चीन ने 1 जुलाई से ‘एथनिक यूनिटी लॉ’ (Ethnic Unity Law) लागू कर दिया है। सरकार इसे देश के 56 मान्यता प्राप्त जातीय समुदायों के बीच एकता, राष्ट्रीय पहचान और सामाजिक स्थिरता को मजबूत करने वाला कानून बता रही है। लेकिन मानवाधिकार संगठनों, अंतरराष्ट्रीय विशेषज्ञों और निर्वासन में रह रहे कई तिब्बती, वीगर तथा मंगोल कार्यकर्ताओं का कहना है कि इस कानून का दायरा चीन की सीमाओं से कहीं आगे तक जा सकता है। उनका दावा है कि यह कानून विदेशों में रहकर चीन की नीतियों की आलोचना करने वाले लोगों पर भी दबाव बनाने का माध्यम बन सकता है।
इसी बीच 23 वर्षीय झांग यादी, जिन्हें ‘तारा’ के नाम से भी जाना जाता है, का मामला फिर चर्चा में आ गया है। माना जा रहा है कि वह इस समय चीन की हिरासत में हैं। रिपोर्टों के अनुसार, तारा ने विदेश में पढ़ाई के दौरान तिब्बती समुदाय के अधिकारों से जुड़े एक ऑनलाइन चीनी भाषा प्लेटफॉर्म के संपादन में सहयोग किया था। उन्होंने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर दलाई लामा को जन्मदिन की शुभकामनाएं भी दी थीं। बताया जाता है कि पिछले वर्ष जुलाई में चीन लौटने के बाद युन्नान प्रांत के शांग्री-ला शहर में उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया।
रिपोर्ट्स के मुताबिक तारा पर आरोप लगाया गया है कि उन्होंने ऐसे विचारों को बढ़ावा दिया जो चीन की राष्ट्रीय एकता को कमजोर कर सकते हैं और लोगों को अलगाववाद के लिए उकसा सकते हैं। हालांकि चीन की ओर से इस मामले में सार्वजनिक रूप से ज्यादा जानकारी साझा नहीं की गई है, लेकिन मानवाधिकार समूह इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर कार्रवाई का उदाहरण मान रहे हैं।
चीन लंबे समय से तिब्बत को अपना अभिन्न हिस्सा बताता रहा है। वर्ष 1950 में चीन ने तिब्बत पर नियंत्रण स्थापित किया था। इसके बाद से तिब्बत की राजनीतिक स्थिति और वहां धार्मिक स्वतंत्रता को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार बहस होती रही है। चीन निर्वासन में रह रहे आध्यात्मिक नेता दलाई लामा को अलगाववादी मानता है, जबकि उनके समर्थक उन्हें शांति और सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक बताते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, नया कानून ऐसे समय लागू किया गया है जब चीन दुनिया के सामने अपनी सकारात्मक और आधुनिक छवि पेश करने की कोशिश कर रहा है। हाल के महीनों में चीन ने कई देशों के नेताओं का स्वागत किया, पर्यटन को बढ़ावा देने के लिए वीजा नियमों में ढील दी और विदेशी यात्रियों को आकर्षित करने के लिए बड़े स्तर पर प्रचार अभियान शुरू किए। सोशल मीडिया पर भी चीन के पर्यटन स्थलों, विशेष रूप से तिब्बत और शिनजियांग जैसे क्षेत्रों के वीडियो और तस्वीरें साझा की जा रही हैं।
हालांकि इसी दौरान लागू हुआ नया कानून अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चिंता का कारण भी बन गया है। इसकी सबसे ज्यादा चर्चा अनुच्छेद 63 को लेकर हो रही है। आलोचकों का कहना है कि इस प्रावधान के तहत यदि कोई व्यक्ति या संगठन चीन के अनुसार जातीय एकता को नुकसान पहुंचाने या अलगाववादी गतिविधियों को बढ़ावा देने का दोषी माना जाता है, तो उसके खिलाफ कार्रवाई की जा सकती है। यही कारण है कि विदेशों में रह रहे कई चीनी मूल के कार्यकर्ता और अल्पसंख्यक समुदायों से जुड़े लोग खुद को असुरक्षित महसूस कर रहे हैं।
मानवाधिकार संगठन एमनेस्टी इंटरनेशनल का कहना है कि इस कानून की भाषा काफी व्यापक है और इसकी व्याख्या सरकार अपनी सुविधा के अनुसार कर सकती है। संगठन की उप-क्षेत्रीय निदेशक सारा ब्रूक्स के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति दुनिया के किसी भी हिस्से में रहकर शांतिपूर्ण तरीके से तिब्बती, वीगर या अन्य अल्पसंख्यक समुदायों के अधिकारों की बात करता है, तो उसे भी राष्ट्रीय एकता के खिलाफ गतिविधि बताकर निशाना बनाया जा सकता है।
विशेषज्ञों का यह भी मानना है कि चीन के लिए किसी दूसरे देश में सीधे कानून लागू करना आसान नहीं होगा, लेकिन इसका मनोवैज्ञानिक प्रभाव काफी बड़ा हो सकता है। विदेशों में रहने वाले कई कार्यकर्ताओं के परिवार आज भी चीन में रहते हैं। ऐसे में उन्हें आशंका है कि यदि वे चीन सरकार की आलोचना जारी रखते हैं तो उनके परिवारों पर दबाव बढ़ सकता है। इसके अलावा चीन लौटने की स्थिति में गिरफ्तारी का खतरा भी उनके सामने बना रह सकता है।
यूरोप के कई सांसदों ने भी इस कानून को लेकर चिंता जताई है। उनका मानना है कि यदि भविष्य में चीन इस कानून के आधार पर दूसरे देशों के नागरिकों या वहां रहने वाले लोगों के खिलाफ कार्रवाई की मांग करता है तो प्रत्यर्पण संधियों की समीक्षा करनी पड़ सकती है। उनके अनुसार इससे यूरोपीय संघ और चीन के संबंधों पर भी असर पड़ सकता है।
चीन सरकार का कहना है कि इस कानून का मुख्य उद्देश्य सभी जातीय समुदायों को समान अवसर देना और राष्ट्रीय एकता को मजबूत करना है। सरकार के मुताबिक शिक्षा, रोजगार, आवास और सामाजिक योजनाओं के माध्यम से विभिन्न समुदायों के बीच दूरी कम की जाएगी। इसके अलावा देशभर में साझा पहचान विकसित करने पर भी जोर दिया जाएगा।
इसी नीति के तहत स्कूलों में मैंडरिन भाषा को प्राथमिकता दी जा रही है। नए प्रावधानों के अनुसार शुरुआती कक्षाओं से लेकर हाई स्कूल तक विद्यार्थियों को मैंडरिन पढ़ाई जाएगी। पहले कई क्षेत्रों में तिब्बती, वीगर और मंगोलियाई भाषाओं में भी शिक्षा दी जाती थी। सरकार का तर्क है कि राष्ट्रीय स्तर पर सबसे अधिक बोली जाने वाली भाषा सीखने से युवाओं को रोजगार और विकास के अधिक अवसर मिलेंगे।
लेकिन आलोचकों की राय इससे अलग है। उनका कहना है कि स्थानीय भाषाओं और संस्कृतियों को धीरे-धीरे कमजोर किया जा रहा है। उनके अनुसार भाषा केवल संवाद का माध्यम नहीं बल्कि सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण हिस्सा होती है। इसलिए शिक्षा से मातृभाषा को हटाने का असर आने वाली पीढ़ियों पर पड़ेगा।
शी जिनपिंग के कार्यकाल में ‘सिनिसाइजेशन’ यानी ‘चीनीकरण’ की नीति को भी तेज गति से आगे बढ़ाया गया है। इस नीति का उद्देश्य विभिन्न जातीय समुदायों को मुख्य रूप से हान संस्कृति के साथ जोड़ना बताया जाता है। चीन की लगभग 90 प्रतिशत आबादी हान समुदाय से आती है। राष्ट्रपति शी कई अवसरों पर कह चुके हैं कि सभी समुदायों को एक परिवार की तरह मिलकर रहना चाहिए ताकि देश और अधिक मजबूत बन सके।
हालांकि इस नीति को लेकर तिब्बत, शिनजियांग और इनर मंगोलिया जैसे क्षेत्रों में लंबे समय से असहमति देखने को मिलती रही है। तिब्बत में कई बौद्ध मठों पर प्रशासनिक नियंत्रण बढ़ाया गया है और कुछ भिक्षुओं की गिरफ्तारी की खबरें भी सामने आई हैं। वहीं शिनजियांग में चीन द्वारा स्थापित पुनर्शिक्षा केंद्रों को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। संयुक्त राष्ट्र सहित कई मानवाधिकार संगठनों ने वहां बड़े पैमाने पर मानवाधिकार उल्लंघन की आशंका जताई है, जबकि चीन इन आरोपों से इनकार करता है।
इनर मंगोलिया में भी भाषा को लेकर पहले विरोध प्रदर्शन हो चुके हैं। जब सरकार ने स्कूलों में मंगोलियाई भाषा की जगह मैंडरिन को बढ़ावा देने का फैसला किया था, तब कई अभिभावकों और छात्रों ने इसका विरोध किया था। बाद में प्रशासन ने आंदोलन पर सख्ती दिखाई और विरोध धीरे-धीरे शांत हो गया।
नए कानून में यह भी प्रावधान किया गया है कि यदि माता-पिता या अभिभावक बच्चों में ऐसे विचार विकसित करते हैं जिन्हें सरकार जातीय सद्भाव के खिलाफ मानती है, तो उनके खिलाफ भी कानूनी कार्रवाई की जा सकती है। यही वजह है कि कई विशेषज्ञ इस कानून को केवल प्रशासनिक सुधार नहीं बल्कि सामाजिक नियंत्रण के नए चरण के रूप में देख रहे हैं।
इस वर्ष पेन अमेरिका और साउदर्न मंगोलियन ह्यूमन राइट्स इंफॉर्मेशन सेंटर की एक रिपोर्ट में दावा किया गया कि चीन के डिजिटल प्लेटफॉर्म से मंगोलियाई भाषा की सामग्री व्यवस्थित तरीके से हटाई जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार सोशल मीडिया समूह बंद किए गए, कई अकाउंट हटाए गए और स्थानीय भाषाओं से जुड़े ऑनलाइन समुदायों पर भी प्रतिबंध लगाए गए।
पेन अमेरिका से जुड़ी एरिका न्गुयेन का कहना है कि नया कानून लागू होने के बाद अल्पसंख्यक समुदायों की सांस्कृतिक अभिव्यक्ति पर और अधिक नियंत्रण देखा जा सकता है। उनका मानना है कि दुनिया के लोकतांत्रिक देशों को ऐसे लेखकों, पत्रकारों, कलाकारों और मानवाधिकार कार्यकर्ताओं की सुरक्षा सुनिश्चित करनी चाहिए जो निर्वासन में रहकर अपने समुदायों की आवाज उठाते हैं।
दूसरी ओर चीन सरकार इन सभी आलोचनाओं को खारिज करती है। अधिकारियों का कहना है कि यह कानून पूरी तरह कानूनी, आवश्यक और राष्ट्रीय हितों के अनुरूप है। उनका तर्क है कि हर संप्रभु देश को अपनी राष्ट्रीय एकता, क्षेत्रीय अखंडता और सामाजिक स्थिरता की रक्षा करने का अधिकार है। हालांकि मानवाधिकार संगठनों का कहना है कि यदि इस कानून का इस्तेमाल असहमति दबाने और अल्पसंख्यकों की सांस्कृतिक पहचान सीमित करने के लिए किया गया तो इसका असर केवल चीन तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि विदेशों में रहने वाले आलोचकों और कार्यकर्ताओं पर भी महसूस किया जाएगा।