संयुक्त राष्ट्र महासभा की बहुप्रतीक्षित जनरल डिबेट आज यानी 22 सितंबर 2026 से शुरू होने जा रही है। न्यूयॉर्क स्थित संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय में होने वाले इस कार्यक्रम में दुनिया के 193 सदस्य देशों के राष्ट्राध्यक्ष, सरकार प्रमुख या वरिष्ठ प्रतिनिधि अपने-अपने देशों की प्राथमिकताएं और अंतरराष्ट्रीय मुद्दों पर विचार रखेंगे। इस दौरान युद्ध, सुरक्षा, आतंकवाद, ऊर्जा, आर्थिक चुनौतियों और वैश्विक सहयोग जैसे मुद्दे चर्चा के केंद्र में रहेंगे।
इस साल जनरल डिबेट की शुरुआत ब्राजील के राष्ट्रपति लुइज इनासियो लूला दा सिल्वा के संबोधन से होगी। उनके बाद मेजबान देश अमेरिका के राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प महासभा को संबोधित करेंगे। ट्रम्प का भाषण इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि संयुक्त राष्ट्र में उनके पिछले संबोधन कई बार सुर्खियां बटोर चुके हैं। 2025 में भाषण के दौरान टेलीप्रॉम्प्टर से जुड़ी तकनीकी समस्या पर उनकी नाराजगी सामने आई थी, जबकि 2018 में उनके एक दावे पर महासभा कक्ष में हंसी सुनाई दी थी।
ब्राजील और अमेरिका को सबसे पहले बोलने की जिम्मेदारी क्यों?
UN महासभा की जनरल डिबेट में भाषणों का क्रम देखने पर एक पुरानी परंपरा नजर आती है। ब्राजील को आमतौर पर सबसे पहले बोलने का अवसर मिलता है और उसके बाद अमेरिका का नंबर आता है। हालांकि, यह संयुक्त राष्ट्र के किसी लिखित नियम का हिस्सा नहीं है।
इसके पीछे संयुक्त राष्ट्र के शुरुआती वर्षों से जुड़ी एक दिलचस्प वजह बताई जाती है। जब UN ने काम करना शुरू किया था, तब सदस्य देश महासभा में सबसे पहले भाषण देने की जिम्मेदारी लेने को लेकर उत्सुक नहीं थे। ऐसे में ब्राजील ने शुरुआती दौर में यह भूमिका निभाई। बाद में यह एक स्थापित परंपरा बन गई और 1955 से ब्राजील को लगातार जनरल डिबेट की शुरुआत करने वाले देश के रूप में देखा जाता है।
ब्राजील के बाद अमेरिका को मंच मिलने के पीछे उसका मेजबान देश होना प्रमुख कारण है। संयुक्त राष्ट्र का मुख्यालय न्यूयॉर्क में स्थित है, इसलिए अमेरिका को ब्राजील के बाद संबोधन का मौका देने की परंपरा विकसित हुई।
इसके बाद भाषणों का कार्यक्रम संयुक्त राष्ट्र की व्यवस्था के अनुसार तय होता है। इसमें विभिन्न व्यावहारिक और कूटनीतिक पहलुओं को ध्यान में रखा जाता है, जैसे किसी देश का प्रतिनिधित्व कौन कर रहा है, पिछले वर्षों में उस देश को किस क्रम में बोलने का अवसर मिला और सभी सदस्य देशों के बीच बोलने का संतुलन कैसे रखा जाए।
जनरल डिबेट में आमने-सामने बहस नहीं होती
नाम से ऐसा लग सकता है कि जनरल डिबेट में दुनिया के नेता एक-दूसरे के साथ सीधे बहस करते हैं, लेकिन ऐसा नहीं है। यह मूल रूप से वह वार्षिक मंच है, जहां UN के सदस्य देश महासभा के सामने अपने विचार और प्राथमिकताएं प्रस्तुत करते हैं।
हर साल सितंबर में दुनिया के अलग-अलग हिस्सों से राष्ट्राध्यक्ष और वरिष्ठ प्रतिनिधि न्यूयॉर्क पहुंचते हैं। अपने संबोधन में वे अपने देश से जुड़े मुद्दों के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय चुनौतियों पर भी बात करते हैं। युद्ध और शांति से लेकर आर्थिक विकास, जलवायु, आतंकवाद, ऊर्जा और वैश्विक संस्थाओं में सुधार जैसे विषय इस दौरान उठते रहे हैं।
जनरल डिबेट के दौरान केवल भाषण ही नहीं होते। न्यूयॉर्क में मौजूद विभिन्न देशों के नेता और प्रतिनिधि एक-दूसरे के साथ द्विपक्षीय और बहुपक्षीय बैठकें भी करते हैं। इन मुलाकातों में व्यापार, सुरक्षा, कूटनीति, युद्ध, ऊर्जा और क्षेत्रीय परिस्थितियों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत होती है।
इसी वजह से UN महासभा का यह वार्षिक सप्ताह दुनिया की कूटनीतिक गतिविधियों के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। कई बार मंच से दिए गए भाषणों के साथ-साथ नेताओं के बीच होने वाली अलग-अलग बैठकें भी अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बन जाती हैं।
ट्रम्प के भाषण से जुड़ी दो घटनाएं पहले भी चर्चा में रहीं
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प का संयुक्त राष्ट्र में संबोधन पहले भी तकनीकी समस्या और अपनी टिप्पणियों को लेकर चर्चा में रहा है।
2025 में UN महासभा में भाषण के दौरान टेलीप्रॉम्प्टर में तकनीकी दिक्कत आई थी। इस वजह से ट्रम्प नाराज नजर आए थे। भाषण के दौरान टेलीप्रॉम्प्टर का इस्तेमाल नेताओं को निर्धारित वक्तव्य देने में मदद करता है, इसलिए ऐसी तकनीकी समस्या मंच पर असहज स्थिति पैदा कर सकती है।
इससे पहले 2018 में भी ट्रम्प का UN महासभा में दिया गया भाषण सुर्खियों में रहा था। उन्होंने अपने प्रशासन और अमेरिका के प्रदर्शन की तारीफ करते हुए एक दावा किया था। उनके इस बयान के बाद महासभा हॉल में मौजूद लोगों के बीच हंसी सुनाई दी थी। ट्रम्प ने भी उस प्रतिक्रिया पर टिप्पणी करते हुए कहा था कि उन्हें ऐसी प्रतिक्रिया की उम्मीद नहीं थी।
इसी पुराने संदर्भ के कारण इस बार उनके संबोधन पर भी अंतरराष्ट्रीय मीडिया की नजर रहेगी। हालांकि, इस साल के भाषण में वे किन मुद्दों को प्राथमिकता देंगे और किस तरह की घोषणाएं या टिप्पणियां करेंगे, यह उनके संबोधन के दौरान ही स्पष्ट होगा।
अमेरिका-ईरान संपर्क पर भी निगाहें
इस बार न्यूयॉर्क में होने वाली बैठकों के बीच अमेरिका और ईरान के राष्ट्राध्यक्षों के बीच संभावित मुलाकात भी खास चर्चा में है। ट्रम्प ने ईरानी राष्ट्रपति के साथ मुलाकात के लिए अपनी तैयारी का संकेत दिया है।
दोनों देशों के बीच लंबे समय से तनावपूर्ण संबंध रहे हैं और मौजूदा समय में पश्चिम एशिया की स्थिति भी अंतरराष्ट्रीय राजनीति का प्रमुख विषय बनी हुई है। ऐसे में यदि दोनों नेताओं के बीच बातचीत होती है तो उसका फोकस क्षेत्रीय सुरक्षा, संघर्ष, कूटनीतिक संबंध और आगे की स्थिति पर हो सकता है।
हालांकि, किसी संभावित बैठक का होना और उसमें क्या चर्चा होगी, इसे लेकर अंतिम स्थिति संबंधित पक्षों की बातचीत और कार्यक्रम पर निर्भर करेगी। न्यूयॉर्क में एक ही समय पर दुनिया के कई प्रमुख नेताओं की मौजूदगी ऐसे अनौपचारिक और औपचारिक संपर्कों के लिए अवसर भी उपलब्ध कराती है।
15 मिनट का भाषण, लेकिन रिकॉर्ड इससे कहीं आगे
UN जनरल डिबेट में आमतौर पर प्रत्येक देश के नेता या प्रतिनिधि को लगभग 15 मिनट का समय दिया जाता है। इतने सीमित समय का उद्देश्य यह है कि 193 सदस्य देशों को महासभा में अपनी बात रखने का अवसर मिल सके। हालांकि, संयुक्त राष्ट्र के इतिहास में कई नेताओं ने तय समय सीमा से काफी ज्यादा लंबा भाषण दिया है। इस मामले में क्यूबा के पूर्व नेता फिदेल कास्त्रो का नाम सबसे ऊपर आता है।
कास्त्रो ने 1960 में UN महासभा की जनरल डिबेट में करीब 4 घंटे 29 मिनट यानी 269 मिनट तक भाषण दिया था। यह संबोधन संयुक्त राष्ट्र महासभा के सबसे लंबे भाषणों में दर्ज है और आज भी इसका उल्लेख किया जाता है।
भारत के संदर्भ में देखें तो प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 27 सितंबर 2014 को UN महासभा में लगभग 35 मिनट 38 सेकंड का भाषण दिया था। उस संबोधन में भारत से जुड़े विषयों के साथ कई वैश्विक मुद्दों पर भी बात की गई थी।
इस बार भारत के लिए कौन से मुद्दे अहम हो सकते हैं?
UN महासभा का मंच भारत के लिए भी कई महत्वपूर्ण अंतरराष्ट्रीय विषयों को उठाने का अवसर देता है। इनमें आतंकवाद, पश्चिम एशिया, ऊर्जा सुरक्षा, विकासशील देशों की चिंताएं और संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार प्रमुख विषयों में शामिल हैं।
आतंकवाद पर अंतरराष्ट्रीय सहयोग
भारत लंबे समय से आतंकवाद से निपटने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अधिक प्रभावी सहयोग की वकालत करता रहा है। भारत का जोर इस बात पर रहा है कि आतंकवाद के खिलाफ वैश्विक प्रयासों में सभी देशों के बीच बेहतर समन्वय होना चाहिए और आतंकवादी गतिविधियों से निपटने के लिए प्रभावी अंतरराष्ट्रीय तंत्र मजबूत किया जाना चाहिए।
पश्चिम एशिया में भारतीयों की सुरक्षा
पश्चिम एशिया में संघर्ष और तनाव का भारत पर सीधा असर पड़ सकता है। इस क्षेत्र में बड़ी संख्या में भारतीय नागरिक काम करते हैं। किसी बड़े संघर्ष या सुरक्षा संकट की स्थिति में उनकी सुरक्षा, आवाजाही और आवश्यकता पड़ने पर सुरक्षित निकासी महत्वपूर्ण मुद्दे बन जाते हैं।
ऊर्जा और कच्चे तेल की आपूर्ति
भारत की अर्थव्यवस्था के लिए ऊर्जा सुरक्षा भी अहम है। भारत अपनी तेल जरूरतों का एक बड़ा हिस्सा आयात के जरिए पूरा करता है। पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने पर तेल की कीमतों, समुद्री परिवहन और सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है। इसलिए वैश्विक ऊर्जा बाजार की स्थिरता भारत के लिए महत्वपूर्ण विषय है।
ग्लोबल साउथ की प्राथमिकताएं
भारत विकासशील देशों से जुड़े मुद्दों को भी अंतरराष्ट्रीय मंचों पर प्रमुखता देता रहा है। ग्लोबल साउथ के सामने गरीबी, विकास के लिए वित्त, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा उपलब्धता और कर्ज जैसी चुनौतियां हैं। भारत इन देशों की चिंताओं को वैश्विक संस्थाओं में अधिक जगह देने की बात करता रहा है।
UNSC में सुधार की मांग
संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद में सुधार भारत की लंबे समय से चली आ रही प्रमुख कूटनीतिक प्राथमिकताओं में शामिल है। भारत का तर्क रहा है कि मौजूदा वैश्विक शक्ति-संतुलन और आज की अंतरराष्ट्रीय वास्तविकताओं को देखते हुए संयुक्त राष्ट्र की संस्थागत संरचना में बदलाव की जरूरत है।
कई दिनों तक चलेगा नेताओं का जमावड़ा
जनरल डिबेट 22 सितंबर से शुरू होकर 28 सितंबर तक चलेगी। इन दिनों न्यूयॉर्क में दुनिया के लगभग सभी प्रमुख देशों के प्रतिनिधियों की मौजूदगी रहेगी। महासभा के मंच से होने वाले भाषणों के अलावा अलग-अलग देशों के बीच होने वाली बैठकों और बातचीत पर भी नजर रहेगी।
इस पूरे आयोजन में एक तरफ जहां सदस्य देश अपने राष्ट्रीय हितों और अंतरराष्ट्रीय प्राथमिकताओं को सामने रखेंगे, वहीं दूसरी तरफ युद्ध, सुरक्षा, ऊर्जा, व्यापार और वैश्विक संस्थाओं से जुड़े मुद्दों पर कूटनीतिक बातचीत का दौर भी चलेगा। ऐसे में अगले कुछ दिनों तक संयुक्त राष्ट्र मुख्यालय वैश्विक कूटनीति के प्रमुख केंद्रों में शामिल रहेगा।