भारत की मेजबानी में नई दिल्ली में हो रहा 18वां BRICS शिखर सम्मेलन इस बार सिर्फ आर्थिक सहयोग और वैश्विक दक्षिण की आवाज तक सीमित नहीं रहने वाला है। पश्चिम एशिया में जारी तनाव, ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ती सैन्य तनातनी तथा बदलती वैश्विक राजनीति ने इस बैठक का महत्व और बढ़ा दिया है। भले ही अमेरिका BRICS का हिस्सा नहीं है, लेकिन अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की नीतियों और ईरान को लेकर वॉशिंगटन के रुख का असर इस सम्मेलन की चर्चाओं और संभावित साझा बयान पर पड़ने की संभावना जताई जा रही है।
दिल्ली में हो रही इस बैठक में BRICS के प्रमुख सदस्य देशों के नेता और प्रतिनिधि हिस्सा ले रहे हैं। भारत के साथ चीन, रूस, ब्राजील, दक्षिण अफ्रीका, संयुक्त अरब अमीरात और ईरान इस समूह का हिस्सा हैं। वहीं सऊदी अरब को आमंत्रित सदस्य के तौर पर सम्मेलन में शामिल किया गया है। ऐसे समय में जब पश्चिम एशिया में सैन्य तनाव लगातार अंतरराष्ट्रीय राजनीति को प्रभावित कर रहा है, BRICS देशों की बैठक पर दुनिया की निगाहें टिकी हुई हैं।
ईरान संकट ने बढ़ाई सम्मेलन की अहमियत
इस BRICS बैठक की सबसे बड़ी चुनौती पश्चिम एशिया में पैदा हुआ मौजूदा संकट माना जा रहा है। अमेरिका और इजरायल की ओर से 28 फरवरी से ईरान को निशाना बनाए जाने के बाद क्षेत्रीय तनाव काफी बढ़ गया है। इसके जवाब में ईरान ने भी खाड़ी क्षेत्र में अमेरिकी सैन्य ठिकानों को निशाना बनाया है। इसके अलावा होर्मुज जलडमरूमध्य को लेकर पैदा हुई स्थिति ने वैश्विक स्तर पर चिंता बढ़ा दी है।
होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण ऊर्जा मार्गों में शामिल है। यहां किसी भी तरह का गंभीर व्यवधान अंतरराष्ट्रीय तेल आपूर्ति और वैश्विक अर्थव्यवस्था पर असर डाल सकता है। ऐसे माहौल में BRICS देशों का एक साथ बैठना इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि समूह में ईरान खुद एक सदस्य है, जबकि रूस और चीन भी अमेरिका की विदेश नीति को लेकर लंबे समय से अलग रुख रखते आए हैं।
यही वजह है कि इस बात पर विशेष नजर है कि सम्मेलन के अंत में जारी होने वाले साझा बयान में ईरान और पश्चिम एशिया के हालात को किस तरह जगह मिलती है। क्या BRICS देश अमेरिका की कार्रवाई पर खुलकर सवाल उठाएंगे या फिर बयान को सामान्य और संतुलित भाषा तक सीमित रखा जाएगा, यह सम्मेलन की सबसे महत्वपूर्ण कूटनीतिक चर्चाओं में से एक हो सकती है।
भारत के लिए संतुलन बनाना आसान नहीं
अमेरिकी एक्सपर्ट माइकल कुगेलमैन के मुताबिक भारत के लिए इस पूरे मामले में संतुलन साधना बेहद महत्वपूर्ण होगा। अटलांटिक काउंसिल से जुड़े कुगेलमैन ने बीबीसी से बातचीत में संकेत दिया कि नई दिल्ली शायद ऐसा कोई साझा बयान नहीं चाहेगी, जिसमें अमेरिका या राष्ट्रपति ट्रंप के खिलाफ सीधा और तीखा संदेश दिया जाए।
इसके पीछे भारत की अपनी रणनीतिक और आर्थिक प्राथमिकताएं हैं। भारत एक तरफ BRICS के मंच पर ग्लोबल साउथ के मुद्दों को मजबूती से उठाना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अमेरिका के साथ उसके संबंध भी लगातार महत्वपूर्ण होते जा रहे हैं। दोनों देशों के बीच व्यापार समझौते को लेकर बातचीत निर्णायक चरण में बताई जा रही है। ऐसे में भारत बतौर मेजबान किसी ऐसे बयान से बचना चाहेगा, जिससे वॉशिंगटन के साथ उसके रिश्तों में अनावश्यक तनाव पैदा हो।
कुगेलमैन के आकलन के मुताबिक अगर अमेरिकी नीतियों को लेकर BRICS के साझा बयान में कोई टिप्पणी आती भी है, तो उसके सीधे हमलावर होने की संभावना कम है। बयान में अमेरिका का नाम लेकर आलोचना करने के बजाय अपेक्षाकृत सामान्य या अप्रत्यक्ष शब्दों का इस्तेमाल किया जा सकता है।
रूस और ईरान चाह सकते हैं कड़ा संदेश
BRICS के भीतर सभी देशों की विदेश नीति और रणनीतिक प्राथमिकताएं एक जैसी नहीं हैं। यही सम्मेलन के दौरान आम सहमति तैयार करने को चुनौतीपूर्ण बनाता है। ईरान के लिए मौजूदा स्थिति सीधे उसके राष्ट्रीय हितों से जुड़ी हुई है। इसलिए तेहरान की कोशिश स्वाभाविक रूप से ऐसी भाषा को बढ़ावा देने की हो सकती है, जिसमें उसके खिलाफ अमेरिकी और इजरायली सैन्य कार्रवाई की आलोचना हो।
रूस का भी अमेरिका के साथ लंबे समय से भू-राजनीतिक टकराव रहा है। ऐसे में मॉस्को और तेहरान दोनों की इच्छा हो सकती है कि BRICS पश्चिम एशिया के संकट पर अपेक्षाकृत स्पष्ट और कड़ा रुख अपनाए।
लेकिन किसी प्रस्ताव पर सहमति बनना उतना आसान नहीं होगा। BRICS का विस्तार होने के साथ इसमें ऐसे देशों की संख्या बढ़ी है जिनके आपसी संबंध और वैश्विक मुद्दों पर विचार अलग-अलग हैं। इसलिए किसी एक देश की प्राथमिकता को पूरे समूह की सामूहिक नीति में बदलना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
UAE की स्थिति भी महत्वपूर्ण
BRICS के भीतर संयुक्त अरब अमीरात की मौजूदगी इस समीकरण को और जटिल बनाती है। UAE के इजरायल और अमेरिका के साथ महत्वपूर्ण संबंध हैं। दूसरी तरफ क्षेत्र में जारी सैन्य तनाव का असर खाड़ी देशों पर भी पड़ रहा है। ईरान की ओर से जवाबी कार्रवाई के दौरान क्षेत्र में मौजूद अमेरिकी सैन्य ठिकाने भी चर्चा के केंद्र में रहे हैं।
ऐसे में UAE के लिए ऐसा कोई साझा बयान स्वीकार करना मुश्किल हो सकता है जिसे सीधे तौर पर अमेरिका विरोधी या ईरान समर्थक समझा जाए। इससे पता चलता है कि BRICS के भीतर पश्चिम एशिया के संकट को लेकर एक समान दृष्टिकोण बनाना कितना कठिन हो सकता है।
यही बात BRICS के बदलते स्वरूप को भी सामने लाती है। समूह के विस्तार से उसका आर्थिक और राजनीतिक प्रभाव बढ़ा है, लेकिन दूसरी तरफ अलग-अलग देशों के हितों के कारण एकमत होकर कोई कठोर राजनीतिक रुख तय करना मुश्किल भी हुआ है।
BRICS के विस्तार से बढ़ी ताकत, लेकिन चुनौती भी
कुगेलमैन का मानना है कि BRICS के विस्तार ने संगठन को पहले की तुलना में ज्यादा महत्वपूर्ण बना दिया है। अब यह केवल कुछ उभरती अर्थव्यवस्थाओं का समूह नहीं रह गया है, बल्कि वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था में प्रभाव रखने वाले कई देशों का मंच बन चुका है।
हालांकि, जितने ज्यादा देश इस समूह में शामिल हुए हैं, उतने ही अधिक मुद्दों पर अलग-अलग मत सामने आने लगे हैं। भारत को दिल्ली सम्मेलन में इन्हीं अलग-अलग नजरियों के बीच एक साझा रास्ता निकालना होगा।
एक तरफ रूस और ईरान जैसे देश अमेरिका की नीतियों के खिलाफ ज्यादा स्पष्ट रुख की उम्मीद कर सकते हैं। दूसरी तरफ भारत और UAE जैसे देशों के लिए पश्चिमी देशों के साथ आर्थिक और रणनीतिक रिश्ते भी अहम हैं। चीन की अपनी वैश्विक रणनीति है, जबकि ब्राजील और दक्षिण अफ्रीका की प्राथमिकताएं कई मामलों में अलग हो सकती हैं।
इसलिए सम्मेलन के अंत में जारी होने वाला दस्तावेज केवल औपचारिक घोषणा नहीं होगा, बल्कि यह भी दिखाएगा कि BRICS के सदस्य देशों के बीच संवेदनशील वैश्विक मुद्दों पर कितनी सहमति बन पाती है।
ट्रंप पहले से BRICS पर साधते रहे हैं निशाना
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का BRICS को लेकर रुख पहले से ही काफी सख्त रहा है। खासकर वैश्विक व्यापार में अमेरिकी डॉलर की भूमिका को कम करने की कोशिशों को लेकर ट्रंप कई बार नाराजगी जाहिर कर चुके हैं।
BRICS के भीतर डॉलर पर निर्भरता घटाने और वैकल्पिक भुगतान व्यवस्था की चर्चा लंबे समय से चल रही है। इसे लेकर ट्रंप ने नवंबर 2024 में चेतावनी दी थी कि यदि BRICS देश अमेरिकी डॉलर के स्थान पर किसी दूसरी मुद्रा को बढ़ावा देते हैं तो उन्हें भारी अमेरिकी टैरिफ का सामना करना पड़ सकता है। उन्होंने डॉलर की वैश्विक भूमिका को चुनौती देने वाली कोशिशों के खिलाफ कड़ा रुख अपनाया था।
ऐसे में दिल्ली में होने वाली BRICS बैठक को वॉशिंगटन के लिए नजरअंदाज करना आसान नहीं है। सम्मेलन में आर्थिक सहयोग, स्थानीय मुद्राओं में व्यापार, वित्तीय सहयोग और वैश्विक आर्थिक व्यवस्था जैसे मुद्दे उठ सकते हैं। इन चर्चाओं का सीधा संबंध अमेरिकी आर्थिक प्रभाव से भी जुड़ सकता है।
आर्थिक एजेंडा भी रहेगा केंद्र में
हालांकि पश्चिम एशिया का संकट सम्मेलन पर हावी नजर आ सकता है, लेकिन BRICS बैठक का मूल एजेंडा आर्थिक सहयोग भी है। उम्मीद है कि सदस्य देश व्यापार बढ़ाने, निवेश को प्रोत्साहित करने और वैश्विक दक्षिण के देशों के लिए आर्थिक अवसर मजबूत करने से जुड़े मुद्दों पर चर्चा करेंगे।
भारत के लिए यह सम्मेलन अपनी कूटनीतिक प्राथमिकताओं को सामने रखने का भी अवसर है। नई दिल्ली BRICS को ऐसे मंच के रूप में पेश करना चाहता है जहां विकासशील और उभरती अर्थव्यवस्थाओं की आवाज वैश्विक स्तर पर ज्यादा प्रभावी ढंग से उठाई जा सके।
इसके अलावा सम्मेलन के दौरान कई देशों के नेताओं के बीच द्विपक्षीय मुलाकातें भी महत्वपूर्ण रहेंगी। इन बैठकों में व्यापार, रक्षा, ऊर्जा, निवेश और क्षेत्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर बातचीत हो सकती है।
साझा बयान बनेगा सबसे बड़ा संकेत
कुल मिलाकर इस BRICS सम्मेलन का सबसे महत्वपूर्ण पहलू यही होगा कि सदस्य देश मौजूदा वैश्विक संकटों पर कितनी एकजुटता दिखा पाते हैं। खासकर ईरान को लेकर अमेरिका और इजरायल की कार्रवाई के संदर्भ में साझा बयान की भाषा काफी कुछ स्पष्ट कर सकती है।
अगर बयान में अमेरिका का सीधे नाम लिए बिना युद्ध, संप्रभुता और अंतरराष्ट्रीय कानून जैसे मुद्दों पर जोर दिया जाता है, तो इसे संतुलित कूटनीतिक रास्ते के तौर पर देखा जा सकता है। वहीं अगर अमेरिकी नीतियों की खुली आलोचना होती है, तो यह वॉशिंगटन और BRICS के बीच बढ़ते मतभेद का संकेत माना जा सकता है।
भारत के सामने इसलिए दोहरी जिम्मेदारी है—एक ओर BRICS के सदस्य देशों के बीच सहमति कायम रखना और दूसरी ओर अमेरिका के साथ अपने महत्वपूर्ण रणनीतिक एवं आर्थिक रिश्तों को भी संतुलित रखना। कुगेलमैन के मुताबिक यही वजह है कि दिल्ली में हो रही यह बैठक भारत के लिए सामान्य कूटनीतिक आयोजन से कहीं ज्यादा बड़ी परीक्षा बन गई है।
सम्मेलन पर अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप की नीतियों का प्रत्यक्ष प्रभाव भले ही दिखाई न दे, लेकिन ईरान संकट, डॉलर को लेकर विवाद और अमेरिका-BRICS के बीच बढ़ती रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के कारण वॉशिंगटन की नजर निश्चित रूप से इस बैठक के नतीजों पर रहेगी।