दिल्ली स्थित ऐतिहासिक कुतुब मीनार परिसर एक बार फिर धार्मिक और कानूनी बहस के केंद्र में आ गया है। मध्य प्रदेश की भोजशाला मामले में पूजा की अनुमति मिलने के बाद कई हिंदू संगठन अब कुतुब मीनार परिसर के अंदर पूजा-अर्चना का अधिकार मांग रहे हैं। उनका कहना है कि इस परिसर का संबंध प्राचीन हिंदू मंदिरों से रहा है और यहां आज भी उसके कई प्रमाण मौजूद हैं।
मंदिरों को तोड़कर मस्जिद बनाने का दावा
हिंदू पक्ष का आरोप है कि कुतुब परिसर में मौजूद कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद का निर्माण 27 हिंदू और जैन मंदिरों को ध्वस्त करके किया गया था। परिसर के प्रवेश द्वार पर लगे एक पुराने शिलालेख का हवाला देते हुए संगठन दावा करते हैं कि उसमें मंदिरों को तोड़ने का उल्लेख मिलता है। परिसर के कई स्तंभों और दीवारों पर आज भी मंदिर शैली की नक्काशी और देवी-देवताओं की आकृतियां दिखाई देती हैं।
लौह स्तंभ को बताया गया विष्णु मंदिर से जुड़ा
कुतुब मीनार परिसर में स्थित प्रसिद्ध लौह स्तंभ भी इस विवाद का अहम हिस्सा बना हुआ है। इतिहासकारों के अनुसार यह स्तंभ चौथी शताब्दी का माना जाता है और इसे प्राचीन भारतीय धातु विज्ञान का अद्भुत उदाहरण बताया जाता है। हिंदू संगठनों का दावा है कि यह स्तंभ किसी प्राचीन विष्णु मंदिर का हिस्सा था और राजा अनंगपाल इसे यहां लेकर आए थे। माना जाता है कि स्तंभ के ऊपरी हिस्से पर कभी भगवान विष्णु के वाहन गरुड़ की प्रतिमा स्थापित थी।
मूर्तियों को लेकर जताई जा रही आपत्ति
परिसर में कई जगहों पर देवी-देवताओं की खंडित प्रतिमाएं दिखाई देने का दावा किया जाता है। कुछ संगठनों का कहना है कि भगवान गणेश की एक प्रतिमा को दीवार के निचले हिस्से में लगाया गया है, जिससे श्रद्धालुओं की भावनाएं आहत होती हैं। भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) ने प्रतिमा को सुरक्षित रखने के लिए उसे कांच से ढक रखा है, लेकिन हिंदू संगठनों का कहना है कि इसकी उचित देखभाल नहीं हो रही।
पहले भी कोर्ट पहुंच चुका है मामला
कुतुब मीनार परिसर में पूजा की अनुमति को लेकर पहले भी अदालत में याचिका दायर की जा चुकी है। दिल्ली की साकेत कोर्ट ने इससे पहले पूजा की मांग को खारिज कर दिया था। हालांकि भोजशाला मामले के बाद हिंदू संगठनों का कहना है कि अब वे नए सिरे से कानूनी लड़ाई लड़ेंगे और परिसर के ऐतिहासिक तथ्यों को अदालत के सामने रखेंगे।
नाम बदलने को लेकर भी उठे सवाल
कुछ इतिहासकारों और संगठनों का दावा है कि इस परिसर का मूल स्वरूप समय के साथ बदला गया। उनका कहना है कि कुतुबुद्दीन ऐबक ने मंदिरों के अवशेषों पर मस्जिद का निर्माण कराया था और बाद में इसका नाम बदलकर कुव्वत-उल-इस्लाम मस्जिद रखा गया। हिंदू पक्ष का तर्क है कि परिसर की स्थापत्य शैली और वहां मौजूद मूर्तियां उसके प्राचीन इतिहास की ओर इशारा करती हैं।
(Photo : AI Generated)