जम्मू-कश्मीर की राजनीति में इन दिनों नेशनल कॉन्फ्रेंस के भीतर चल रही खींचतान चर्चा का विषय बनी हुई है। मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला की सरकार को अपनी ही पार्टी के कुछ विधायकों की नाराजगी का सामना करना पड़ रहा है। हालात ऐसे बन गए हैं कि पार्टी नेतृत्व को असंतुष्ट नेताओं के साथ बातचीत करने के लिए आगे आना पड़ा है। शुक्रवार, 6 नवंबर को श्रीनगर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के अध्यक्ष और पूर्व मुख्यमंत्री फारूक अब्दुल्ला के आवास पर नाराज विधायकों और पार्टी के शीर्ष नेताओं के बीच महत्वपूर्ण बैठक हुई।
इस बैठक में मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला भी मौजूद रहे। विधायकों की नाराजगी की मुख्य वजह हाल ही में हुआ मंत्रिमंडल विस्तार और सरकार के कामकाज को लेकर उठ रहे सवाल बताए जा रहे हैं। असंतुष्ट नेताओं का मानना है कि पार्टी के वरिष्ठ विधायकों को उचित जिम्मेदारी नहीं दी गई। इसके अलावा प्रशासनिक फैसलों और कुछ पदाधिकारियों की भूमिका को लेकर भी उन्होंने अपनी आपत्तियां सामने रखी हैं।
मीडिया रिपोर्टों के मुताबिक, 20 से अधिक विधायकों के असंतोष की चर्चा है। शुक्रवार को फारूक अब्दुल्ला के घर बैठक के लिए पहुंचे विधायकों की संख्या को लेकर अलग-अलग रिपोर्टों में अलग आंकड़े सामने आए। इंडिया टुडे ने 15 नाराज विधायकों के पहुंचने की जानकारी दी, जबकि अन्य रिपोर्टों में अलग-अलग संख्या बताई गई। विधायकों की ओर से नेतृत्व के सामने अपनी मांगें रखने और समाधान की मांग करने की बात सामने आई है।
किन मुद्दों पर नाराज हैं नेशनल कॉन्फ्रेंस के विधायक?
पार्टी के भीतर असंतोष केवल मंत्री पद नहीं मिलने तक सीमित नहीं है। विधायकों ने सरकार के कामकाज में अपनी भागीदारी और प्रशासनिक फैसलों को लेकर भी सवाल उठाए हैं। उनकी प्रमुख मांगों में मुख्यमंत्री के सलाहकार नासिर सोगमी की भूमिका पर पुनर्विचार करना शामिल बताया गया है।
इसके अलावा डिप्टी मुख्यमंत्री सुरिंदर चौधरी को लेकर भी कुछ विधायकों की नाराजगी सामने आई है। मांग उठाई गई है कि उनसे सड़क निर्माण विभाग वापस लिया जाए या फिर उनके पद को लेकर नेतृत्व कोई फैसला करे। नाराज नेताओं का यह भी कहना है कि सरकार से जुड़े लोगों पर लगाए गए भ्रष्टाचार के आरोपों की निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। हालांकि इन आरोपों को अभी साबित हुआ तथ्य नहीं माना जा सकता।
विधायक चाहते हैं कि पार्टी नेतृत्व उनकी शिकायतों को गंभीरता से सुने और सरकार में जिम्मेदारियों का बंटवारा दोबारा विचार करके करे। उनका कहना है कि संगठन के भीतर संवाद और वरिष्ठ नेताओं की राय को महत्व दिया जाना चाहिए।
कई दिनों से चल रही थीं बंद कमरे में बैठकें
फारूक अब्दुल्ला के आवास पर हुई बैठक अचानक नहीं बुलाई गई थी। इससे पहले भी श्रीनगर में नाराज विधायकों के बीच कई दौर की बातचीत हो चुकी थी। 30 अक्टूबर के बाद असंतुष्ट नेताओं ने अलग-अलग स्थानों पर बैठकें करके अपनी रणनीति तैयार की।
इन बैठकों में कैबिनेट विस्तार से जुड़े फैसलों, वरिष्ठ विधायकों की अनदेखी और सरकार के कामकाज पर चर्चा हुई। कुछ विधायकों ने पार्टी नेतृत्व के सामने सामूहिक रूप से अपनी बात रखने का फैसला किया। 5 नवंबर को भी श्रीनगर में विधायक हसनैन मसूदी के आवास पर कई घंटे तक चर्चा हुई थी। इसमें कुछ विधायक व्यक्तिगत रूप से मौजूद रहे, जबकि कुछ ने ऑनलाइन माध्यम से हिस्सा लिया।
इन बैठकों के बाद असंतुष्ट गुट ने फारूक और उमर अब्दुल्ला से मुलाकात करने का फैसला किया। अब पार्टी नेतृत्व के सामने चुनौती है कि वह नाराज नेताओं को किस तरह संतुष्ट करता है और सरकार के भीतर पैदा हुए मतभेदों को कैसे दूर करता है।
25 विधायकों के इस्तीफे की चर्चा से बढ़ी राजनीतिक हलचल
नेशनल कॉन्फ्रेंस के असंतुष्ट विधायकों को लेकर इस्तीफे की संभावित चर्चा ने जम्मू-कश्मीर की राजनीति में हलचल बढ़ा दी है। कुछ रिपोर्टों और सूत्रों के हवाले से दावा किया जा रहा है कि यदि उनकी मांगों पर ध्यान नहीं दिया गया तो बड़ी संख्या में विधायक इस्तीफा देने का विकल्प अपना सकते हैं।
हालांकि 25 विधायकों के सामूहिक इस्तीफे की खबर को फिलहाल आधिकारिक फैसला नहीं माना जा सकता। पार्टी की तरफ से भी ऐसा कोई अंतिम निर्णय सार्वजनिक रूप से घोषित नहीं किया गया है। इसलिए सरकार गिरने की स्थिति को अभी संभावित राजनीतिक घटनाक्रम के रूप में ही देखा जाना चाहिए।
यहां एक महत्वपूर्ण बात समझना जरूरी है कि विधायकों की नाराजगी, पार्टी छोड़ना और विधानसभा की सदस्यता से इस्तीफा देना तीन अलग-अलग राजनीतिक और संवैधानिक स्थितियां हैं। केवल असंतोष जाहिर करने से सरकार का बहुमत खत्म नहीं होता। यदि विधायक वास्तव में इस्तीफा देते हैं, तो विधानसभा अध्यक्ष द्वारा उन पर फैसला लिया जाना भी जरूरी होगा।
विधानसभा में कितनी सीटें हैं और सरकार के सामने क्या चुनौती है?
जम्मू-कश्मीर विधानसभा में 90 निर्वाचित सीटें हैं। इसके अलावा पांच सदस्यों को मनोनीत किए जाने का प्रावधान है। इसी वजह से विधानसभा की कुल सदस्य संख्या को लेकर राजनीतिक चर्चाओं में 95 का आंकड़ा भी सामने आता है।
2024 के विधानसभा चुनाव में नेशनल कॉन्फ्रेंस ने 42 निर्वाचित सीटों पर जीत दर्ज की थी। कांग्रेस और कुछ अन्य विधायकों के समर्थन से उमर अब्दुल्ला के नेतृत्व में सरकार बनी। सरकार के समर्थन का आधार केवल नेशनल कॉन्फ्रेंस की अपनी सीटें नहीं, बल्कि सहयोगी दलों और समर्थक विधायकों की संख्या भी है।
यदि बड़ी संख्या में सत्तारूढ़ दल के विधायक इस्तीफा देते हैं और उनके इस्तीफे स्वीकार हो जाते हैं, तो विधानसभा की प्रभावी संख्या तथा बहुमत के आकलन पर असर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सरकार को सदन में अपना समर्थन साबित करने की जरूरत पड़ सकती है।
हालांकि 25 इस्तीफों के बाद सदन की संख्या सीधे 65 रह जाने और बहुमत का आंकड़ा 33 हो जाने का दावा अपने आप में अंतिम संवैधानिक गणना नहीं है। इसका निर्धारण सदन की वास्तविक सदस्यता, स्वीकार किए गए इस्तीफों और लागू संवैधानिक प्रावधानों के आधार पर होगा। इसलिए फिलहाल सरकार गिरने की निश्चित घोषणा करना जल्दबाजी होगी।
कैबिनेट विस्तार ने क्यों बढ़ाई पार्टी के भीतर नाराजगी?
उमर अब्दुल्ला सरकार ने 27 अक्टूबर को मंत्रिमंडल का विस्तार किया था। इस दौरान नेशनल कॉन्फ्रेंस के चार विधायकों को मंत्री पद की जिम्मेदारी दी गई। इनमें अली मोहम्मद सागर, मीर सैफुल्लाह, शमीमा फिरदौस और अल्ताफ अहमद कल्लू के नाम शामिल हैं।
वहीं निर्दलीय विधायक सतीश शर्मा को मंत्रिमंडल से बाहर कर दिया गया। इस फेरबदल के बाद पार्टी के कई वरिष्ठ नेताओं में असंतोष पैदा हुआ। कुछ विधायकों को उम्मीद थी कि उन्हें भी सरकार में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलेगी, लेकिन मंत्रियों की नई सूची में उनका नाम शामिल नहीं हुआ।
नजीर अहमद गुरेजी और मुबारक गुल जैसे वरिष्ठ नेताओं को मंत्री पद नहीं मिलने की चर्चा भी नाराजगी की वजहों में शामिल रही। मुबारक गुल को बाद में फारूक अब्दुल्ला ने पार्टी का महासचिव नियुक्त किया। इसके बावजूद पार्टी के भीतर जिम्मेदारियों के वितरण को लेकर चर्चा जारी रही।
राजनीतिक जानकारों के मुताबिक, मंत्रिमंडल विस्तार किसी भी सत्तारूढ़ दल के लिए सामान्य प्रक्रिया हो सकती है, लेकिन जब लंबे समय से पार्टी के साथ काम कर रहे नेताओं को अपेक्षित जगह नहीं मिलती, तो संगठन में असंतोष सामने आ सकता है। नेशनल कॉन्फ्रेंस के मौजूदा घटनाक्रम में भी इसी तरह के सवाल उठ रहे हैं।
आगा रूहुल्लाह मेहदी के जाने से भी लगा पार्टी को झटका
नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक और बड़ा घटनाक्रम श्रीनगर के सांसद आगा सैयद रूहुल्लाह मेहदी का पार्टी छोड़ना रहा। उन्होंने 3 नवंबर को सार्वजनिक रूप से पार्टी की प्राथमिक सदस्यता और लोकसभा की सदस्यता से इस्तीफा देने का ऐलान किया था।
रूहुल्लाह ने अपने फैसले को आजादी से जुड़ा कदम बताते हुए पार्टी नेतृत्व की कार्यशैली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि वह अब नेशनल कॉन्फ्रेंस का हिस्सा नहीं हैं। उनके और पार्टी नेतृत्व के बीच मतभेद काफी समय से चल रहे थे। अनुच्छेद 370 की बहाली को लेकर पार्टी के चुनावी वादों, आरक्षण नीति और जम्मू-कश्मीर के अधिकारों जैसे मुद्दों पर उनकी असहमति सामने आती रही थी।
5 नवंबर को लोकसभा सचिवालय की अधिसूचना जारी हुई, जिसके अनुसार उनका इस्तीफा 3 नवंबर से प्रभावी रूप से स्वीकार कर लिया गया। इसके साथ ही श्रीनगर लोकसभा सीट रिक्त हो गई। इस घटनाक्रम ने पार्टी के भीतर चल रही राजनीतिक बहस को और तेज कर दिया है।
पिछले पांच वर्षों में क्षेत्रीय दलों के सामने आईं बड़ी चुनौतियां
नेशनल कॉन्फ्रेंस के मौजूदा घटनाक्रम के बीच देश के दूसरे क्षेत्रीय दलों में हुए विभाजन की घटनाएं भी चर्चा में हैं। पिछले कुछ वर्षों में महाराष्ट्र और पश्चिम बंगाल की राजनीति में ऐसे बड़े विवाद सामने आए, जिनका असर पार्टी के नाम, चुनाव चिह्न और संगठन पर पड़ा।
शिवसेना में हुआ था बड़ा विभाजन: जून 2022 में एकनाथ शिंदे ने उद्धव ठाकरे के नेतृत्व के खिलाफ बगावत की थी। उनके साथ बड़ी संख्या में विधायक आ गए और महाराष्ट्र की तत्कालीन महाविकास अघाड़ी सरकार गिर गई। इसके बाद शिंदे ने भाजपा के समर्थन से मुख्यमंत्री पद संभाला। चुनाव आयोग ने बाद में एकनाथ शिंदे के गुट को असली शिवसेना माना और पार्टी का नाम तथा धनुष-बाण चुनाव चिह्न आवंटित कर दिया। उद्धव ठाकरे गुट को अलग नाम और मशाल चुनाव चिह्न मिला।
एनसीपी दो गुटों में बंटी: जुलाई 2023 में अजित पवार ने अपने चाचा शरद पवार से अलग राजनीतिक रास्ता अपना लिया। उनके साथ कई विधायक महाराष्ट्र सरकार में शामिल हो गए। इस घटनाक्रम के बाद राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी दो हिस्सों में बंट गई। चुनाव आयोग ने अजित पवार के नेतृत्व वाले गुट को एनसीपी का नाम और घड़ी चुनाव चिह्न दिया, जबकि शरद पवार के गुट को अलग पहचान मिली।
टीएमसी में भी सामने आया संगठनात्मक विवाद: साल 2026 में पश्चिम बंगाल की तृणमूल कांग्रेस में भी नेतृत्व को लेकर विवाद सामने आया। ममता बनर्जी और बागी खेमे के बीच पार्टी के नाम तथा चुनाव चिह्न को लेकर मामला चुनाव आयोग तक पहुंचा। आयोग ने अंतरिम व्यवस्था के तहत पुराने नाम और चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दोनों गुटों को अलग पहचान और चुनाव चिह्न दिए। इस घटनाक्रम में बागी खेमे का नेतृत्व अरूप रॉय से जुड़ा रहा।
अब पार्टी नेतृत्व के फैसले पर टिकी निगाहें
जम्मू-कश्मीर में नेशनल कॉन्फ्रेंस के सामने फिलहाल सबसे बड़ी चुनौती पार्टी के अंदर पैदा हुए मतभेदों को बातचीत के जरिए सुलझाने की है। फारूक अब्दुल्ला और उमर अब्दुल्ला के सामने नाराज विधायकों की मांगों पर विचार करने के साथ-साथ सरकार के कामकाज और संगठनात्मक एकजुटता को बनाए रखने की जिम्मेदारी भी है।
आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि पार्टी नेतृत्व विधायकों की मांगों पर क्या फैसला करता है। क्या मंत्रिमंडल में दोबारा बदलाव होगा? क्या विवादित प्रशासनिक जिम्मेदारियों को लेकर कोई निर्णय लिया जाएगा? और क्या असंतुष्ट विधायक अपने रुख में बदलाव करेंगे?
इन सवालों के जवाब अभी सामने आने बाकी हैं। फिलहाल इतना स्पष्ट है कि कैबिनेट विस्तार के बाद शुरू हुआ विवाद नेशनल कॉन्फ्रेंस के लिए एक महत्वपूर्ण आंतरिक चुनौती बन गया है। इसका असर केवल पार्टी संगठन तक सीमित रहेगा या सरकार के बहुमत तक पहुंचेगा, यह आने वाले राजनीतिक फैसलों और विधानसभा की वास्तविक स्थिति पर निर्भर करेगा।