भारत निर्वाचन आयोग ने पहली बार वोटर बनने वाले नागरिकों के लिए मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया में एक महत्वपूर्ण बदलाव किया है। अब जो भी व्यक्ति पहली बार वोटर लिस्ट में अपना नाम जुड़वाने के लिए आवेदन करेगा, उसे अपने माता-पिता के स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) से जुड़ी जानकारी भी देनी होगी। आयोग का कहना है कि इस बदलाव का उद्देश्य मतदाता सूची को अधिक सटीक, पारदर्शी और त्रुटिरहित बनाना है, ताकि केवल पात्र भारतीय नागरिकों के नाम ही सूची में शामिल रहें।
पहले यह व्यवस्था मुख्य रूप से पुराने मतदाताओं या पहले से सूची में मौजूद लोगों के सत्यापन तक सीमित थी, लेकिन अब इसे नए आवेदकों पर भी लागू कर दिया गया है। यानी जो भी नागरिक फॉर्म-6 के माध्यम से पहली बार वोटर बनने के लिए आवेदन करेगा, उसके लिए यह घोषणा अनिवार्य होगी। चुनाव आयोग का मानना है कि इससे भविष्य में पहचान संबंधी विवाद कम होंगे और रिकॉर्ड का मिलान पहले से कहीं अधिक आसान हो जाएगा।
आवेदन प्रक्रिया में क्या बदला?
मतदाता सूची में नाम जोड़ने के लिए इस्तेमाल होने वाला फॉर्म-6 पहले की तरह ही रहेगा, लेकिन उसके साथ एक अतिरिक्त घोषणा देना जरूरी होगा। इस घोषणा में नए आवेदक को यह जानकारी देनी होगी कि उसके माता-पिता का SIR से संबंधित विवरण क्या है। आयोग के अधिकारियों के अनुसार, ऑनलाइन आवेदन करने वाले उम्मीदवार भी इस घोषणा को भरे बिना अपनी प्रक्रिया पूरी नहीं कर पाएंगे। यानी डिजिटल पोर्टल पर भी यह अनिवार्य शर्त लागू कर दी गई है।
निर्वाचन आयोग ने स्पष्ट किया है कि फॉर्म-6 की मूल संरचना में कोई आधिकारिक संशोधन नहीं किया गया है। केवल प्रशासनिक निर्देश जारी कर इस घोषणा को आवेदन प्रक्रिया का अनिवार्य हिस्सा बनाया गया है। इसलिए अब ऑफलाइन और ऑनलाइन दोनों माध्यमों से आवेदन करने वालों को यह जानकारी देनी होगी।
आयोग ने क्यों लिया यह फैसला?
चुनाव आयोग का कहना है कि इस नई व्यवस्था से मतदाता सूची की गुणवत्ता बेहतर होगी। अधिकारियों के अनुसार, कई बार एक ही व्यक्ति का नाम अलग-अलग स्थानों पर दर्ज हो जाता है या फिर मृत, स्थानांतरित अथवा अपात्र लोगों के नाम वर्षों तक सूची में बने रहते हैं। नई व्यवस्था इन समस्याओं को कम करने में मदद करेगी।
आयोग के मुताबिक, माता-पिता के SIR विवरण के आधार पर आवेदकों की पहचान का मिलान तेजी से किया जा सकेगा। इससे अनावश्यक दस्तावेजों की मांग भी कम होगी और सत्यापन प्रक्रिया अधिक प्रभावी बन सकेगी। आयोग का दावा है कि इस बदलाव से फर्जी या डुप्लीकेट एंट्री की संभावना भी घटेगी।
किन मामलों में मिलेगा फायदा?
निर्वाचन अधिकारियों का कहना है कि नई प्रक्रिया लागू होने के बाद कई तरह की गड़बड़ियों पर रोक लगाई जा सकेगी। उदाहरण के तौर पर, यदि किसी व्यक्ति का नाम पहले से किसी अन्य स्थान पर दर्ज है या वह पात्र मतदाता नहीं है, तो ऐसे मामलों की पहचान करना आसान होगा। इसके अलावा जिन मतदाताओं का निधन हो चुका है, जो दूसरे क्षेत्र में स्थायी रूप से स्थानांतरित हो चुके हैं या जिनके नाम नियमों के अनुसार सूची में नहीं होने चाहिए, उनकी पहचान करने में भी यह व्यवस्था उपयोगी साबित होगी।
आयोग का यह भी कहना है कि भविष्य में मतदाता सूची को लगातार अद्यतन रखने के लिए ऐसी प्रक्रियाएं जरूरी हैं, जिससे रिकॉर्ड अधिक विश्वसनीय बने और चुनावी व्यवस्था पर जनता का भरोसा मजबूत हो।
बिहार से शुरू हुई थी यह व्यवस्था
चुनाव आयोग के अनुसार, इस प्रक्रिया की शुरुआत बिहार में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान के दौरान की गई थी। जून 2025 में वहां SIR अभियान शुरू किया गया था, जिसमें पहली बार फॉर्म-6 के साथ इस प्रकार की घोषणा अनिवार्य की गई थी। उस समय नए मतदाताओं से आवेदन के साथ अतिरिक्त जानकारी मांगी गई थी ताकि उनके रिकॉर्ड का सही तरीके से सत्यापन किया जा सके।
बिहार में इस व्यवस्था के बाद आयोग ने इसके अनुभवों का मूल्यांकन किया और अब इसे देश के अन्य हिस्सों में भी लागू करने का निर्णय लिया है। अधिकारियों का मानना है कि इससे पूरे देश में मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया अधिक समान और व्यवस्थित बनेगी।
संयुक्त राष्ट्र की टिप्पणियों पर आयोग का पक्ष
हाल के दिनों में संयुक्त राष्ट्र के कुछ विशेष रैपोर्तेयर्स ने SIR प्रक्रिया की पारदर्शिता और निष्पक्षता को लेकर सवाल उठाए थे। इस पर प्रतिक्रिया देते हुए चुनाव आयोग ने साफ कहा कि पूरी प्रक्रिया भारतीय संविधान और चुनावी कानूनों के अनुरूप संचालित की जा रही है।
आयोग ने कहा कि SIR का उद्देश्य किसी भी समुदाय या वर्ग को निशाना बनाना नहीं है। इसका मकसद केवल यह सुनिश्चित करना है कि मतदाता सूची में केवल वही लोग शामिल रहें जो कानूनी रूप से मतदान करने के पात्र हैं। यदि किसी कारणवश किसी व्यक्ति का नाम सूची से हटाया जाता है, तो उसे नियमों के तहत अपील और आपत्ति दर्ज कराने का पूरा अवसर दिया जाता है।
निर्वाचन आयोग का कहना है कि पूरी प्रक्रिया पारदर्शी है और इसमें निर्धारित कानूनी प्रावधानों का पालन किया जाता है। आयोग ने यह भी दोहराया कि किसी भी नागरिक के साथ धर्म, जाति, भाषा या किसी अन्य आधार पर भेदभाव नहीं किया जाता।
तीन चरणों में लागू हो रहा SIR
देशभर में SIR अभियान को चरणबद्ध तरीके से लागू किया जा रहा है। पहला चरण बिहार से शुरू हुआ था, जहां अंतिम मतदाता सूची भी जारी की जा चुकी है। इस प्रक्रिया को लेकर कानूनी विवाद भी सामने आए और मामला सुप्रीम कोर्ट तक पहुंचा, लेकिन आयोग ने अपनी प्रक्रिया को कानून के अनुरूप बताया।
दूसरे चरण में उत्तर प्रदेश, पश्चिम बंगाल, गुजरात, मध्य प्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, तमिलनाडु, केरल, गोवा, पुडुचेरी, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप जैसे राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में विशेष गहन पुनरीक्षण अभियान चलाया गया। इन क्षेत्रों में भी मतदाता सूची का व्यापक सत्यापन किया गया।
इसके बाद तीसरे चरण में आयोग ने 16 राज्यों और तीन केंद्रशासित प्रदेशों में SIR लागू किया है। इनमें आंध्र प्रदेश, अरुणाचल प्रदेश, हरियाणा, झारखंड, कर्नाटक, महाराष्ट्र, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नगालैंड, ओडिशा, पंजाब, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा और उत्तराखंड शामिल हैं। इसके अलावा दिल्ली, जम्मू-कश्मीर और चंडीगढ़ में भी यह प्रक्रिया शुरू की जा चुकी है।
आखिर क्या है स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन?
स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन यानी SIR चुनाव आयोग द्वारा चलाया जाने वाला एक विशेष अभियान है, जिसके तहत मतदाता सूची की पूरी तरह समीक्षा की जाती है। इस दौरान प्रत्येक रिकॉर्ड का सत्यापन किया जाता है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सूची में केवल पात्र मतदाता ही मौजूद हों।
इस प्रक्रिया के दौरान नए नाम जोड़े जाते हैं, पात्रता समाप्त होने पर नाम हटाए जाते हैं और रिकॉर्ड में मौजूद त्रुटियों को भी सुधारा जाता है। आयोग का मानना है कि नियमित अंतराल पर ऐसे अभियान लोकतांत्रिक व्यवस्था को मजबूत बनाने के लिए आवश्यक हैं।
21 साल बाद फिर बड़े स्तर पर अभियान
निर्वाचन आयोग के अनुसार, देश में इस तरह का व्यापक SIR अभियान लगभग 21 वर्षों के बाद चलाया जा रहा है। इससे पहले 2002 से 2004 के बीच पूरे देश में बड़े पैमाने पर मतदाता सूची का पुनरीक्षण किया गया था। आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक वर्तमान अभियान देश का आठवां विशेष गहन पुनरीक्षण है।
चुनाव आयोग का कहना है कि समय के साथ जनसंख्या, निवास स्थान और अन्य परिस्थितियों में बदलाव आते रहते हैं। ऐसे में मतदाता सूची को अद्यतन रखना लोकतांत्रिक प्रक्रिया के लिए जरूरी है। नए नियमों के तहत माता-पिता के SIR विवरण को शामिल करने का उद्देश्य भी इसी दिशा में एक कदम माना जा रहा है। आयोग को उम्मीद है कि इससे मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया अधिक विश्वसनीय होगी, रिकॉर्ड का सत्यापन तेज होगा और भविष्य में चुनावी सूची से जुड़ी त्रुटियों में कमी आएगी।