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₹25,500 करोड़ के बॉन्ड से SP ग्रुप की बड़ी चाल, टाटा संस की लिस्टिंग पर फिर तेज हुई बहस

देश के सबसे बड़े कारोबारी समूहों में शामिल टाटा ग्रुप की होल्डिंग कंपनी टाटा संस एक बार फिर चर्चा के केंद्र में है। इस बार वजह शापूरजी पल्लोनजी (SP) ग्रुप की नई वित्तीय रणनीति है। समूह ने करीब ₹25,500 करोड़ जुटाने के लिए एक बड़े बॉन्ड इश्यू की तैयारी की है, जिसके लिए टाटा संस में अपनी हिस्सेदारी के एक हिस्से को आधार बनाया जाएगा। इस कदम ने टाटा संस की संभावित लिस्टिंग को लेकर चल रही बहस को फिर से तेज कर दिया है।

जानकारी के मुताबिक SP ग्रुप इस बॉन्ड इश्यू को सोमवार को लॉन्च करने की तैयारी में है। बाजार से जुड़े सूत्रों का कहना है कि यह एक विशेष संरचना वाला फंड जुटाने का प्रस्ताव है, जिसमें टाटा संस में मौजूद हिस्सेदारी का आर्थिक मूल्य सबसे महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगा। हालांकि इस पूरी प्रक्रिया का भविष्य काफी हद तक टाटा संस के आगे उठाए जाने वाले कदमों पर भी निर्भर करेगा।

दरअसल, बॉन्ड इश्यू की शर्तों में यह प्रावधान रखा गया है कि इश्यू के 18 महीनों के भीतर या तो टाटा संस अपने इनिशियल पब्लिक ऑफर (IPO) की घोषणा करे या फिर SP ग्रुप और टाटा संस के बीच हिस्सेदारी से जुड़े किसी समाधान पर सहमति बने। यदि ऐसा होता है तो SP ग्रुप के लिए अपने निवेश का मूल्य निकालना अपेक्षाकृत आसान हो सकता है।

टाटा संस में शापूरजी पल्लोनजी ग्रुप की हिस्सेदारी करीब 18.37 फीसदी है। यही कारण है कि वह कंपनी का सबसे बड़ा अल्पसंख्यक (माइनोरिटी) शेयरधारक माना जाता है। लंबे समय से SP ग्रुप और टाटा समूह के बीच हिस्सेदारी को लेकर मतभेद सामने आते रहे हैं। ऐसे में नया बॉन्ड इश्यू केवल फंड जुटाने का माध्यम नहीं बल्कि भविष्य की रणनीतिक संभावनाओं से भी जुड़ा माना जा रहा है।

वित्तीय क्षेत्र के जानकारों का कहना है कि इस इश्यू की सफलता काफी हद तक इस विश्वास पर आधारित होगी कि भविष्य में टाटा संस की हिस्सेदारी का बेहतर मूल्यांकन संभव होगा। यदि कंपनी सूचीबद्ध होती है तो शेयरों की कीमत तय करने में पारदर्शिता आएगी और निवेशकों को भी स्पष्टता मिलेगी। यही वजह है कि बॉन्ड के ढांचे में संभावित लिस्टिंग या हिस्सेदारी के समाधान को महत्वपूर्ण शर्त बनाया गया है।

हाल ही में भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) द्वारा जारी किए गए स्पष्टीकरण के बाद टाटा संस की लिस्टिंग को लेकर चर्चाएं और तेज हो गई हैं। केंद्रीय बैंक ने अपर-लेयर एनबीएफसी से जुड़े नियमों को स्पष्ट किया है, जिसके बाद यह माना जा रहा है कि बड़ी वित्तीय कंपनियों के लिए सार्वजनिक रूप से सूचीबद्ध होना अनिवार्य हो सकता है। हालांकि अंतिम फैसला अभी भी संबंधित पक्षों और नियामकीय प्रक्रिया पर निर्भर करेगा।

आरबीआई के नियमों के अनुसार जिन गैर-बैंकिंग वित्तीय कंपनियों (NBFC) का एसेट साइज ₹1 लाख करोड़ से अधिक है और जिन्हें अपर-लेयर श्रेणी में रखा गया है, उनके लिए शेयर बाजार में लिस्टिंग का प्रावधान लागू होता है। टाटा संस का एसेट बेस लगभग ₹1.75 लाख करोड़ से अधिक बताया जाता है और कंपनी को पहले ही अपर-लेयर एनबीएफसी के रूप में वर्गीकृत किया जा चुका है। इसी वजह से यह माना जा रहा है कि भविष्य में कंपनी के सामने लिस्टिंग एक अहम विकल्प बन सकती है।

हालांकि टाटा समूह के भीतर इस विषय पर एकमत राय नहीं है। टाटा ट्रस्ट्स, जो टाटा संस का सबसे बड़ा शेयरधारक है, लंबे समय से कंपनी को निजी (अनलिस्टेड) बनाए रखने के पक्ष में रहा है। ट्रस्ट का मानना है कि मौजूदा संरचना कंपनी के दीर्घकालिक उद्देश्यों के लिए अधिक उपयुक्त है और इससे समूह की कार्यप्रणाली पर बेहतर नियंत्रण बना रहता है।

दूसरी ओर, टाटा संस के कुछ वरिष्ठ पदाधिकारियों ने अलग राय भी रखी है। कंपनी के वाइस चेयरमैन वेणु श्रीनिवासन और विजय सिंह ने पहले सार्वजनिक रूप से यह संकेत दिया था कि यदि कंपनी शेयर बाजार में सूचीबद्ध होती है तो इससे पारदर्शिता बढ़ेगी और निवेशकों के लिए भी नए अवसर पैदा होंगे। उनके अनुसार लिस्टिंग से कंपनी की बाजार में पहचान और मूल्यांकन दोनों मजबूत हो सकते हैं।

इसके विपरीत, टाटा ट्रस्ट्स के चेयरमैन नोएल टाटा ने लिस्टिंग के विचार का विरोध किया है। उनका मानना है कि टाटा संस की मौजूदा संरचना समूह के मूल उद्देश्यों और दीर्घकालिक रणनीति के अनुरूप है। ऐसे में कंपनी को सूचीबद्ध करने की आवश्यकता नहीं है। यही कारण है कि इस मुद्दे पर समूह के भीतर अलग-अलग दृष्टिकोण देखने को मिल रहे हैं।

SP ग्रुप की नई योजना ऐसे समय सामने आई है जब बाजार पहले से ही टाटा संस के भविष्य को लेकर उत्सुक है। विशेषज्ञों का कहना है कि यदि कंपनी की लिस्टिंग होती है तो इसका असर केवल टाटा समूह तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि भारतीय पूंजी बाजार पर भी इसका व्यापक प्रभाव पड़ सकता है। देश की सबसे बड़ी निजी कंपनियों में शामिल टाटा संस का शेयर बाजार में आना निवेशकों के लिए एक बड़ा अवसर माना जाएगा।

सूत्रों के अनुसार इस प्रस्तावित बॉन्ड इश्यू में जीरो-कूपन, अनलिस्टेड और अनरेटेड नॉन-कन्वर्टिबल डिबेंचर (NCD) जारी किए जाएंगे। इन डिबेंचर्स को इक्विजेन इन्वेस्टमेंट के माध्यम से पेश किया जाएगा, जबकि साइरस इन्वेस्टमेंट्स टाटा संस के शेयरों को कोलैटरल के रूप में गिरवी रखेगा। इस पूरी संरचना का उद्देश्य निवेशकों को भरोसा देना और फंड जुटाने की प्रक्रिया को मजबूत बनाना है।

बैंकिंग क्षेत्र से जुड़े अधिकारियों का कहना है कि इस बॉन्ड इश्यू की सफलता काफी हद तक टाटा संस की हिस्सेदारी के संभावित मुद्रीकरण (Monetisation) पर आधारित है। यदि भविष्य में हिस्सेदारी का मूल्य निकालने का रास्ता खुलता है, तो बॉन्ड निवेशकों को भुगतान करना अपेक्षाकृत आसान होगा। यही वजह है कि इश्यू की शर्तों में लिस्टिंग या वैकल्पिक समझौते को प्रमुख स्थान दिया गया है।

जानकारों का यह भी मानना है कि आरबीआई के हालिया स्पष्टीकरण ने SP ग्रुप की इस रणनीति को कुछ हद तक मजबूती दी है। हालांकि इससे यह तय नहीं माना जा सकता कि टाटा संस निश्चित रूप से आईपीओ लाएगी, लेकिन संभावनाएं पहले की तुलना में जरूर बढ़ी हैं। इसी उम्मीद के आधार पर SP ग्रुप ने अपनी नई वित्तीय योजना को आगे बढ़ाने का फैसला किया है।

सूत्रों के मुताबिक यदि सब कुछ तय कार्यक्रम के अनुसार चलता है तो बॉन्ड इश्यू अगले सप्ताह तक सेटलमेंट के चरण में पहुंच सकता है। हालांकि इस संबंध में SP ग्रुप की ओर से आधिकारिक रूप से कोई विस्तृत टिप्पणी सामने नहीं आई है। मीडिया द्वारा भेजे गए सवालों पर भी समूह के प्रवक्ता ने प्रतिक्रिया नहीं दी।

फिलहाल बाजार की नजरें इस बात पर टिकी हैं कि टाटा संस भविष्य में किस दिशा में कदम बढ़ाती है। एक ओर नियामकीय बदलाव हैं, दूसरी ओर बड़े शेयरधारकों के अलग-अलग विचार और SP ग्रुप की नई रणनीति। ऐसे में आने वाले महीनों में टाटा संस की लिस्टिंग, हिस्सेदारी के समाधान और बॉन्ड इश्यू से जुड़े घटनाक्रम भारतीय कॉरपोरेट जगत के सबसे महत्वपूर्ण विषयों में शामिल रह सकते हैं।