF के कुल 47 जवान इस झड़प में घायल हुए, जिनमें छह कर्मियों के सिर पर गंभीर चोटें आईं।
सूत्रों का कहना है कि कुछ प्रदर्शनकारी अत्यधिक आक्रामक हो गए थे और उन्होंने पुलिस व RAF के जवानों पर पथराव किया। कुछ स्थानों पर लोहे की रेलिंग तक उखाड़कर सुरक्षाकर्मियों पर फेंकी गई, जिससे कई जवान घायल हुए। इसी कारण हालात तेजी से बिगड़ते चले गए और अतिरिक्त बल प्रयोग की आवश्यकता महसूस की गई।
DG जी.पी. सिंह ने क्या कहा
CRPF के महानिदेशक जी.पी. सिंह ने इस पूरे मामले पर सीमित प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि यह विषय फिलहाल न्यायालय के विचाराधीन है। इसलिए बल की ओर से तैयार की गई समीक्षा और उससे जुड़े सभी तथ्य उचित समय पर सुप्रीम कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत किए जाएंगे।
उन्होंने सार्वजनिक रूप से विस्तृत टिप्पणी करने से परहेज किया, लेकिन संकेत दिया कि फोर्स ने उपलब्ध नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं के अनुरूप ही कार्रवाई की है।
दिल्ली पुलिस की मंजूरी का भी उल्लेख
RAF से जुड़े अधिकारियों ने बताया कि दिल्ली में किसी भी बड़े विरोध प्रदर्शन के दौरान दंगा-रोधी उपकरणों का इस्तेमाल संबंधित पुलिस अधिकारियों की मंजूरी के बाद ही किया जाता है। इस मामले में भी दिल्ली पुलिस की ओर से आवश्यक स्वीकृति मिलने के बाद ही आगे की कार्रवाई की गई थी।
सूत्रों के अनुसार, प्रदर्शन स्थल के प्रभारी अधिकारी की अनुमति के बिना RAF किसी भी विशेष दंगा-रोधी हथियार का उपयोग नहीं करती। प्रत्येक आदेश लिखित रूप में जारी किया जाता है और निर्धारित प्रारूप का पालन किया जाता है। अधिकारियों ने यह भी स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में केवल मौखिक निर्देशों के आधार पर कार्रवाई नहीं की जाती।
डायरी एंट्री को लेकर भी जांच
इसी बीच संसद मार्ग पुलिस स्टेशन से जुड़ी एक कथित बैक-डेटेड डायरी एंट्री सामने आने के बाद नया विवाद खड़ा हो गया। इस दस्तावेज में दावा किया गया कि एक वरिष्ठ पुलिस अधिकारी के निर्देश पर RAF के डिप्टी कमांडर ने प्रदर्शनकारियों पर पैलेट गन का इस्तेमाल किया था।
दिल्ली पुलिस फिलहाल इस डायरी एंट्री की सत्यता और उसके रिकॉर्ड से जुड़े सभी पहलुओं की जांच कर रही है। जांच का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि संबंधित दस्तावेज किस परिस्थिति में तैयार किया गया और क्या उसमें दर्ज विवरण वास्तविक घटनाक्रम से मेल खाते हैं।
कानून क्या कहता है
भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) के प्रावधानों के अनुसार यदि कोई भीड़ गैर-कानूनी घोषित हो जाती है और उसके कारण सार्वजनिक व्यवस्था गंभीर रूप से प्रभावित होती है, तो कार्यकारी मजिस्ट्रेट आवश्यक परिस्थितियों में बल प्रयोग की अनुमति दे सकता है।
दिल्ली में यह अधिकार पुलिस आयुक्त के पास होता है, जिसे आवश्यकता पड़ने पर अधीनस्थ अधिकारियों तक भी सौंपा जा सकता है। इसी कानूनी व्यवस्था के तहत भीड़ नियंत्रण के दौरान अलग-अलग स्तर पर निर्णय लिए जाते हैं।
अधिकारियों का कहना है कि किसी भी कार्रवाई से पहले स्थिति का मूल्यांकन किया जाता है और केवल आवश्यकता होने पर ही अधिक कठोर उपाय अपनाए जाते हैं।
गैर-घातक हथियार के रूप में पैलेट गन
CRPF के अधिकारियों ने दोहराया कि पंप-एक्शन गन को गैर-घातक भीड़ नियंत्रण उपकरण माना जाता है। इसका उद्देश्य लोगों की जान लेना नहीं बल्कि हिंसक भीड़ को नियंत्रित करना होता है।
बल के अधिकारियों का कहना है कि ऐसे हथियारों का उपयोग केवल तब किया जाता है जब निर्धारित फोर्स ग्रेडिएंट के अनुसार पहले अपनाए गए सभी विकल्प विफल हो जाएं। इसके लिए सक्षम अधिकारी की स्वीकृति अनिवार्य होती है और प्रत्येक कार्रवाई का रिकॉर्ड भी तैयार किया जाता है।
पहले भी अदालतों में पहुंच चुका है मामला
पैलेट गन के इस्तेमाल को लेकर पहले भी न्यायालयों में बहस हो चुकी है। वर्ष 2016 में जम्मू-कश्मीर हाई कोर्ट ने इस विषय पर दायर एक जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए कहा था कि यदि भीड़ हिंसक हो जाए और कानून-व्यवस्था को गंभीर चुनौती दे, तो सुरक्षा एजेंसियों को उचित सीमा में बल प्रयोग करने का अधिकार है।
बाद में इस फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई थी, लेकिन सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज कर दी। अदालत ने उस समय यह माना था कि संबंधित परिस्थितियों में सुरक्षा एजेंसियों द्वारा पैलेट गन के इस्तेमाल पर पूर्ण प्रतिबंध लगाने का कोई आधार नहीं है।
विरोध प्रदर्शन के बाद बढ़ा राजनीतिक विवाद
20 जुलाई की घटना के बाद विपक्षी दलों और कई सामाजिक संगठनों ने प्रदर्शनकारियों पर बल प्रयोग को लेकर सरकार और सुरक्षा एजेंसियों पर सवाल उठाए थे। कई वीडियो और तस्वीरें सामने आने के बाद यह मुद्दा राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन गया।
वहीं दूसरी ओर सुरक्षा एजेंसियों का कहना है कि केवल वीडियो के छोटे हिस्सों के आधार पर पूरी घटना का आकलन नहीं किया जा सकता। उनका दावा है कि मौके पर मौजूद जवानों को लगातार हमलों का सामना करना पड़ा और हालात तेजी से बिगड़ने के कारण चरणबद्ध तरीके से कार्रवाई करनी पड़ी।
आगे क्या होगा
चूंकि मामला अब न्यायालय के समक्ष विचाराधीन है, इसलिए इस पूरे घटनाक्रम पर अंतिम निष्कर्ष अदालत की प्रक्रिया पूरी होने के बाद ही सामने आएगा। CRPF का कहना है कि उसकी समीक्षा रिपोर्ट और संबंधित रिकॉर्ड न्यायालय को उपलब्ध कराए जाएंगे।
फिलहाल एजेंसियां इस बात पर कायम हैं कि 20 जुलाई की कार्रवाई के दौरान लागू सभी SOPs, दंगा-रोधी नियमों और कानूनी प्रक्रियाओं का पालन किया गया था। वहीं दूसरी ओर, इस कार्रवाई की वैधता और परिस्थितियों को लेकर चल रही जांच तथा न्यायिक प्रक्रिया आने वाले समय में पूरे मामले की तस्वीर और अधिक स्पष्ट करेगी।