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अमेरिकी सैन्य नक्शे पर बवाल: PoK को पाकिस्तान में दिखाने से उठे सवाल, भारत की सीमाओं को लेकर नई बहस

अमेरिका द्वारा जारी किए गए एक सैन्य नक्शे को लेकर भारत में नई बहस शुरू हो गई है। विवाद की वजह नक्शे में जम्मू-कश्मीर से जुड़े उन क्षेत्रों की प्रस्तुति है, जिन्हें भारत अपना अभिन्न हिस्सा मानता है। अमेरिकी रक्षा प्रतिष्ठान की ओर से जारी इस मानचित्र में पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) और अक्साई चिन को भारत के सामान्य भूभाग से अलग दिखाया गया है, जिसके बाद कई रणनीतिक विशेषज्ञों और राजनीतिक विश्लेषकों ने सवाल उठाने शुरू कर दिए हैं।

यह मामला ऐसे समय सामने आया है जब भारत और अमेरिका के संबंधों पर दुनिया की नजर बनी हुई है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की प्रस्तावित मुलाकात से ठीक पहले सामने आए इस नक्शे ने दोनों देशों के बीच रणनीतिक संकेतों को लेकर चर्चाओं को तेज कर दिया है। विशेषज्ञों का मानना है कि अंतरराष्ट्रीय मंच पर नक्शों की प्रस्तुति केवल तकनीकी विषय नहीं होती, बल्कि इसके पीछे कूटनीतिक और राजनीतिक संदेश भी छिपे हो सकते हैं।

दरअसल, अमेरिकी सैन्य तंत्र ने हाल ही में अपने कमांड स्ट्रक्चर से जुड़ा एक नया ग्राफिक जारी किया। इसी ग्राफिक में भारत की सीमाओं को उस रूप में नहीं दिखाया गया, जैसा भारत आधिकारिक तौर पर स्वीकार करता है। नक्शे में भारत को एक रंग में दर्शाया गया है, लेकिन जम्मू-कश्मीर के कुछ हिस्से उस रंग से बाहर दिखाई देते हैं। यही बात विवाद का कारण बनी है।

विशेष ध्यान देने वाली बात यह है कि मानचित्र में एक रेखा भारत के क्षेत्र से गुजरती दिखाई देती है, जो अमेरिकी सैन्य कमानों के अधिकार क्षेत्रों को अलग-अलग दर्शाती है। इस विभाजन के कारण भारत और पाकिस्तान अलग-अलग सैन्य कमांड क्षेत्रों में रखे गए हैं। भारत को प्रशांत क्षेत्र से संबंधित कमान के अंतर्गत दिखाया गया है, जबकि पाकिस्तान को मध्य कमान के अधिकार क्षेत्र में दर्शाया गया है।

रणनीतिक मामलों के जानकारों का कहना है कि अमेरिकी सैन्य ढांचे में विभिन्न क्षेत्रों को प्रशासनिक सुविधा और संचालन संबंधी जरूरतों के अनुसार बांटा जाता है। हालांकि, जब ऐसी सीमांकन रेखाएं संवेदनशील क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं, तब वे राजनीतिक विवाद को जन्म दे सकती हैं। भारत लंबे समय से यह स्पष्ट करता रहा है कि जम्मू-कश्मीर और उससे जुड़े सभी क्षेत्र उसके संप्रभु भूभाग का हिस्सा हैं। ऐसे में किसी भी विदेशी दस्तावेज या नक्शे में अलग प्रस्तुति को भारत गंभीरता से देखता है।

इस पूरे घटनाक्रम के बीच एक और महत्वपूर्ण बदलाव ने ध्यान आकर्षित किया है। अमेरिकी सैन्य व्यवस्था में लंबे समय से प्रचलित “इंडो-पैसिफिक कमांड” नाम को बदलकर फिर से “पैसिफिक कमांड” किए जाने की चर्चा है। कई विशेषज्ञ इसे केवल नाम परिवर्तन नहीं, बल्कि रणनीतिक प्राथमिकताओं में बदलाव के संकेत के रूप में देख रहे हैं।

दिलचस्प बात यह है कि ट्रंप के पहले कार्यकाल में ही “पैसिफिक कमांड” का नाम बदलकर “इंडो-पैसिफिक कमांड” किया गया था। उस समय इसे भारत की बढ़ती भूमिका और हिंद महासागर क्षेत्र के महत्व को स्वीकार करने के रूप में देखा गया था। अब यदि नाम दोबारा पुराने स्वरूप में लौटता है, तो यह स्वाभाविक है कि इसके व्यापक रणनीतिक निहितार्थों पर चर्चा हो।

विश्लेषकों का एक वर्ग मानता है कि “इंडो-पैसिफिक” अवधारणा पिछले कुछ वर्षों में अमेरिका, भारत, जापान और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों के बीच सहयोग का प्रमुख आधार रही है। इस अवधारणा का उद्देश्य एशिया और हिंद महासागर क्षेत्र को एक साझा रणनीतिक फ्रेमवर्क में देखना था। ऐसे में यदि अमेरिका फिर से “पैसिफिक” शब्दावली पर जोर देता है, तो यह उसकी विदेश नीति में प्राथमिकताओं के पुनर्संतुलन का संकेत हो सकता है।

कुछ विशेषज्ञों का यह भी तर्क है कि हाल के महीनों में अमेरिका द्वारा “एशिया-पैसिफिक” शब्द का बढ़ता उपयोग इस बात की ओर इशारा करता है कि वाशिंगटन चीन के साथ अपने संबंधों को नए नजरिए से देखना चाहता है। हालांकि इस विषय पर कोई आधिकारिक घोषणा नहीं हुई है, फिर भी भू-राजनीतिक हलकों में इस पर चर्चा जारी है।

नक्शे को लेकर उठे विवाद में एक और पहलू यह है कि इसमें अरुणाचल प्रदेश को भारत का हिस्सा दिखाया गया है। इससे यह संकेत मिलता है कि अमेरिकी प्रस्तुति पूरी तरह भारत-विरोधी रुख पर आधारित नहीं है, बल्कि संभवतः सैन्य प्रशासनिक सीमाओं और क्षेत्रीय वर्गीकरण की वजह से कुछ हिस्सों को अलग तरीके से दर्शाया गया है। फिर भी PoK और अक्साई चिन की प्रस्तुति ने बहस को जन्म दिया है।

भारत की आधिकारिक नीति हमेशा से स्पष्ट रही है कि जम्मू-कश्मीर, लद्दाख, PoK और अक्साई चिन सहित पूरा क्षेत्र भारत का अभिन्न अंग है। भारत अंतरराष्ट्रीय मंचों पर भी यही रुख दोहराता रहा है। इसलिए किसी भी विदेशी संस्था या सरकार द्वारा जारी मानचित्र में अलग चित्रण होने पर राजनीतिक और कूटनीतिक प्रतिक्रियाएं सामने आना स्वाभाविक माना जाता है।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर यह दिखा दिया है कि नक्शे केवल भौगोलिक दस्तावेज नहीं होते, बल्कि वे अंतरराष्ट्रीय राजनीति और कूटनीति के संवेदनशील प्रतीक भी बन सकते हैं। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि अमेरिका इस विवाद पर कोई स्पष्टीकरण देता है या नहीं, और भारत सरकार इस विषय को किस स्तर पर उठाती है।

फिलहाल, अमेरिकी सैन्य नक्शे में भारत की सीमाओं की प्रस्तुति और कमांड संरचना में संभावित बदलाव दोनों ही विषय रणनीतिक विशेषज्ञों, नीति निर्माताओं और राजनीतिक विश्लेषकों के बीच चर्चा का केंद्र बने हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति ट्रंप की मुलाकात से पहले सामने आया यह विवाद अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में नक्शों और प्रतीकों की अहमियत को एक बार फिर रेखांकित करता है।