गुजरात के पाटण और बनासकांठा जिलों में महंगे स्मार्टफोन को लेकर एक बड़े फर्जीवाड़े का मामला सामने आया है। आरोप है कि एक संगठित गिरोह गरीब और जरूरतमंद लोगों को थोड़े पैसों का लालच देकर उनके नाम पर महंगे मोबाइल फोन फाइनेंस करवाता है। इसके बाद गिरोह के सदस्य फोन अपने कब्जे में लेकर उसे दूसरे लोगों को बेच देते हैं। जब मोबाइल की ईएमआई जमा नहीं होती तो कर्ज और कानूनी जिम्मेदारी उस व्यक्ति के सिर आ जाती है, जिसके दस्तावेजों पर फोन खरीदा गया था।
बताया जा रहा है कि पिछले करीब दो महीनों के दौरान पाटण-बनासकांठा क्षेत्र में इस तरह से 100 से ज्यादा मोबाइल फोन ठगे जाने की जानकारी सामने आई है। मामले की गंभीरता को देखते हुए राधनपुर मोबाइल एसोसिएशन और प्रभावित मोबाइल व्यापारियों ने पुलिस में लिखित शिकायत देकर पूरे मामले की जांच की मांग की है।
यह मामला केवल मोबाइल चोरी या बिक्री तक सीमित नहीं है, बल्कि इसमें फाइनेंस प्रक्रिया, पहचान संबंधी दस्तावेज और कथित तौर पर तैयार किए गए फर्जी बिलों का इस्तेमाल किए जाने की बात भी सामने आई है। इसी वजह से व्यापारियों के साथ-साथ उन लोगों की भी परेशानी बढ़ गई है, जिनके नाम पर मोबाइल फोन की ईएमआई चल रही है।
जरूरतमंद लोगों को बनाया जा रहा निशाना
गिरोह कथित तौर पर ऐसे लोगों की तलाश करता है जिन्हें अचानक कुछ पैसों की जरूरत होती है। उन्हें यह भरोसा दिलाया जाता है कि उनके दस्तावेजों पर एक महंगा मोबाइल फोन लोन पर खरीदने के बदले उन्हें कुछ हजार रुपये मिल जाएंगे। व्यक्ति को लगता है कि उसे बिना ज्यादा मेहनत के पैसे मिल रहे हैं, इसलिए वह अपना आधार या अन्य जरूरी दस्तावेज उपलब्ध करा देता है।
इसके बाद उसके नाम पर महंगा स्मार्टफोन फाइनेंस कराया जाता है। मोबाइल हाथ में आने के बाद संबंधित व्यक्ति को तय रकम दे दी जाती है और फोन गिरोह के सदस्य अपने साथ ले जाते हैं। असली समस्या तब शुरू होती है जब फोन की ईएमआई समय पर जमा नहीं होती।
कर्ज की जिम्मेदारी दस्तावेजों पर दर्ज व्यक्ति के नाम होती है। ऐसे में बैंक या फाइनेंस कंपनी की ओर से भुगतान के लिए उसी व्यक्ति से संपर्क किया जाता है। कई मामलों में संबंधित व्यक्ति को यह तक पता नहीं होता कि उसके नाम पर कितनी कीमत का मोबाइल खरीदा गया है और कितनी ईएमआई बाकी है।
11 मोबाइल की किस्त नहीं आई तो खुला मामला
इस पूरे मामले की एक अहम कड़ी मोबाइल व्यापारी हार्दिक ठक्कर से जुड़ी बताई जा रही है। उन्होंने जून महीने में 11 मोबाइल फोन बेचे थे। इन फोन पर फाइनेंस की सुविधा उपलब्ध कराई गई थी। लेकिन कुछ समय बाद जब संबंधित मोबाइल की किस्तें जमा नहीं हुईं तो व्यापारी को शक हुआ।
हार्दिक ठक्कर ने उन ग्राहकों से संपर्क करने और मामले की जानकारी लेने का फैसला किया, जिनके नाम पर मोबाइल खरीदे गए थे। जब वह ग्राहकों के घर पहुंचे तो उन्हें एक अलग ही कहानी पता चली। जिन लोगों के नाम पर मोबाइल फोन लिए गए थे, उनके पास वे मोबाइल मौजूद ही नहीं थे।
पूछताछ में सामने आया कि कथित तौर पर इन लोगों को कुछ हजार रुपये का लालच देकर उनके नाम पर फोन खरीदे गए थे। इसके बाद मोबाइल किसी और के हाथ में चला गया। बताया गया कि कुछ लोगों को इसके बदले करीब 5 हजार रुपये तक दिए गए थे।
व्यापारी के लिए परेशानी इसलिए बढ़ गई क्योंकि फाइनेंस की रकम जमा नहीं होने पर कंपनी की ओर से भुगतान को लेकर दबाव बनाया जाने लगा। एक तरफ फोन उनके रिकॉर्ड में बिके हुए थे और दूसरी तरफ उनकी ईएमआई का भुगतान नहीं हो रहा था। इससे व्यापारियों की रकम भी फंसने लगी।
राधनपुर समेत कई इलाकों में सक्रिय होने का आरोप
मामला सामने आने के बाद पाटण और बनासकांठा के कई क्षेत्रों में इस तरह के मामलों की जानकारी जुटाई जा रही है। राधनपुर, समी, सांतलपुर और भाभर सहित आसपास के इलाकों में भी इसी तरह से मोबाइल फोन लिए जाने की शिकायतें सामने आने की बात कही जा रही है।
मोबाइल कारोबारियों का कहना है कि शुरुआत में अलग-अलग घटनाएं सामान्य ईएमआई डिफॉल्ट जैसी लग रही थीं। लेकिन जब एक के बाद एक मामलों में समान तरीका सामने आया तो व्यापारियों को किसी संगठित गिरोह के सक्रिय होने का संदेह हुआ।
इसी आधार पर राधनपुर मोबाइल एसोसिएशन और प्रभावित कारोबारियों ने पुलिस को लिखित शिकायत दी। अब पुलिस इस बात की जांच कर रही है कि कितने लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल किया गया, कितने मोबाइल फोन फाइनेंस कराए गए और फोन खरीदने के बाद उन्हें कहां बेचा गया।
व्यापारियों पर भी बढ़ा आर्थिक दबाव
इस कथित फर्जीवाड़े का असर सिर्फ उन लोगों पर नहीं पड़ा, जिनके दस्तावेज इस्तेमाल किए गए। मोबाइल दुकानदार भी आर्थिक संकट में फंस गए हैं। फाइनेंस कंपनियों के जरिए मोबाइल बेचने के बाद दुकानदारों को उम्मीद होती है कि ग्राहक नियमित रूप से ईएमआई चुकाएगा।
लेकिन जब मोबाइल लेकर संबंधित व्यक्ति गायब हो जाता है या उसे फोन के बारे में जानकारी ही नहीं होती, तब किस्तों का भुगतान रुक जाता है। इसके बाद फाइनेंस कंपनियों और बैंकों की ओर से बकाया रकम को लेकर दबाव बढ़ सकता है।
व्यापारियों के मुताबिक, अगर ऐसे मामलों की संख्या बढ़ती है तो मोबाइल कारोबारियों को बड़ा आर्थिक नुकसान हो सकता है। यही वजह है कि एसोसिएशन ने पुलिस से मामले की गहराई से जांच करने और गिरोह के सदस्यों तक पहुंचने की मांग की है।
लोन वाले मोबाइल में होता है सुरक्षा लॉक
इस तरह के मामलों में एक और महत्वपूर्ण पहलू फाइनेंस पर खरीदे गए मोबाइल में मौजूद सुरक्षा व्यवस्था है। आमतौर पर लोन या ईएमआई पर मोबाइल खरीदते समय फाइनेंस कंपनी की ओर से फोन में एक विशेष सिक्योरिटी एप इंस्टॉल किया जाता है।
इसे कई मामलों में ‘डिवाइस एडमिन’ सिस्टम के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। यह सिस्टम मोबाइल के IMEI नंबर से जुड़ा हो सकता है। इसका उद्देश्य यह सुनिश्चित करना होता है कि ग्राहक यदि ईएमआई का भुगतान बंद कर देता है तो कंपनी मोबाइल की एक्सेस को प्रतिबंधित कर सके।
किस्तों का भुगतान नहीं होने पर संबंधित सिस्टम के जरिए सर्वर से सिग्नल भेजा जा सकता है, जिसके बाद मोबाइल के कुछ सिस्टम फीचर लॉक किए जा सकते हैं। इससे फाइनेंस कंपनी को अपने बकाये की वसूली में मदद मिलती है और ग्राहक पर भुगतान जारी रखने का दबाव रहता है।
फर्जी बिल के जरिए सिस्टम से बचने की कोशिश
पुलिस शिकायत में यह आरोप भी सामने आया है कि कथित ठग इस सुरक्षा व्यवस्था से बचने के लिए मोबाइल के दस्तावेजों में हेरफेर करते थे। आरोप है कि वे किसी दूसरी दुकान के नाम से नकली बिल तैयार करवाते और उसके आधार पर मोबाइल से संबंधित जानकारी अपडेट कराने की कोशिश करते थे।
यदि यह आरोप जांच में सही साबित होता है तो इससे पता चलेगा कि गिरोह केवल मोबाइल फोन खरीदकर बेचने तक सीमित नहीं था, बल्कि फाइनेंस से जुड़े सुरक्षा सिस्टम को भी दरकिनार करने की कोशिश कर रहा था।
फर्जी बिल के जरिए मोबाइल का रिकॉर्ड बदलने या अपडेट कराने से यह भ्रम पैदा हो सकता है कि फोन किसी दूसरे ग्राहक या दुकान से खरीदा गया है। ऐसे में असली खरीदार और फाइनेंस प्रक्रिया से जुड़ी जानकारी को छिपाना आसान हो सकता है।
दस्तावेज देने वालों के लिए सबसे बड़ा खतरा
इस पूरे खेल में सबसे ज्यादा जोखिम उन लोगों का है, जो थोड़े पैसों के लालच में अपने दस्तावेज किसी दूसरे व्यक्ति को दे देते हैं। उन्हें शुरुआत में सिर्फ कुछ हजार रुपये मिलते हैं, लेकिन बाद में उनके नाम पर महंगे मोबाइल का कर्ज सामने आ सकता है।
ऐसे मामलों में व्यक्ति को फाइनेंस कंपनी की ओर से नोटिस, भुगतान संबंधी कॉल या अन्य कानूनी कार्रवाई का सामना करना पड़ सकता है। इसलिए किसी भी व्यक्ति को अपना पहचान पत्र, बैंक से जुड़ी जानकारी या अन्य दस्तावेज किसी अनजान व्यक्ति के कहने पर इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं देनी चाहिए।
पुलिस जांच से सामने आएगा पूरा नेटवर्क
फिलहाल पुलिस शिकायत के आधार पर पूरे मामले की जांच में जुटी है। जांच का एक प्रमुख हिस्सा यह पता लगाना होगा कि इस गिरोह में कितने लोग शामिल हैं और मोबाइल फोन फाइनेंस कराने के लिए ग्राहकों की तलाश कौन करता था।
इसके अलावा पुलिस यह भी पता लगाने की कोशिश कर सकती है कि फाइनेंस कराए गए फोन बाद में किन दुकानों या लोगों को बेचे गए। कथित फर्जी बिल कहां तैयार किए गए और मोबाइल के रिकॉर्ड में बदलाव किस तरीके से कराया गया, इसकी भी जांच महत्वपूर्ण होगी।
पाटण और बनासकांठा के अलग-अलग इलाकों में सामने आए मामलों को जोड़कर देखा जा रहा है। यदि सभी घटनाओं में एक जैसा तरीका मिलता है तो इससे किसी एक संगठित नेटवर्क के सक्रिय होने की तस्वीर और स्पष्ट हो सकती है।
100 से अधिक मोबाइल फोन से जुड़े मामलों की बात सामने आने के बाद व्यापारियों में चिंता बढ़ गई है। अब पुलिस की जांच पर नजर है कि इस कथित गिरोह के पीछे कौन लोग हैं, गरीब और जरूरतमंद लोगों के दस्तावेजों का इस्तेमाल किस तरह किया गया और फाइनेंस पर लिए गए महंगे मोबाइल आखिर कहां पहुंचाए गए।
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