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हिंदी दिवस पर शाह का संदेश- मातृभाषा से नाता रखें मजबूत, दुनिया की भाषाएं सीखकर बढ़ाएं अपना दायरा

हिंदी दिवस के मौके पर केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने देश की भाषाओं को लेकर बड़ा संदेश दिया। अपने वर्चुअल संबोधन में उन्होंने कहा कि हिंदी को भारत की दूसरी भाषाओं के मुकाबले खड़ा करना सही नहीं है। हिंदी और अन्य भारतीय भाषाओं के बीच किसी तरह की प्रतिस्पर्धा नहीं है, बल्कि सभी भाषाएं मिलकर भारत की सांस्कृतिक और सामाजिक पहचान को मजबूत करती हैं। उन्होंने देश की भाषाई विविधता को भारत की ताकत बताते हुए कहा कि प्रत्येक भारतीय भाषा अपने भीतर सदियों का इतिहास, परंपराएं, लोक संस्कृति और समाज की स्मृतियां समेटे हुए है।

अमित शाह ने विशेष तौर पर युवाओं से कहा कि वे सिर्फ एक या दो भाषाओं तक सीमित न रहें। उन्हें दुनिया की अधिक से अधिक भाषाएं सीखने की कोशिश करनी चाहिए, क्योंकि नई भाषाओं का ज्ञान अवसरों का दायरा बढ़ाता है। हालांकि, इसके साथ ही उन्होंने अपनी मातृभाषा से जुड़े रहने पर भी जोर दिया। शाह ने कहा कि दूसरी भाषाएं सीखना अच्छी बात है, लेकिन इसके लिए अपनी भाषा को छोड़ना या उससे दूरी बनाना उचित नहीं है।

मातृभाषा से जुड़ाव को बताया जरूरी

गृह मंत्री ने माता-पिता से भी अपील की कि वे अपने बच्चों के साथ अपनी मातृभाषा में संवाद करें। उनका कहना था कि बच्चे जिस भाषा में अपने परिवार, भावनाओं और आसपास की दुनिया को सबसे स्वाभाविक तरीके से समझते हैं, उससे उनका जुड़ाव बनाए रखना जरूरी है।

शाह ने कहा कि किसी व्यक्ति को अपनी भाषा बोलने में किसी तरह की झिझक या हीन भावना महसूस नहीं करनी चाहिए। भाषा केवल बातचीत करने का साधन नहीं होती। यह व्यक्ति को उसकी जड़ों से जोड़ती है। मातृभाषा के जरिए इंसान अपने परिवार, अपनी मिट्टी, अपनी संस्कृति और अपने इतिहास के साथ भावनात्मक रिश्ता कायम करता है।

उन्होंने युवाओं को संदेश देते हुए कहा कि वैश्विक स्तर पर आगे बढ़ने के लिए विदेशी भाषाओं का ज्ञान हासिल किया जा सकता है, लेकिन अपनी जड़ों को मजबूत बनाए रखना भी उतना ही महत्वपूर्ण है। उनके मुताबिक, भारत की असली खूबसूरती उसकी अनेक भाषाओं और बोलियों में दिखाई देती है।

हिंदी को लेकर शाह ने साफ किया अपना नजरिया

अमित शाह ने कहा कि हिंदी को देश की दूसरी भारतीय भाषाओं के खिलाफ खड़ा करने की जरूरत नहीं है। हिंदी का किसी अन्य भारतीय भाषा से मुकाबला नहीं है। उनका जोर इस बात पर रहा कि देश में बोली जाने वाली सभी भाषाएं एक-दूसरे की विरोधी नहीं बल्कि भारतीय संस्कृति की अलग-अलग अभिव्यक्तियां हैं।

उन्होंने अपने निजी अनुभव का उल्लेख करते हुए कहा कि उनकी मातृभाषा गुजराती है। इसके बावजूद जब वह देश के अलग-अलग हिस्सों में जाते हैं, तो आम लोगों के साथ सीधे संवाद स्थापित करने में हिंदी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। इस तरह उन्होंने हिंदी को एक ऐसी भाषा के रूप में रेखांकित किया जिसके जरिए देश के विभिन्न हिस्सों के लोगों के बीच संवाद आसान होता है।

शाह के मुताबिक, हिंदी का महत्व केवल इसलिए नहीं है कि इसे बड़ी संख्या में लोग बोलते हैं, बल्कि इसलिए भी है कि यह अलग-अलग क्षेत्रों के लोगों के बीच संपर्क का माध्यम बनी है।

भारतीय भाषाओं ने आजादी के बाद निभाई अहम भूमिका

गृह मंत्री ने अपने संबोधन में स्वतंत्रता के बाद भारतीय भाषाओं की भूमिका को भी रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आजादी मिलने के बाद देश के सामने सबसे बड़ी चुनौतियों में से एक यह थी कि राष्ट्र निर्माण और विकास की प्रक्रिया को आम नागरिकों तक कैसे पहुंचाया जाए।

इस काम में भारतीय भाषाओं ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। प्रशासन, जनजागरण और विकास से जुड़े संदेशों को जनता तक पहुंचाने में स्थानीय भाषाओं और हिंदी का योगदान रहा। शाह ने कहा कि भारतीय भाषाओं ने लोगों को राष्ट्रीय उद्देश्यों से जोड़ने, स्वतंत्रता के विचार को आगे बढ़ाने और देश में एकता की भावना मजबूत करने में मदद की।

उन्होंने इस बात पर भी जोर दिया कि भारत की भाषाएं केवल वर्तमान समय की संवाद प्रणाली नहीं हैं, बल्कि इनके पीछे लंबा ऐतिहासिक और सांस्कृतिक सफर मौजूद है।

हिंदी को आगे बढ़ाने में गैर-हिंदी भाषी महापुरुषों का योगदान

अमित शाह ने हिंदी के विकास और प्रसार में उन महान व्यक्तित्वों का भी उल्लेख किया जिनकी मातृभाषा हिंदी नहीं थी। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि स्वामी दयानंद सरस्वती की मातृभाषा गुजराती थी, लेकिन उन्होंने हिंदी को अपने विचारों के प्रसार का माध्यम बनाया।

शाह ने कहा कि स्वामी दयानंद सरस्वती ने अपनी प्रसिद्ध कृति ‘सत्यार्थ प्रकाश’ हिंदी में लिखी। इसके जरिए उन्होंने अपने विचारों को व्यापक समाज तक पहुंचाने का प्रयास किया।

उन्होंने राष्ट्रपिता महात्मा गांधी के योगदान का भी उल्लेख किया। शाह के अनुसार, गांधी ने वर्ष 1918 में मद्रास में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा की स्थापना की थी। इसका उद्देश्य दक्षिण भारत में हिंदी के प्रचार-प्रसार को बढ़ावा देना था।

गृह मंत्री ने नेताजी सुभाष चंद्र बोस का उदाहरण भी दिया। उन्होंने कहा कि सुभाष चंद्र बोस बंगाली भाषी थे, लेकिन आजाद हिंद फौज में उन्होंने हिंदी को संवाद की भाषा के रूप में इस्तेमाल किया। उनके नेतृत्व में ‘जय हिंद’ जैसा नारा राष्ट्रीय भावना का प्रतीक बन गया।

शाह ने इन उदाहरणों के जरिए यह बताने की कोशिश की कि हिंदी को आगे बढ़ाने में केवल हिंदी भाषी क्षेत्रों का योगदान नहीं रहा, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से आने वाले महापुरुषों ने भी इसकी भूमिका को स्वीकार किया।

भाषा को औपनिवेशिक मानसिकता से मुक्ति से जोड़ा

अपने संबोधन में अमित शाह ने भाषा के मुद्दे को औपनिवेशिक मानसिकता से बाहर निकलने की जरूरत से भी जोड़ा। उन्होंने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने लाल किले से देशवासियों को औपनिवेशिक मानसिकता की गुलामी से बाहर निकलने का आह्वान किया है।

शाह के मुताबिक, भाषा भी इस बदलाव का महत्वपूर्ण हिस्सा है। लंबे समय तक भारत की व्यवस्था और सार्वजनिक जीवन पर औपनिवेशिक प्रभाव रहा। ऐसे में भारतीय भाषाओं को सम्मान और व्यापक उपयोग देना आत्मविश्वास तथा राष्ट्रीय पहचान को मजबूत करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

उन्होंने कहा कि अपनी भाषाओं को लेकर गौरव की भावना विकसित करना जरूरी है। इसका अर्थ दूसरी भाषाओं को अस्वीकार करना नहीं, बल्कि अपनी भाषाई विरासत को सम्मान देना है।

कानूनों में बदलाव को भी बताया राष्ट्रीय स्वाभिमान का प्रतीक

अमित शाह ने अपने भाषण में भाषा के साथ-साथ सरकार द्वारा किए गए कुछ नाम और कानूनों से जुड़े बदलावों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि राजपथ का नाम बदलकर कर्तव्य पथ किया जाना केवल शब्दों में बदलाव नहीं था, बल्कि इसके पीछे एक व्यापक सोच थी।

इसी तरह उन्होंने अंग्रेजों के समय बनाए गए आपराधिक कानूनों की जगह लागू किए गए नए भारतीय कानूनों का जिक्र किया। शाह ने भारतीय न्याय संहिता, भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता और भारतीय साक्ष्य अधिनियम का उदाहरण देते हुए कहा कि इन्हें केवल पुराने कानूनों के स्थान पर नए नाम देने के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

उनके अनुसार, ऐसे बदलावों का संबंध राष्ट्रीय स्वाभिमान और अपनी व्यवस्था को भारतीय संदर्भों के अनुरूप ढालने से है। उन्होंने इसे औपनिवेशिक विरासत से आगे बढ़ने और भारतीय पहचान को प्रमुखता देने की प्रक्रिया का हिस्सा बताया।

14 सितंबर को क्यों मनाया जाता है हिंदी दिवस?

देश में हर साल 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। इस दिन का संबंध संविधान सभा के उस ऐतिहासिक फैसले से है, जब 14 सितंबर 1949 को देवनागरी लिपि में हिंदी को भारतीय संघ की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया गया था।

इसी ऐतिहासिक घटना की याद में हर वर्ष हिंदी दिवस आयोजित किया जाता है। इस अवसर पर हिंदी के प्रचार-प्रसार, इसके साहित्यिक योगदान और सार्वजनिक जीवन में इसकी भूमिका पर चर्चा होती है।

हिंदी दिवस के अपने संबोधन में अमित शाह ने इसी अवसर को व्यापक भाषाई दृष्टिकोण के साथ जोड़ते हुए कहा कि हिंदी को आगे बढ़ाने का मतलब दूसरी भारतीय भाषाओं को पीछे करना नहीं है। भारत की पहचान उसकी बहुभाषी संस्कृति से बनती है और प्रत्येक भाषा देश की साझा विरासत में अपना योगदान देती है।

उन्होंने युवाओं को एक तरफ वैश्विक स्तर पर संवाद के लिए अधिक भाषाएं सीखने की सलाह दी, वहीं दूसरी ओर अपनी मातृभाषा को जीवन से जोड़े रखने का संदेश दिया। उनका जोर इस बात पर रहा कि आधुनिक और वैश्विक बनने की प्रक्रिया में अपनी भाषाई जड़ों को भुलाना जरूरी नहीं है।

अमित शाह का संदेश मूल रूप से इसी विचार के इर्द-गिर्द रहा कि भारत की भाषाएं आपस में प्रतिस्पर्धा करने के लिए नहीं, बल्कि देश की विविधता को मजबूत करने के लिए हैं। हिंदी को लेकर उन्होंने सहयोग और संवाद की भूमिका पर जोर दिया और कहा कि अपनी मातृभाषा के प्रति सम्मान के साथ दूसरी भाषाओं को सीखना ही भारत की बहुभाषी पहचान को और मजबूत कर सकता है।