देश में मतदाता सूचियों के विशेष गहन पुनरीक्षण यानी SIR को लेकर चल रहा विवाद अब सुप्रीम कोर्ट में अहम मोड़ पर पहुंच गया है। इस मामले में आज अदालत में सुनवाई होनी है। कांग्रेस नेता राहुल गांधी सहित विपक्ष के 13 नेताओं ने SIR प्रक्रिया पर सवाल उठाते हुए शीर्ष अदालत का दरवाजा खटखटाया है। याचिकाकर्ताओं ने मांग की है कि इस प्रक्रिया पर रोक लगाने के साथ-साथ चुनाव आयोग के फैसलों की जांच कराई जाए और संबंधित रिकॉर्ड को सार्वजनिक किया जाए। विपक्ष का कहना है कि मतदाता सूची में संशोधन की प्रक्रिया पारदर्शी होनी चाहिए, ताकि किसी भी पात्र नागरिक का मतदान का अधिकार प्रभावित न हो।
इस मामले में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अपना जवाब दाखिल कर दिया है। आयोग ने अपने पक्ष में कहा है कि SIR से जुड़े फैसले सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग ने यह भी स्पष्ट किया कि प्रक्रिया के दौरान अपनाए गए नियमों और व्यवस्थाओं को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब अदालत में दिया जाएगा। अब सुनवाई के दौरान अदालत के सामने विपक्ष की मांगों और चुनाव आयोग के तर्कों पर विचार किए जाने की संभावना है।
12 अक्टूबर को विपक्षी नेताओं ने निकाला था मार्च
SIR के खिलाफ विपक्षी दलों की नाराजगी पहले भी सामने आ चुकी है। राहुल गांधी समेत 13 विपक्षी नेताओं ने 12 अक्टूबर को इस मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट तक मार्च निकाला था। इसके बाद नेताओं की ओर से याचिका दाखिल की गई। याचिकाकर्ताओं ने विशेष गहन पुनरीक्षण की प्रक्रिया और इसे लागू करने के तरीके पर सवाल उठाते हुए अदालत से हस्तक्षेप की मांग की।
विपक्षी नेताओं का तर्क है कि मतदाता सूची तैयार करने और उसमें संशोधन करने की प्रक्रिया में पारदर्शिता बनाए रखना जरूरी है। उनका कहना है कि इस तरह की कवायद का असर सीधे नागरिकों के मताधिकार पर पड़ सकता है। इसलिए प्रक्रिया के प्रत्येक महत्वपूर्ण चरण और उससे संबंधित निर्णयों की उचित जांच होनी चाहिए।
याचिका पर 15 अक्टूबर को सुप्रीम कोर्ट में पहली बार सुनवाई हुई थी। उस दौरान अदालत ने चुनाव आयोग, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और अन्य चुनाव आयुक्तों को नोटिस जारी किया था। इसके साथ ही पीठ ने निर्देश दिया था कि इस याचिका को SIR से संबंधित पहले से लंबित मामलों के साथ जोड़ दिया जाए। इस आदेश के बाद मामले की सुनवाई पहले से चल रहे संबंधित विवादों के साथ होने का रास्ता साफ हुआ।
सुप्रीम कोर्ट में क्या मांग कर रहे हैं विपक्षी नेता?
विपक्ष की याचिका में SIR प्रक्रिया को लेकर कई तरह की आपत्तियां उठाई गई हैं। याचिकाकर्ता चाहते हैं कि जब तक मामले में उठाए गए सवालों की जांच नहीं हो जाती, तब तक इस प्रक्रिया पर रोक लगाने के अनुरोध पर विचार किया जाए। इसके अलावा चुनाव आयोग के निर्णय लेने के तरीके की जांच और उससे जुड़े रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग भी की गई है।
विपक्ष की प्रमुख चिंता यह है कि मतदाता सूची में नाम जोड़ने, हटाने या किसी मतदाता की जानकारी का सत्यापन करने की प्रक्रिया में किसी तरह की अनियमितता नहीं होनी चाहिए। नेताओं के मुताबिक, चुनावी व्यवस्था में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए जरूरी है कि नियम स्पष्ट हों और निर्णयों का आधार भी समझ में आए।
हालांकि, SIR पर रोक लगाने और रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग अभी याचिकाकर्ताओं का पक्ष है। इन मांगों पर अदालत क्या रुख अपनाती है, यह सुनवाई और आगे की न्यायिक कार्यवाही से स्पष्ट होगा। चुनाव आयोग ने भी अपना पक्ष रखा है और वह प्रक्रिया से जुड़े निर्णयों को नियमों के अनुरूप बता रहा है।
चुनाव आयोग ने कहा- सभी फैसले सहमति से लिए गए
सुप्रीम कोर्ट में दाखिल जवाब में चुनाव आयोग ने कहा है कि SIR से संबंधित निर्णय सर्वसम्मति से लिए गए थे। आयोग के अनुसार, मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार और चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू तथा विवेक जोशी की इन फैसलों पर सहमति थी। आयोग ने यह भी बताया कि अदालत में जमा किए गए हलफनामे पर तीनों के हस्ताक्षर हैं।
आयोग ने अपने जवाब में यह दलील भी दी कि किसी सरकारी या संस्थागत फाइल पर सवाल, सुझाव अथवा आपत्ति दर्ज होने का अर्थ यह नहीं है कि संबंधित अधिकारी ने अंतिम निर्णय का विरोध किया था। आयोग के मुताबिक, फाइल पर की गई टिप्पणियों को अंतिम फैसले से अलग करके देखा जाना चाहिए। केवल किसी टिप्पणी के आधार पर यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि आयोग का निर्णय सर्वसम्मति से नहीं हुआ।
इस दलील के जरिए आयोग ने निर्णय लेने की प्रक्रिया को लेकर उठाए गए सवालों का जवाब देने की कोशिश की है। अब अदालत इन तथ्यों और याचिकाकर्ताओं की आपत्तियों पर किस तरह विचार करती है, यह महत्वपूर्ण होगा।
फॉर्म-6 में बदलाव के आरोप पर आयोग की सफाई
चुनाव आयोग ने SIR के फॉर्म-6 को लेकर भी अपना पक्ष स्पष्ट किया है। आयोग ने कहा है कि उसने फॉर्म-6 में कोई बदलाव नहीं किया है। उसके मुताबिक, संबंधित नियमों के तहत इस फॉर्म में संशोधन करने का अधिकार केंद्र सरकार के पास है।
फॉर्म-6 मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने के लिए इस्तेमाल किया जाता है। ऐसे में इस फॉर्म से जुड़ा कोई भी बदलाव मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया के लिहाज से महत्वपूर्ण हो सकता है। आयोग की ओर से दी गई सफाई का उद्देश्य यह स्पष्ट करना है कि फॉर्म में बदलाव करने का निर्णय उसके स्तर पर नहीं लिया गया।
विपक्ष की याचिका में उठाए गए मुद्दों के संदर्भ में यह स्पष्टीकरण भी सुनवाई के दौरान चर्चा का विषय बन सकता है। हालांकि, इस संबंध में अंतिम स्थिति अदालत के समक्ष रखे गए दस्तावेजों और दलीलों के आधार पर ही स्पष्ट होगी।
पुराने वोटर रिकॉर्ड से नाम नहीं मिला तो BLO करेंगे मदद
चुनाव आयोग ने मतदाताओं के सत्यापन की प्रक्रिया को लेकर भी जानकारी दी है। आयोग के अनुसार, जिन मतदाताओं के नाम का मिलान पुरानी मतदाता सूची से नहीं हो पाया है, उनके मामले में बूथ लेवल ऑफिसर यानी BLO घर जाकर जरूरी दस्तावेज जुटा सकते हैं। इसके बाद इन दस्तावेजों को ऑनलाइन अपलोड किया जाएगा।
इस व्यवस्था का उद्देश्य उन मतदाताओं की जानकारी का सत्यापन करना है, जिनके रिकॉर्ड का पुरानी सूची से सीधा मिलान नहीं हो सका है। ऐसे मामलों में मतदाताओं को आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध कराने में सहायता देने की बात कही गई है।
आयोग ने यह भी कहा है कि प्रत्येक ऐसे मतदाता को सुनवाई के लिए चुनाव कार्यालय में व्यक्तिगत रूप से उपस्थित होने की जरूरत नहीं होगी। जरूरत के मुताबिक सुनवाई आयोजित की जाएगी और जहां संभव होगा, वहां ऑनलाइन माध्यम का इस्तेमाल किया जा सकता है।
इस स्पष्टीकरण से आयोग ने यह बताने की कोशिश की है कि सत्यापन के दौरान सभी मतदाताओं को एक ही तरह से कार्यालय बुलाना जरूरी नहीं है। हालांकि, अलग-अलग मामलों में दस्तावेजों की जरूरत और सुनवाई की प्रक्रिया संबंधित परिस्थितियों पर निर्भर करेगी।
मतदाता सूची में नाम जोड़ने या हटाने का अधिकार किसके पास?
चुनाव आयोग ने स्पष्ट किया है कि किसी व्यक्ति का नाम मतदाता सूची में जोड़ने या हटाने का फैसला सक्षम चुनाव अधिकारी के आदेश के बिना नहीं किया जाएगा। आयोग के जवाब के मुताबिक, इस तरह के निर्णय लेने का अधिकार निर्वाचक पंजीकरण अधिकारी यानी ERO के पास होता है।
मतदाता सूची में नाम दर्ज होना नागरिक के मतदान अधिकार से सीधे जुड़ा है। इसलिए नाम जोड़ने या हटाने की प्रक्रिया में निर्धारित नियमों और अधिकृत अधिकारी की भूमिका अहम होती है। आयोग की ओर से दिया गया यह स्पष्टीकरण इस बात पर जोर देता है कि सूची में बदलाव निर्धारित प्रशासनिक प्रक्रिया के तहत ही किए जाने चाहिए।
विपक्ष की मांग है कि SIR से जुड़े फैसलों और उनके रिकॉर्ड की जांच हो। ऐसे में मतदाता सूची में संशोधन के अधिकार, प्रक्रिया और जवाबदेही से जुड़े पहलू भी मामले के महत्वपूर्ण हिस्से बने हुए हैं।
ECINet प्लेटफॉर्म की जांच के लिए विशेषज्ञ समिति
चुनाव आयोग ने अपने जवाब में ECINet प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली को लेकर भी जानकारी दी है। आयोग के अनुसार, इस प्लेटफॉर्म की जांच के लिए IIT मद्रास और भारतीय विज्ञान संस्थान यानी IISc बेंगलुरु के विशेषज्ञों की एक समिति गठित की गई है।
यह समिति यह देखेगी कि ECINet प्लेटफॉर्म सही तरीके से काम कर रहा है या नहीं। इसके साथ ही यह भी जांचा जाएगा कि प्लेटफॉर्म की कार्यप्रणाली निर्धारित नियमों और प्रक्रियाओं के अनुरूप है या नहीं।
चुनावी प्रक्रिया में डिजिटल प्लेटफॉर्म की भूमिका को देखते हुए उसकी तकनीकी विश्वसनीयता और नियमों के पालन का सत्यापन महत्वपूर्ण माना जा सकता है। आयोग की ओर से विशेषज्ञ समिति का उल्लेख इसी जांच व्यवस्था के संदर्भ में किया गया है।
हालांकि, समिति की जांच के नतीजे क्या होंगे और उनसे आगे कौन-से निष्कर्ष निकलेंगे, यह अभी स्पष्ट नहीं है। इस विषय पर आयोग ने अदालत को अपने जवाब में जानकारी दी है।
मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने की प्रक्रिया पर भी दिया जवाब
चुनाव आयोग ने मुख्य चुनाव आयुक्त को पद से हटाने के संवैधानिक प्रावधानों का भी उल्लेख किया है। आयोग के मुताबिक, संविधान में मुख्य चुनाव आयुक्त को हटाने के लिए वही प्रक्रिया और आधार निर्धारित हैं, जो सुप्रीम कोर्ट के किसी न्यायाधीश को हटाने के मामले में लागू होते हैं।
यह प्रावधान मुख्य चुनाव आयुक्त के पद से जुड़ी संवैधानिक व्यवस्था और उसकी संस्थागत स्वतंत्रता के संदर्भ में महत्वपूर्ण है। आयोग ने इस बिंदु को अपने जवाब में शामिल करके संबंधित संवैधानिक स्थिति स्पष्ट की है।
इसके अतिरिक्त, आयोग ने बताया कि दशहरे की छुट्टियों के कारण फिलहाल संक्षिप्त जवाब दाखिल किया गया है। जरूरत पड़ने पर वह याचिका में लगाए गए आरोपों और उठाए गए सवालों पर विस्तृत जवाब भी पेश करेगा।
आज की सुनवाई पर टिकी निगाहें
SIR विवाद में अब सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई अहम मानी जा रही है। एक तरफ विपक्षी नेताओं ने प्रक्रिया पर रोक, निर्णयों की जांच और रिकॉर्ड सार्वजनिक करने की मांग की है, तो दूसरी तरफ चुनाव आयोग ने अपने फैसलों को सर्वसम्मति से लिया गया बताते हुए विभिन्न मुद्दों पर सफाई दी है।
अदालत के सामने अब याचिकाकर्ताओं की दलीलों और आयोग के जवाब के बीच उठने वाले कानूनी सवाल महत्वपूर्ण होंगे। विशेष रूप से मतदाता सूची के पुनरीक्षण की प्रक्रिया, दस्तावेजों के सत्यापन, निर्णय लेने की व्यवस्था और तकनीकी प्लेटफॉर्म की जांच जैसे पहलुओं पर ध्यान दिया जा सकता है।
फिलहाल, SIR पर रोक लगाने की मांग को अदालत ने स्वीकार किया है या नहीं, इसे लेकर कोई निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा। इस पर फैसला न्यायिक कार्यवाही के बाद ही स्पष्ट होगा। आज की सुनवाई से यह संकेत मिल सकता है कि अदालत इस विवाद को आगे किस दिशा में ले जाना चाहती है और चुनाव आयोग से किन मुद्दों पर अतिरिक्त जानकारी मांगी जा सकती है।
इस मामले का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि मतदाता सूची चुनावी प्रक्रिया का बुनियादी हिस्सा है। ऐसे में SIR को लेकर उठे सवालों का समाधान कानूनी नियमों, उपलब्ध रिकॉर्ड और अदालत के विचार के आधार पर होना है। अब सभी की निगाहें सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और आगे आने वाले निर्देशों पर टिकी हैं।