अमेरिका और ईरान के बीच संबंधों में सुधार की संभावनाओं ने पाकिस्तान में नई उम्मीदें जगा दी हैं। यदि दोनों देशों के बीच हुआ शांति समझौता पूरी तरह लागू होता है और तेहरान पर लगे आर्थिक प्रतिबंधों में ढील मिलती है, तो इसका सबसे बड़ा लाभ पाकिस्तान को मिल सकता है। खासतौर पर लंबे समय से अटकी ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना को नई गति मिलने की संभावना जताई जा रही है।
पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान गंभीर ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है। देश को उद्योगों, बिजली संयंत्रों और घरेलू जरूरतों के लिए पर्याप्त गैस उपलब्ध नहीं हो पा रही है। ऐसे में पड़ोसी देश ईरान से सीधे गैस आयात करने की योजना पाकिस्तान के लिए हमेशा से महत्वपूर्ण रही है। हालांकि अमेरिकी प्रतिबंधों ने इस परियोजना को आगे बढ़ने से रोक रखा था।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि प्रतिबंध हटते हैं तो पाकिस्तान को अपेक्षाकृत कम कीमत पर प्राकृतिक गैस मिल सकेगी। इससे न केवल ऊर्जा क्षेत्र को मजबूती मिलेगी बल्कि देश के आयात खर्च में भी कमी आ सकती है। भौगोलिक निकटता के कारण ईरान से गैस की आपूर्ति समुद्री मार्गों की तुलना में कहीं अधिक सस्ती साबित हो सकती है।
दरअसल, ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन का विचार कोई नया नहीं है। इसकी नींव तीन दशक पहले रखी गई थी। वर्ष 1995 में ईरान, पाकिस्तान और भारत के बीच एक महत्वाकांक्षी योजना सामने आई थी, जिसका मकसद ईरान के विशाल गैस भंडार को दक्षिण एशिया तक पहुंचाना था। शुरुआती दौर में भारत भी इस परियोजना का हिस्सा था, लेकिन बाद में उसने इससे दूरी बना ली। इसके बाद यह परियोजना केवल ईरान और पाकिस्तान तक सीमित रह गई।
करीब 2700 किलोमीटर लंबी प्रस्तावित पाइपलाइन को क्षेत्र की सबसे बड़ी ऊर्जा परियोजनाओं में गिना जाता है। इसका उद्देश्य ईरान के गैस क्षेत्रों से प्राकृतिक गैस को पाकिस्तान तक पहुंचाना है, जिससे लाखों घरों और हजारों उद्योगों की ऊर्जा जरूरतें पूरी की जा सकें।
दिलचस्प बात यह है कि ईरान ने अपने हिस्से का अधिकांश निर्माण कार्य काफी पहले पूरा कर लिया था। उसने अपनी सीमा तक पाइपलाइन बिछा दी, लेकिन पाकिस्तान की तरफ निर्माण कार्य शुरू ही नहीं हो सका। इसकी मुख्य वजह अमेरिकी प्रतिबंध और संभावित आर्थिक दंड का खतरा था। पाकिस्तान को डर था कि परियोजना पर काम आगे बढ़ाने से उसे अंतरराष्ट्रीय दबाव और वित्तीय प्रतिबंधों का सामना करना पड़ सकता है।
वर्ष 2013 में इस परियोजना का औपचारिक उद्घाटन भी किया गया था और उम्मीद थी कि कुछ वर्षों में गैस आपूर्ति शुरू हो जाएगी। लेकिन समय बीतने के साथ यह योजना कागजों तक सीमित रह गई। ईरान कई बार सार्वजनिक रूप से इस बात पर असंतोष भी जता चुका है कि पाकिस्तान ने अपने हिस्से का काम आगे नहीं बढ़ाया।
अब हालात बदलते दिखाई दे रहे हैं। अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती कूटनीतिक बातचीत ने इस परियोजना को लेकर फिर से चर्चाएं तेज कर दी हैं। पाकिस्तान के रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि यदि प्रतिबंधों का मुद्दा हल हो जाता है तो इस्लामाबाद के लिए ऊर्जा क्षेत्र में नई संभावनाएं खुल सकती हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार सस्ती गैस मिलने से पाकिस्तान की उत्पादन लागत कम होगी, उद्योगों को राहत मिलेगी और बिजली उत्पादन भी अधिक स्थिर हो सकेगा। इसके अलावा विदेशी मुद्रा पर पड़ने वाला दबाव भी कम हो सकता है, क्योंकि दूर-दराज के देशों से महंगे ऊर्जा संसाधन खरीदने की आवश्यकता घट जाएगी।
ऊर्जा क्षेत्र से आगे बढ़कर इस बदलाव का असर क्षेत्रीय संपर्क परियोजनाओं पर भी पड़ सकता है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारा (CPEC) पहले से ही चीन की बेल्ट एंड रोड पहल का महत्वपूर्ण हिस्सा माना जाता है। यदि ईरान पर आर्थिक प्रतिबंधों में कमी आती है, तो तेहरान के लिए भी इस क्षेत्रीय नेटवर्क से जुड़ने के अवसर बढ़ सकते हैं।
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान की भागीदारी से CPEC का दायरा और विस्तृत हो सकता है। इससे पाकिस्तान, चीन, मध्य एशिया और पश्चिम एशिया के बीच व्यापारिक संपर्क मजबूत होंगे। नए परिवहन और ऊर्जा मार्ग विकसित होने से क्षेत्रीय व्यापार को भी बढ़ावा मिल सकता है।
एक अन्य महत्वपूर्ण पहलू यह है कि ईरान की भागीदारी से पाकिस्तान को वैकल्पिक व्यापारिक मार्ग मिल सकते हैं। वर्तमान में कई क्षेत्रीय संपर्क योजनाएं अफगानिस्तान की स्थिति पर निर्भर रहती हैं। यदि ईरान के रास्ते नए कॉरिडोर विकसित होते हैं तो व्यापार और ऊर्जा आपूर्ति के लिए अतिरिक्त विकल्प उपलब्ध होंगे।
पाकिस्तान के लिए यह अवसर केवल ऊर्जा सुरक्षा तक सीमित नहीं है, बल्कि आर्थिक विकास, क्षेत्रीय व्यापार और निवेश आकर्षित करने के लिहाज से भी महत्वपूर्ण माना जा रहा है। हालांकि अंतिम तस्वीर इस बात पर निर्भर करेगी कि अमेरिका और ईरान के बीच समझौते की शर्तें किस प्रकार लागू होती हैं और प्रतिबंधों में वास्तव में कितनी राहत दी जाती है।
फिलहाल पाकिस्तान में नीति विशेषज्ञ और आर्थिक विश्लेषक इस घटनाक्रम को सकारात्मक संकेत के रूप में देख रहे हैं। उनका मानना है कि यदि राजनीतिक और कूटनीतिक परिस्थितियां अनुकूल रहीं तो वर्षों से ठंडे बस्ते में पड़ी गैस पाइपलाइन परियोजना फिर से सक्रिय हो सकती है। साथ ही CPEC समेत कई क्षेत्रीय परियोजनाओं को भी नया प्रोत्साहन मिल सकता है।
यानी अमेरिका-ईरान संबंधों में सुधार केवल दोनों देशों तक सीमित मामला नहीं है, बल्कि इसके प्रभाव पूरे क्षेत्र में महसूस किए जा सकते हैं। पाकिस्तान उन देशों में शामिल है जो इस संभावित बदलाव से सबसे अधिक लाभ उठाने की उम्मीद लगाए बैठे हैं।