होर्मुज जलडमरूमध्य में जारी तनाव और पश्चिम एशिया से आने वाली ऊर्जा आपूर्ति पर बढ़ती अनिश्चितता के बीच भारत ने अपनी ऊर्जा सुरक्षा को मजबूत करने के लिए वैकल्पिक रास्तों पर काम तेज कर दिया है। इसी कड़ी में भारत और संयुक्त अरब अमीरात (UAE) के बीच समुद्र के नीचे तेल और गैस पहुंचाने वाली पाइपलाइन परियोजना को आगे बढ़ाने की तैयारी की जा रही है। प्रस्तावित योजना के तहत ओमान और UAE के तट से पाइपलाइन समुद्र के भीतर से होकर भारत के पश्चिमी तट तक लाई जा सकती है। इसके जरिए भविष्य में कच्चे तेल और गैस की सीधी आपूर्ति भारत तक पहुंचाने की संभावना तलाश की जा रही है। इस पहल का मकसद केवल परिवहन का एक नया साधन तैयार करना नहीं, बल्कि पश्चिम एशिया से ऊर्जा आयात के लिए मौजूदा समुद्री मार्गों पर भारत की निर्भरता को कम करने के विकल्प तैयार करना भी है।
इस परियोजना को लेकर केंद्रीय वाणिज्य एवं उद्योग मंत्री पीयूष गोयल और UAE के विदेश व्यापार मंत्री थानी बिन अहमद अल जेउदी के बीच हुई बातचीत के बाद तस्वीर और स्पष्ट हुई है। बैठक के बाद सरकार की ओर से ओमान और UAE से भारत तक समुद्र के नीचे पाइपलाइन बिछाने के प्रस्ताव को प्राथमिकता के साथ आगे बढ़ाने की बात सामने आई। प्रस्तावित परियोजना को MEIDP यानी मिडिल ईस्ट टू इंडिया डीप-वॉटर पाइपलाइन के नाम से जाना जा रहा है। शुरुआती योजना के अनुसार इसका समुद्री हिस्सा ओमान और UAE के तट से शुरू होकर अरब सागर के भीतर से गुजर सकता है और भारत के गुजरात तथा महाराष्ट्र के तट तक पहुंच सकता है। हालांकि अंतिम मार्ग, तकनीकी डिजाइन और परियोजना की पूरी संरचना विस्तृत अध्ययन के बाद ही तय होगी।
भारत के लिए इस तरह के वैकल्पिक ऊर्जा मार्ग की जरूरत इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि देश अपनी ऊर्जा जरूरतों के लिए बड़े पैमाने पर आयात पर निर्भर है। भारत की कुल कच्चे तेल की खपत का करीब 88 प्रतिशत हिस्सा विदेशों से आने वाले क्रूड से पूरा होता है। ऐसे में पश्चिम एशिया में किसी भी तरह का बड़ा भू-राजनीतिक या समुद्री व्यवधान सीधे भारत की ऊर्जा आपूर्ति और कीमतों को प्रभावित कर सकता है। होर्मुज जलडमरूमध्य इसी वजह से भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग है। पश्चिम एशिया से आने वाले तेल और गैस के बड़े हिस्से का परिवहन जहाजों के जरिए इसी क्षेत्र से होकर होता है। यदि इस मार्ग पर लंबे समय तक बाधा पैदा होती है तो जहाजों की आवाजाही, बीमा लागत, माल ढुलाई और ऊर्जा की कीमतों पर दबाव बढ़ सकता है। नई पाइपलाइन योजना को इसी जोखिम को कम करने की एक संभावित कोशिश के रूप में देखा जा रहा है।
इस प्रस्ताव का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि परियोजना की शुरुआत केवल कच्चे तेल के परिवहन को ध्यान में रखकर नहीं हुई थी। कुछ समय पहले तक इसका मुख्य फोकस प्राकृतिक गैस की आपूर्ति के लिए पाइपलाइन तैयार करने पर था। जून में सरकार की ओर से इसे एक निजी क्षेत्र से जुड़ी परियोजना के तौर पर बताया गया था। अब बदलते ऊर्जा हालात और होर्मुज क्षेत्र में पैदा हुए संकट के बीच कच्चे तेल को भी इसी तरह के समुद्री नेटवर्क के जरिए भारत तक पहुंचाने की तकनीकी संभावना पर विचार किया जा रहा है। यानी जिस योजना का शुरुआती उद्देश्य मुख्य रूप से गैस ट्रांसपोर्टेशन था, उसका दायरा अब तेल तक बढ़ाने की संभावनाओं के साथ बड़ा हो रहा है।
पेट्रोलियम मंत्रालय के निर्देश के बाद सरकारी कंपनियां इस परियोजना से जुड़े विभिन्न पहलुओं की विस्तृत रिपोर्ट तैयार करने में जुटी हैं। रिपोर्ट में केवल पाइपलाइन का रास्ता तय करना ही शामिल नहीं होगा, बल्कि गहरे समुद्र में इसे स्थापित करने की तकनीक, निर्माण लागत, समुद्र के भीतर पाइपलाइन की सुरक्षा, रखरखाव, संचालन और संभावित जोखिमों का भी अध्ययन किया जाएगा। समुद्र के नीचे हजारों मीटर की गहराई में इतनी लंबी पाइपलाइन बिछाना सामान्य पाइपलाइन परियोजनाओं की तुलना में कहीं अधिक जटिल काम है। इसलिए किसी भी अंतिम फैसले से पहले तकनीकी और आर्थिक व्यवहार्यता की विस्तृत जांच जरूरी होगी।
इस परियोजना के सामने सबसे बड़ी चुनौती अरब सागर के गहरे हिस्से में पाइपलाइन को सुरक्षित तरीके से स्थापित करना है। प्रस्तावित मार्ग में समुद्र की गहराई कुछ स्थानों पर करीब 3,450 मीटर तक पहुंच सकती है। इतनी गहराई में पानी का दबाव सतह के मुकाबले बहुत अधिक होता है। इस वजह से पाइपलाइन के लिए इस्तेमाल होने वाली सामग्री, उसके जोड़, बाहरी सुरक्षा और समुद्र तल पर उसे स्थिर रखने की तकनीक बेहद महत्वपूर्ण होगी। इसके अलावा समुद्र की सतह के नीचे मौजूद चट्टानों, गहरी खाइयों और असमान भूभाग के बीच पाइपलाइन के लिए उपयुक्त रास्ता तैयार करना भी इंजीनियरिंग की बड़ी चुनौती होगी। परियोजना तैयार होने के बाद उसकी नियमित निगरानी और किसी तकनीकी समस्या की स्थिति में मरम्मत करना भी आसान नहीं होगा।
गहरे समुद्र में पाइपलाइन बिछाने के लिए विशेष जहाजों, अत्याधुनिक उपकरणों और समुद्र की वास्तविक स्थिति का लगातार अध्ययन करने वाली तकनीक की जरूरत होगी। समुद्र की धाराओं, तल की संरचना और पर्यावरणीय परिस्थितियों को ध्यान में रखकर पाइपलाइन का डिजाइन तैयार करना होगा। इसके अलावा यह भी सुनिश्चित करना होगा कि लंबे समय तक समुद्री दबाव के बावजूद पाइपलाइन में रिसाव या अन्य तकनीकी समस्या की संभावना न्यूनतम रहे। यही वजह है कि परियोजना के निर्माण से पहले किया जा रहा तकनीकी अध्ययन इसकी लागत और समयसीमा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा।
भारत के लिए इस प्रस्तावित नेटवर्क का एक संभावित फायदा यह हो सकता है कि ऊर्जा की आपूर्ति के लिए केवल तेल और गैस ले जाने वाले जहाजों पर निर्भरता कुछ हद तक कम की जा सके। फिलहाल पश्चिम एशिया से भारत तक बड़ी मात्रा में ऊर्जा उत्पाद समुद्री जहाजों के जरिए पहुंचते हैं। यदि किसी वैकल्पिक पाइपलाइन नेटवर्क के माध्यम से सीधे आपूर्ति का रास्ता तैयार होता है तो कुछ परिस्थितियों में समुद्री परिवहन से जुड़े खर्च और जोखिम को कम करने का अवसर मिल सकता है। तेल और गैस की कीमतों में तेजी आने पर माल ढुलाई और समुद्री बीमा की लागत भी बढ़ सकती है। पाइपलाइन आधारित परिवहन इन खर्चों के कुछ हिस्से को कम करने में मदद कर सकता है, हालांकि वास्तविक आर्थिक लाभ परियोजना की कुल लागत और संचालन खर्च पर निर्भर करेगा।
पश्चिम एशिया से आने वाली LPG और LNG आपूर्ति भी इस पूरे मामले को महत्वपूर्ण बनाती है। भारत को मिलने वाली आधी से अधिक LPG और LNG की आपूर्ति कतर तथा UAE जैसे देशों से समुद्री मार्गों के जरिए आती है। ऐसे में ऊर्जा सुरक्षा केवल पेट्रोल और डीजल के लिए कच्चे तेल की उपलब्धता तक सीमित नहीं है। रसोई गैस, बिजली उत्पादन और औद्योगिक इस्तेमाल के लिए जरूरी प्राकृतिक गैस की निर्बाध आपूर्ति भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। यदि भविष्य में भारत के पास समुद्री पाइपलाइन के जरिए ऊर्जा आयात का अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध होता है तो संकट की स्थिति में सप्लाई को संभालने के लिए एक और रास्ता मौजूद रहेगा।
इस महत्वाकांक्षी योजना पर काम करने वाली संस्था साउथ एशिया गैस एंटरप्राइज ने पहले ही छोटी दूरी के स्तर पर पाइपलाइन तकनीक का परीक्षण किया है। जानकारी के मुताबिक लगभग 25 करोड़ रुपये की लागत से करीब 3 किलोमीटर लंबी पाइपलाइन बिछाकर इसका परीक्षण किया गया है। इस परीक्षण का उद्देश्य समुद्र के भीतर पाइपलाइन बिछाने और उसके संचालन से जुड़ी तकनीकी क्षमताओं को परखना बताया गया है। हालांकि कुछ किलोमीटर की परीक्षण परियोजना और हजारों मीटर की गहराई में सैकड़ों किलोमीटर लंबी व्यावसायिक पाइपलाइन तैयार करने में काफी अंतर है। इसलिए बड़े स्तर पर निर्माण से पहले कई चरणों में तकनीकी परीक्षण और मूल्यांकन की जरूरत होगी।
पूरी परियोजना को अमल में लाने में भी लंबा समय लग सकता है। मौजूदा अनुमान के अनुसार सभी जरूरी शर्तें पूरी होने, तकनीकी अध्ययन और अन्य मंजूरियां मिलने के बाद निर्माण कार्य पूरा करने में करीब 5 से 7 साल का समय लग सकता है। इसका मतलब है कि यह परियोजना तत्काल होर्मुज संकट का समाधान नहीं होगी, बल्कि भविष्य में भारत की ऊर्जा सुरक्षा के लिए एक दीर्घकालिक बुनियादी ढांचा तैयार करने की कोशिश है। इस दौरान परियोजना की लागत, निवेश मॉडल, पाइपलाइन की लंबाई, वास्तविक समुद्री मार्ग और तेल तथा गैस की क्षमता जैसे कई पहलुओं पर अंतिम निर्णय लिया जाना बाकी होगा।
होर्मुज क्षेत्र में बढ़ते जोखिम ने भारत के सामने ऊर्जा आपूर्ति के वैकल्पिक रास्ते विकसित करने की जरूरत को और स्पष्ट किया है। ओमान और UAE से भारत के पश्चिमी तट तक प्रस्तावित डीप-वॉटर पाइपलाइन इसी व्यापक रणनीति का हिस्सा है। फिलहाल परियोजना अध्ययन और तकनीकी मूल्यांकन के चरण में है और इसकी अंतिम रूपरेखा अभी तय होनी बाकी है। यदि तकनीकी और आर्थिक स्तर पर यह योजना व्यवहार्य साबित होती है, तो अरब सागर के नीचे बनने वाला यह ऊर्जा नेटवर्क भारत के लिए पश्चिम एशिया से तेल और गैस की आपूर्ति का एक नया माध्यम बन सकता है। साथ ही, यह देश की लंबे समय की ऊर्जा रणनीति में समुद्री परिवहन के साथ एक अतिरिक्त पाइपलाइन नेटवर्क को शामिल करने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हो सकता है।