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इजरायल के फैसले से नाराज हुआ अजरबैजान, अर्मेनियाई नरसंहार की मान्यता पर उठाए सवाल; रिश्तों में बढ़ सकती है दूरी

इजरायल और अजरबैजान के बीच लंबे समय से मजबूत रणनीतिक और कूटनीतिक संबंध रहे हैं, लेकिन हालिया घटनाक्रम ने दोनों देशों के रिश्तों में तनाव पैदा कर दिया है। अजरबैजान ने इजरायल सरकार के उस फैसले पर कड़ी प्रतिक्रिया जताई है, जिसमें उसने 1915 के अर्मेनियाई नरसंहार को आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। अजरबैजान का कहना है कि यह फैसला ऐतिहासिक घटनाओं को एकतरफा नजरिए से देखने जैसा है और इससे क्षेत्रीय शांति व आपसी समझ को नुकसान पहुंच सकता है।

अजरबैजान के विदेश मंत्रालय ने सोमवार को जारी बयान में इजरायल के कदम पर चिंता व्यक्त की। बयान में कहा गया कि इतिहास से जुड़े बेहद संवेदनशील मुद्दे को राजनीतिक निर्णय के तौर पर पेश करना उचित नहीं है। अजरबैजान ने दावा किया कि 1915 की घटनाओं को लेकर अलग-अलग ऐतिहासिक और राजनीतिक दृष्टिकोण मौजूद हैं और किसी एक पक्ष की व्याख्या को अंतिम सत्य के रूप में स्वीकार करना सही नहीं होगा।

बयान में इजरायल से अपने फैसले पर दोबारा विचार करने की अपील भी की गई। अजरबैजान ने कहा कि इस तरह के कदम दोनों देशों के बीच सहयोग और मित्रता को मजबूत करने के बजाय दूरी बढ़ा सकते हैं। उसने यह भी कहा कि ऐतिहासिक मुद्दों को लेकर संतुलित और जिम्मेदार रुख अपनाने की जरूरत है।

इजरायल ने क्यों लिया यह फैसला?

इजरायल सरकार ने हाल ही में अर्मेनियाई नरसंहार को औपचारिक मान्यता देने का निर्णय लिया। यह प्रस्ताव इजरायल के विदेश मंत्री गिदोन सार की ओर से पेश किया गया था। सरकार की मंजूरी के बाद इजरायल उन देशों की सूची में शामिल हो गया, जिन्होंने प्रथम विश्व युद्ध के दौरान अर्मेनियाई लोगों के खिलाफ हुई हिंसा को नरसंहार के रूप में स्वीकार किया है।

गिदोन सार ने इस फैसले को ऐतिहासिक न्याय की दिशा में उठाया गया कदम बताया। उन्होंने कहा कि इतने वर्षों बाद भी सच्चाई को स्वीकार करना जरूरी है। उनके अनुसार, 1915 की घटनाओं में बड़ी संख्या में अर्मेनियाई लोगों की जान गई और उनकी संस्कृति व विरासत को भारी नुकसान पहुंचा।

इजरायल ने इससे पहले इस मुद्दे पर काफी सावधानी बरती थी। इसकी वजह तुर्की के साथ कूटनीतिक समीकरण और क्षेत्रीय राजनीति थी। हालांकि, बदलते अंतरराष्ट्रीय हालात और आर्मेनिया के साथ बढ़ते संपर्कों के बीच इजरायल ने अब अपना रुख बदल दिया है।

अजरबैजान और इजरायल के रिश्ते क्यों हैं खास?

अजरबैजान और इजरायल के संबंध कई वर्षों से मजबूत रहे हैं। दोनों देशों के बीच रक्षा, ऊर्जा और सुरक्षा के क्षेत्र में सहयोग रहा है। अजरबैजान इजरायल के लिए एक महत्वपूर्ण साझेदार माना जाता है, जबकि इजरायल भी अजरबैजान के साथ रणनीतिक संबंधों को महत्व देता है।

दोनों देशों के बीच करीबी संबंधों की एक वजह क्षेत्रीय सुरक्षा समीकरण भी हैं। अजरबैजान और आर्मेनिया के बीच लंबे समय से विवाद रहा है, खासकर नागोर्नो-काराबाख क्षेत्र को लेकर। ऐसे में अजरबैजान इजरायल के फैसले को केवल ऐतिहासिक मुद्दे के रूप में नहीं बल्कि क्षेत्रीय राजनीति से जुड़े कदम के तौर पर भी देख रहा है।

अजरबैजान का कहना है कि अर्मेनियाई नरसंहार की मान्यता का मुद्दा राजनीतिक रूप से इस्तेमाल किया जा रहा है। वहीं, इजरायल का कहना है कि उसका फैसला इतिहास को स्वीकार करने और पीड़ितों को सम्मान देने से जुड़ा है।

अर्मेनियाई नरसंहार पर तुर्की का अलग रुख

अर्मेनियाई नरसंहार को लेकर सबसे बड़ा विवाद तुर्की और अर्मेनिया के बीच रहा है। अर्मेनिया और कई अन्य देश मानते हैं कि 1915 से 1916 के बीच ऑटोमन साम्राज्य ने अर्मेनियाई लोगों के खिलाफ व्यवस्थित तरीके से नरसंहार किया।

दूसरी ओर, तुर्की इस घटना को नरसंहार मानने से इनकार करता है। तुर्की का कहना है कि प्रथम विश्व युद्ध के दौरान बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई थी, लेकिन इसे एक योजनाबद्ध नरसंहार कहना ऐतिहासिक रूप से सही नहीं है।

तुर्की का दावा है कि उस समय युद्ध, संघर्ष और बीमारी के कारण बड़े पैमाने पर मौतें हुईं। हालांकि, अर्मेनिया और कई अंतरराष्ट्रीय संस्थाएं इसे जातीय सफाए और नरसंहार के रूप में देखती हैं।

दुनिया के कितने देशों ने दी मान्यता?

अर्मेनियाई नरसंहार को कई देशों ने आधिकारिक तौर पर मान्यता दी है। इनमें अमेरिका, कनाडा, रूस, जर्मनी समेत कई अन्य देश शामिल हैं। संयुक्त राष्ट्र के कई सदस्य देशों ने भी इसे नरसंहार के रूप में स्वीकार किया है।

इसके अलावा कैथोलिक चर्च की सर्वोच्च संस्था होली सी और यूरोपीय संसद भी इस घटना को मान्यता दे चुके हैं। हालांकि, अभी भी कई देश इस मुद्दे पर कूटनीतिक कारणों से स्पष्ट रुख अपनाने से बचते हैं।

इजरायल का फैसला इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि उसने लंबे समय तक इस मामले में संतुलित नीति अपनाई थी। अब मान्यता देने के बाद क्षेत्रीय राजनीति में इसके असर को लेकर चर्चा तेज हो गई है।

क्या बिगड़ सकते हैं इजरायल-अजरबैजान संबंध?

फिलहाल यह कहना मुश्किल है कि अजरबैजान की नाराजगी दोनों देशों के रिश्तों को कितना प्रभावित करेगी। दोनों देशों के बीच आर्थिक और सुरक्षा हित काफी गहरे हैं। इसलिए विशेषज्ञ मानते हैं कि तत्काल बड़े बदलाव की संभावना कम है।

हालांकि, अजरबैजान का सार्वजनिक विरोध यह दिखाता है कि वह इस मुद्दे को गंभीरता से ले रहा है। अगर भविष्य में इस तरह के ऐतिहासिक और राजनीतिक मुद्दों पर मतभेद बढ़ते हैं, तो इसका असर दोनों देशों के संबंधों पर पड़ सकता है।

इजरायल के लिए भी यह एक संतुलन बनाने वाली स्थिति है, क्योंकि एक ओर वह आर्मेनिया के साथ संबंधों को मजबूत करना चाहता है, वहीं दूसरी ओर अजरबैजान जैसे रणनीतिक साझेदार को नाराज नहीं करना चाहता।

1915 की घटनाएं क्या थीं?

अर्मेनियाई नरसंहार का संबंध प्रथम विश्व युद्ध के समय ऑटोमन साम्राज्य से है। 1915 से 1916 के बीच लाखों अर्मेनियाई लोगों की मौत हुई। इतिहासकारों के अनुसार, बड़ी संख्या में अर्मेनियाई लोगों को उनके घरों से निकाल दिया गया और जबरन स्थानांतरण के दौरान हजारों लोगों की जान चली गई।

24 अप्रैल 1915 को कॉन्स्टेंटिनोपल (आज का इस्तांबुल) में बड़ी संख्या में अर्मेनियाई बुद्धिजीवियों और नेताओं को गिरफ्तार किया गया। इस घटना को अक्सर नरसंहार की शुरुआत के रूप में याद किया जाता है।

इसके बाद अर्मेनियाई समुदाय के लोगों को जबरन विस्थापित किया गया। कई पुरुषों की हत्या कर दी गई, जबकि महिलाओं, बच्चों और बुजुर्गों को कठिन परिस्थितियों में रेगिस्तानी इलाकों की ओर भेजा गया। इन घटनाओं में बड़ी संख्या में लोगों की मौत हुई।

यही वजह है कि अर्मेनिया और कई देश इसे 20वीं सदी के शुरुआती बड़े मानवीय अपराधों में गिनते हैं। वहीं, तुर्की आज भी इस शब्दावली को स्वीकार नहीं करता।

इजरायल के नए फैसले ने एक बार फिर इस पुराने ऐतिहासिक विवाद को अंतरराष्ट्रीय चर्चा में ला दिया है। अब नजर इस बात पर है कि आने वाले समय में इजरायल और अजरबैजान इस विवाद को किस तरह संभालते हैं और क्या दोनों देशों के बीच रिश्ते पहले की तरह सामान्य बने रहते हैं।