Skip to main content

The Scoopp

 

BRICS में पाकिस्तान की एंट्री पर भारत का पेच, चीन-रूस का साथ मिला तो भी क्या रास्ता खोल पाएगा इस्लामाबाद?

नई दिल्ली में चल रही BRICS समिट के दौरान दुनिया की नजरें सिर्फ बड़े आर्थिक और राजनीतिक फैसलों पर नहीं, बल्कि इस समूह के संभावित विस्तार पर भी टिकी हैं। कौन-से नए देश इस प्रभावशाली गुट का हिस्सा बन सकते हैं और किन देशों की दावेदारी को मंजूरी मिलेगी, यह सवाल एक बार फिर चर्चा में है। इसी बीच पाकिस्तान की BRICS में शामिल होने की कोशिश ने भारत, चीन और रूस के बीच कूटनीतिक समीकरणों को लेकर अटकलें तेज कर दी हैं।

इस्लामाबाद लंबे समय से दुनिया के बड़े उभरते बाजारों वाले समूह का सदस्य बनने की इच्छा जाहिर करता रहा है। पाकिस्तान ने साल 2023 में BRICS की सदस्यता के लिए औपचारिक आवेदन भी किया था। उसकी कोशिश है कि वह भारत, चीन और रूस जैसे प्रभावशाली देशों के साथ एक ऐसे मंच पर जगह बनाए, जिसका आर्थिक और रणनीतिक महत्व लगातार बढ़ रहा है। हालांकि, पाकिस्तान के लिए इस राह में सिर्फ आवेदन करना या कुछ ताकतवर देशों का समर्थन हासिल करना पर्याप्त नहीं होगा। सदस्यता की प्रक्रिया में भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण अड़चन बन सकती है।

पाकिस्तान को BRICS में शामिल होने की उम्मीद क्यों?

BRICS का विस्तार पिछले कुछ वर्षों में तेजी से हुआ है। शुरुआती दौर में ब्राजील, रूस, भारत और चीन के समूह के रूप में शुरू हुआ यह मंच बाद में दक्षिण अफ्रीका के जुड़ने से BRICS बना। अब इसमें 11 सदस्य देश शामिल हैं। यह समूह दुनिया की लगभग आधी आबादी और वैश्विक GDP के करीब 40 प्रतिशत हिस्से का प्रतिनिधित्व करता है। ऐसे में किसी भी उभरती अर्थव्यवस्था के लिए इसका हिस्सा बनना आर्थिक और कूटनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण उपलब्धि मानी जा सकती है।

पाकिस्तान भी इसी बढ़ते प्रभाव को देखते हुए इस समूह में अपनी जगह बनाना चाहता है। इस्लामाबाद के लिए BRICS में प्रवेश का मतलब सिर्फ एक अंतरराष्ट्रीय संगठन की सदस्यता हासिल करना नहीं होगा। इससे उसे बड़े बाजारों, प्रभावशाली अर्थव्यवस्थाओं और विकासशील देशों के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करने का अवसर मिल सकता है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था लंबे समय से कई चुनौतियों से जूझ रही है। ऐसे में वह ऐसे अंतरराष्ट्रीय मंचों से जुड़ना चाहता है, जहां व्यापार, निवेश, आर्थिक सहयोग और विकास से जुड़े मुद्दों पर चर्चा होती है। BRICS की बढ़ती ताकत को देखते हुए पाकिस्तान को उम्मीद हो सकती है कि सदस्यता मिलने से उसकी आर्थिक संभावनाओं को नया आधार मिलेगा।

हालांकि, किसी समूह का सदस्य बनना और उसके आर्थिक लाभ हासिल करना दो अलग-अलग बातें हैं। पाकिस्तान को अपनी दावेदारी के लिए आर्थिक क्षमता के साथ-साथ राजनीतिक स्वीकार्यता भी साबित करनी होगी।

2023 में दिया था सदस्यता के लिए आवेदन

पाकिस्तान ने वर्ष 2023 में BRICS में शामिल होने के लिए आवेदन किया था। यह कदम उस समय उठाया गया, जब समूह के विस्तार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर काफी चर्चा चल रही थी। पाकिस्तान की कोशिश थी कि वह भी उन देशों की सूची में शामिल हो सके, जो दुनिया की बदलती आर्थिक व्यवस्था में अपनी भूमिका बढ़ाना चाहते हैं।

इस्लामाबाद की नजर खासतौर पर चीन और रूस जैसे देशों के समर्थन पर है। चीन पाकिस्तान का करीबी रणनीतिक साझेदार है। दोनों देशों के बीच आर्थिक, रक्षा और बुनियादी ढांचे से जुड़े संबंध पहले से मौजूद हैं। दूसरी ओर, रूस भी पाकिस्तान के साथ अपने रिश्तों को आगे बढ़ाने की कोशिश करता रहा है। इसलिए पाकिस्तान को उम्मीद हो सकती है कि इन दोनों देशों की सहमति उसके आवेदन को मजबूती दे सकती है।

लेकिन BRICS की सदस्यता का मामला किसी एक देश के समर्थन से तय नहीं होता। समूह के विस्तार के लिए मौजूदा सदस्यों के बीच आम सहमति आवश्यक है। यही वजह है कि पाकिस्तान के लिए चीन और रूस का संभावित समर्थन महत्वपूर्ण होने के बावजूद अंतिम फैसला भारत के रुख पर भी निर्भर करेगा।

चीन और रूस से समर्थन की उम्मीद

पाकिस्तान के लिए चीन का समर्थन हासिल करना अपेक्षाकृत आसान माना जा सकता है। दोनों देशों के बीच लंबे समय से करीबी संबंध हैं। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा यानी CPEC भी दोनों देशों की साझेदारी का एक अहम हिस्सा है। इसके अलावा, रक्षा और रणनीतिक सहयोग के क्षेत्र में भी दोनों देशों के संबंध मजबूत हैं।

पाकिस्तान यह तर्क दे सकता है कि BRICS में उसकी सदस्यता से समूह का दक्षिण एशिया में प्रभाव बढ़ेगा। चीन के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते और क्षेत्रीय स्थिति को भी इस दावेदारी के समर्थन में पेश किया जा सकता है।

रूस के साथ भी पाकिस्तान अपने संबंधों को आर्थिक और रणनीतिक स्तर पर आगे बढ़ाने की कोशिश कर रहा है। ऐसे में इस्लामाबाद को उम्मीद हो सकती है कि मॉस्को उसकी सदस्यता का विरोध नहीं करेगा या समर्थन कर सकता है।

फिर भी यह मान लेना जल्दबाजी होगी कि चीन और रूस का समर्थन मिलने से पाकिस्तान का रास्ता साफ हो जाएगा। BRICS में किसी नए सदस्य को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा सदस्यों की सहमति जरूरी है। यदि किसी एक देश की आपत्ति बनी रहती है, तो सदस्यता की प्रक्रिया आगे बढ़ना मुश्किल हो सकता है।

भारत क्यों बन सकता है सबसे बड़ी बाधा?

पाकिस्तान की BRICS सदस्यता की राह में सबसे बड़ा सवाल भारत की सहमति को लेकर है। भारत और पाकिस्तान के संबंध लंबे समय से तनावपूर्ण रहे हैं। सीमा विवाद, आतंकवाद, सुरक्षा और राजनीतिक मतभेदों के कारण दोनों देशों के बीच रिश्तों में लगातार खटास रही है।

मई 2025 के सैन्य संघर्ष के बाद दोनों देशों के संबंध और भी निचले स्तर पर पहुंच गए। ऐसे माहौल में पाकिस्तान की किसी महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय समूह में एंट्री को लेकर भारत का रुख निर्णायक हो सकता है।

BRICS में सदस्यता देने की प्रक्रिया आम सहमति पर आधारित है। इसका सीधा अर्थ है कि भारत की मंजूरी के बिना पाकिस्तान को सदस्य बनाना संभव नहीं होगा। भले ही चीन और रूस उसके आवेदन का समर्थन करें, लेकिन यदि भारत सहमत नहीं होता है तो पाकिस्तान की दावेदारी अटक सकती है।

यही कारण है कि पाकिस्तान की BRICS में शामिल होने की कोशिश को सिर्फ आर्थिक मुद्दे के रूप में नहीं देखा जा सकता। इसके पीछे भारत-पाकिस्तान संबंधों का राजनीतिक और रणनीतिक पहलू भी जुड़ा हुआ है।

भारत के लिए BRICS सिर्फ व्यापार और अर्थव्यवस्था का मंच नहीं है। यह वैश्विक दक्षिण, बहुध्रुवीय विश्व व्यवस्था और अंतरराष्ट्रीय संस्थाओं में विकासशील देशों की भूमिका से जुड़े मुद्दों पर भी महत्वपूर्ण मंच है। ऐसे में भारत किसी नए सदस्य को लेकर सुरक्षा, विदेश नीति और समूह के व्यापक हितों को ध्यान में रखकर फैसला कर सकता है।

पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था और BRICS से जुड़ी उम्मीदें

पाकिस्तान BRICS में शामिल होने के पक्ष में आर्थिक तर्क भी रख सकता है। BRICS के सदस्य देश दुनिया के ऊर्जा, खाद्य उत्पादन, विनिर्माण और व्यापार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। समूह के कई देश पाकिस्तान के लिए पहले से ही बड़े व्यापारिक साझेदार हैं।

पाकिस्तान का टेक्सटाइल उद्योग उसकी अर्थव्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। पिछले साल उसके कपड़ा निर्यात का आंकड़ा करीब 18 अरब डॉलर बताया गया था। चीन के साथ व्यापार में भी पाकिस्तान की दिलचस्पी लगातार बनी हुई है। इस्लामाबाद को उम्मीद हो सकती है कि BRICS के जरिए उसे बड़े बाजारों तक पहुंच और आर्थिक सहयोग के नए अवसर मिलेंगे।

चीन को पाकिस्तान का कॉपर यानी तांबा निर्यात 1 अरब डॉलर से अधिक पहुंचने की बात भी सामने आई है। इसके अलावा, एल्युमीनियम अयस्क के निर्यात में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है। पाकिस्तान इन आंकड़ों का इस्तेमाल यह बताने के लिए कर सकता है कि उसके पास प्राकृतिक संसाधन, मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और क्षेत्रीय व्यापार की संभावनाएं हैं।

उसकी भौगोलिक स्थिति भी एक अहम पहलू है। दक्षिण एशिया, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के बीच स्थित होने के कारण पाकिस्तान खुद को क्षेत्रीय व्यापार और संपर्क के लिहाज से महत्वपूर्ण देश के रूप में पेश कर सकता है।

लेकिन केवल आर्थिक क्षमता BRICS की सदस्यता की गारंटी नहीं देती। समूह में शामिल होने के लिए राजनीतिक संबंध, रणनीतिक हित और मौजूदा सदस्यों की सहमति भी उतनी ही जरूरी है।

क्या भारत की मंजूरी के बिना हो सकता है फैसला?

इस सवाल का जवाब BRICS की सदस्यता प्रक्रिया में छिपा है। समूह के विस्तार के लिए सभी मौजूदा सदस्यों की सहमति आवश्यक है। इसलिए पाकिस्तान के आवेदन पर भारत की राय को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।

यदि चीन और रूस पाकिस्तान के समर्थन में आते हैं, तब भी भारत की सहमति जरूरी होगी। यही वह बिंदु है, जहां पाकिस्तान की कूटनीतिक कोशिश सबसे कठिन हो सकती है।

फिलहाल भारत की ओर से पाकिस्तान को BRICS में शामिल करने के समर्थन का कोई स्पष्ट संकेत सामने नहीं आया है। ऐसे में यह कहना मुश्किल है कि इस्लामाबाद की दावेदारी निकट भविष्य में सफल होगी या नहीं।

पाकिस्तान के लिए एक रास्ता यह हो सकता है कि वह भारत के साथ अपने संबंधों में सुधार की दिशा में कदम उठाए। लेकिन यह भी आसान नहीं होगा, क्योंकि दोनों देशों के बीच कई पुराने और गंभीर विवाद मौजूद हैं। सुरक्षा और आतंकवाद से जुड़े मुद्दों पर भारत का रुख बेहद महत्वपूर्ण रहता है।

BRICS विस्तार की चर्चा में पाकिस्तान की स्थिति

BRICS का विस्तार समूह के प्रभाव को बढ़ाने के साथ-साथ उसकी आंतरिक सहमति को भी चुनौती देता है। नए सदस्यों को शामिल करने से आर्थिक और राजनीतिक प्रतिनिधित्व बढ़ सकता है, लेकिन इसके साथ विभिन्न देशों के हितों में संतुलन बनाना भी जरूरी होता है।

पाकिस्तान की सदस्यता पर चर्चा इसी व्यापक संदर्भ में हो रही है। एक तरफ इस्लामाबाद अपने आर्थिक और रणनीतिक महत्व को सामने रख सकता है। दूसरी ओर, भारत के साथ उसके तनावपूर्ण संबंध उसकी दावेदारी को प्रभावित कर सकते हैं।

चीन और रूस से संभावित समर्थन पाकिस्तान के लिए सकारात्मक संकेत हो सकता है, लेकिन यह समर्थन अंतिम मंजूरी का विकल्प नहीं है। BRICS के मौजूदा सदस्य देशों को किसी भी नए देश की सदस्यता पर सामूहिक सहमति बनानी होगी।

इसलिए पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ BRICS में शामिल होने की इच्छा जताना नहीं, बल्कि भारत समेत सभी सदस्यों को अपनी सदस्यता के पक्ष में सहमत करना होगी।

क्या पाकिस्तान का सपना पूरा होगा?

पाकिस्तान ने 2023 में BRICS की सदस्यता के लिए आवेदन किया था और अब भी इस समूह का हिस्सा बनने की इच्छा रखता है। चीन और रूस से उसे समर्थन की उम्मीद है, जबकि आर्थिक मोर्चे पर वह अपने व्यापार, निर्यात और रणनीतिक स्थिति को आधार बनाकर दावेदारी पेश कर सकता है।

लेकिन इस पूरी प्रक्रिया में भारत की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण बनी हुई है। BRICS में नए सदस्य को शामिल करने के लिए सभी मौजूदा देशों की सहमति जरूरी है। भारत और पाकिस्तान के बीच जारी तनाव को देखते हुए इस्लामाबाद के लिए यह रास्ता आसान नहीं दिखाई देता।

जब तक भारत अपनी सहमति नहीं देता, पाकिस्तान की सदस्यता की कोशिश आगे बढ़ना मुश्किल रहेगी। इसलिए BRICS में पाकिस्तान की एंट्री का सवाल सिर्फ चीन और रूस के समर्थन से तय नहीं होगा। असली फैसला इस बात पर निर्भर करेगा कि भारत इस दावेदारी को लेकर क्या रुख अपनाता है और समूह के बाकी सदस्य किस तरह की सहमति बनाते हैं।

फिलहाल पाकिस्तान की कोशिश जारी है, लेकिन BRICS का सदस्य बनने का उसका सपना भारत की मंजूरी के बिना पूरा होना संभव नहीं है।