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LPU कैंपस बवाल पर हाईकोर्ट की नजर, सरकार से पूछा-हिंसा के बाद अब तक क्या हुआ?

फगवाड़ा स्थित लवली प्रोफेशनल यूनिवर्सिटी (LPU) में हाल में हुई हिंसा और तोड़फोड़ के मामले में पंजाब एवं हरियाणा हाईकोर्ट ने राज्य सरकार से अब तक की पुलिस कार्रवाई का विस्तृत ब्योरा मांगा है। विश्वविद्यालय परिसर में हुई घटनाओं की केंद्रीय जांच ब्यूरो (CBI) से जांच कराने की मांग को लेकर दाखिल जनहित याचिका पर सुनवाई करते हुए अदालत ने पंजाब सरकार को मामले की जांच की मौजूदा स्थिति से संबंधित रिपोर्ट पेश करने का निर्देश दिया। अदालत के सामने यह मामला ऐसे समय में आया है, जब विश्वविद्यालय परिसर में कथित तौर पर हुई हिंसक घटनाओं को लेकर कई तरह के सवाल उठाए गए हैं। याचिकाकर्ता की ओर से पूरे घटनाक्रम की निष्पक्ष और स्वतंत्र जांच की मांग की गई है, जबकि राज्य सरकार ने अदालत को बताया कि मामले में प्राथमिकी दर्ज कर पुलिस स्तर पर जांच की जा रही है।

मामले की सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने सरकार से यह स्पष्ट करने को कहा कि घटना के बाद पुलिस और प्रशासन की ओर से अब तक कौन-कौन से कदम उठाए गए हैं। अदालत द्वारा मांगी गई स्थिति रिपोर्ट में जांच की प्रगति, दर्ज मामलों और अब तक सामने आए तथ्यों की जानकारी दिए जाने की उम्मीद है। फिलहाल अदालत ने सीबीआई जांच की मांग को स्वीकार करने या खारिज करने को लेकर कोई अंतिम आदेश नहीं दिया है। इस संबंध में आगे की कार्यवाही सरकार की ओर से पेश की जाने वाली रिपोर्ट और जांच से जुड़े तथ्यों के आधार पर आगे बढ़ेगी। इस मामले में अदालत की दिलचस्पी मुख्य रूप से इस बात को लेकर है कि हिंसा के बाद पुलिस ने किस तरह जांच आगे बढ़ाई और घटना से जुड़े विभिन्न आरोपों की पड़ताल किस स्तर तक पहुंची है।

सोशल मीडिया पर सामने आई पोस्ट के बाद बिगड़ा माहौल

जनहित याचिका में पूरे विवाद की शुरुआत सोशल मीडिया पर प्रसारित हुई एक पोस्ट से जुड़ी बताई गई है। याचिका के मुताबिक, 26 सितंबर की रात सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म रेडिट पर विश्वविद्यालय की एक छात्रा से कथित दुष्कर्म और बाद में उसके आत्महत्या करने से संबंधित एक पोस्ट सामने आई थी। इस पोस्ट में विश्वविद्यालय से जुड़े एक कर्मचारी पर गंभीर आरोप लगाए गए थे। इसके बाद कथित तौर पर यह सामग्री व्हाट्सऐप संदेशों और सोशल मीडिया के अन्य माध्यमों से भी प्रसारित हुई। याचिका में दावा किया गया है कि इन संदेशों के फैलने के बाद विश्वविद्यालय परिसर में छात्रों के बीच आक्रोश और तनाव का माहौल बन गया।

याचिकाकर्ता के अनुसार, सोशल मीडिया पर सामने आई जानकारी की वजह से बड़ी संख्या में विद्यार्थी विश्वविद्यालय के छात्रावास जीएच-3 के आसपास इकट्ठा होने लगे। देखते ही देखते स्थिति प्रदर्शन में बदल गई। याचिका में घटनाक्रम का जो विवरण दिया गया है, उसके अनुसार देर रात तक परिसर में छात्रों की संख्या बढ़ती गई और इसके बाद विरोध प्रदर्शन ने कथित तौर पर उग्र रूप ले लिया। हालांकि सोशल मीडिया पर प्रसारित मूल दावों और उनके पीछे मौजूद तथ्यों की पुष्टि जांच का विषय है। यही वजह है कि अदालत के समक्ष मामले की स्वतंत्र जांच की मांग रखी गई है, ताकि सोशल मीडिया पर किए गए दावों और जमीन पर हुई वास्तविक घटनाओं के बीच की स्थिति स्पष्ट हो सके।

रात में हाईवे पर प्रदर्शन का भी दावा

याचिका में यह भी आरोप लगाया गया है कि देर रात प्रदर्शन कर रहे विद्यार्थियों का एक समूह विश्वविद्यालय परिसर से बाहर निकला और फगवाड़ा-जालंधर मार्ग पर राष्ट्रीय राजमार्ग-44 को अवरुद्ध कर दिया। याचिका में घटनाक्रम का समय करीब रात दो बजे बताया गया है। सड़क अवरुद्ध किए जाने के बाद वहां यातायात प्रभावित होने और स्थिति तनावपूर्ण होने का दावा किया गया है। इसके बाद विश्वविद्यालय परिसर में भी कई घटनाएं होने का आरोप याचिका में लगाया गया है।

याचिकाकर्ता ने दावा किया है कि प्रदर्शन के दौरान विश्वविद्यालय की संपत्ति को नुकसान पहुंचाया गया और कुछ स्थानों पर तोड़फोड़ तथा आगजनी की घटनाएं हुईं। इसके अलावा सुरक्षा कर्मचारियों के साथ कथित मारपीट और परिसर में लूटपाट जैसे आरोप भी लगाए गए हैं। याचिका में यह सवाल भी उठाया गया है कि क्या हिंसा में केवल विश्वविद्यालय के विद्यार्थी शामिल थे या फिर परिसर के बाहर के कुछ लोग भी वहां पहुंचे थे। हालांकि बाहरी लोगों की कथित मौजूदगी सहित इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हुई है। इन सभी पहलुओं पर पुलिस जांच के बाद ही स्पष्ट तस्वीर सामने आने की संभावना है।

याचिकाकर्ता ने उठाए जांच की निष्पक्षता पर सवाल

विद्यार्थी रवि राज की ओर से दाखिल जनहित याचिका में अदालत से पूरे मामले की जांच केंद्रीय एजेंसी को सौंपने की मांग की गई है। याचिका का आधार यह है कि घटनाक्रम के अलग-अलग पहलुओं की निष्पक्ष जांच जरूरी है और जांच के दौरान किसी भी संभावित दबाव या प्रभाव की गुंजाइश नहीं होनी चाहिए। याचिकाकर्ता ने अदालत से आग्रह किया है कि मामले की जांच सीबीआई को दी जाए और पूरी प्रक्रिया न्यायालय की निगरानी में कराई जाए।

याचिका में हिंसा के पीछे की परिस्थितियों, सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री, प्रदर्शन के दौरान हुई कथित घटनाओं और विश्वविद्यालय की संपत्ति को हुए नुकसान की जांच की मांग की गई है। इसके साथ ही यह पता लगाने की आवश्यकता पर जोर दिया गया है कि घटनाओं में कौन-कौन लोग शामिल थे और विवाद किस तरह हिंसक स्थिति में बदला। याचिका में लगाए गए आरोप अभी न्यायिक रूप से साबित नहीं हुए हैं और इनकी वास्तविकता जांच के दौरान सामने आए साक्ष्यों के आधार पर तय होगी।

पंजाब सरकार ने अदालत को क्या बताया?

सुनवाई के दौरान राज्य सरकार की ओर से हाईकोर्ट को बताया गया कि मामले में पुलिस ने प्राथमिकी दर्ज की हैं और जांच जारी है। सरकार के इस पक्ष के बाद अदालत ने केवल यह जानकारी देने के बजाय जांच की विस्तृत प्रगति रिपोर्ट पेश करने को कहा कि एफआईआर दर्ज कर दी गई है। हाईकोर्ट अब यह देखना चाहता है कि प्राथमिकी दर्ज होने के बाद जांच किस दिशा में आगे बढ़ी है और अब तक पुलिस ने क्या कार्रवाई की है।

अदालत की ओर से मांगी गई रिपोर्ट में जांच की स्थिति से जुड़े तथ्य सामने आने की उम्मीद है। इसमें दर्ज मामलों, पुलिस द्वारा उठाए गए कदमों और जांच के दौरान सामने आए महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी शामिल हो सकती है। हालांकि रिपोर्ट में क्या-क्या विवरण होगा, यह सरकार की ओर से उसे अदालत में पेश किए जाने के बाद ही स्पष्ट होगा। इस रिपोर्ट के आधार पर अदालत आगे की सुनवाई में सीबीआई जांच की मांग समेत याचिका में उठाए गए अन्य मुद्दों पर विचार कर सकती है।

सोशल मीडिया के दावों की जांच भी अहम

इस पूरे मामले में सोशल मीडिया पर प्रसारित जानकारी भी जांच का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन सकती है। याचिका में जिस रेडिट पोस्ट का उल्लेख किया गया है, उसमें छात्रा से संबंधित गंभीर दावे किए गए थे। इसके बाद कथित तौर पर व्हाट्सऐप और अन्य माध्यमों पर संदेश तेजी से प्रसारित हुए। ऐसे में जांच के दौरान यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि पोस्ट की मूल जानकारी क्या थी, उसे किसने साझा किया और उसके बाद फैली सूचनाओं में कितनी वास्तविक और कितनी अपुष्ट जानकारी थी।

किसी सोशल मीडिया पोस्ट के आधार पर उत्पन्न तनाव और उसके बाद हुई कथित हिंसा के बीच संबंध स्थापित करने के लिए पुलिस को घटनाक्रम की समय-रेखा, डिजिटल सामग्री और प्रत्यक्षदर्शियों समेत विभिन्न पहलुओं की जांच करनी पड़ सकती है। याचिका में भी इसी तरह पूरे घटनाक्रम की व्यापक जांच की मांग की गई है। हालांकि सोशल मीडिया पर प्रसारित सामग्री को अपने आप में घटना का प्रमाण नहीं माना जा सकता; उसके दावों की पुष्टि संबंधित जांच एजेंसियों और उपलब्ध साक्ष्यों से होना जरूरी है।

अब सरकार की रिपोर्ट पर टिकी नजर

हाईकोर्ट द्वारा स्थिति रिपोर्ट मांगे जाने के बाद मामले की अगली दिशा काफी हद तक पंजाब सरकार की ओर से पेश किए जाने वाले विवरण पर निर्भर करेगी। अदालत यह जानना चाहती है कि पुलिस ने हिंसा के आरोपों की जांच किस स्तर तक की है, किन घटनाओं को लेकर मामले दर्ज किए गए हैं और अब तक की जांच में क्या तथ्य सामने आए हैं। साथ ही यह भी महत्वपूर्ण होगा कि याचिका में लगाए गए आरोपों की जांच किस प्रकार की जा रही है।

फिलहाल अदालत ने विश्वविद्यालय में हुई कथित हिंसा को लेकर किसी आरोप को अंतिम रूप से सही नहीं माना है और न ही सीबीआई जांच के संबंध में अंतिम निर्णय दिया है। अगली सुनवाई में सरकार की रिपोर्ट सामने आने के बाद अदालत पूरे मामले की जांच प्रक्रिया और याचिकाकर्ता की मांग पर आगे विचार कर सकती है। इस बीच पुलिस जांच जारी है और मामले से जुड़े आरोपों की पुष्टि या खंडन जांच के दौरान सामने आने वाले साक्ष्यों के आधार पर ही हो सकेगा। एलपीयू परिसर में हुई घटनाओं को लेकर हाईकोर्ट की निगरानी में आगे होने वाली सुनवाई इसलिए महत्वपूर्ण होगी क्योंकि इससे यह स्पष्ट हो सकता है कि पुलिस जांच किस दिशा में बढ़ी है और सीबीआई जांच की मांग पर अदालत का अगला रुख क्या रहता है।