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पंजाब में चुनावी समीकरण बदलने की तैयारी: BJP के संपर्क में अकाली गुट, कई बड़े चेहरे जल्द होंगे शामिल

पंजाब में 2027 के विधानसभा चुनाव को लेकर राजनीतिक दलों ने अभी से अपनी तैयारियां तेज कर दी हैं। सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी, कांग्रेस और शिरोमणि अकाली दल के बीच मुकाबले के बीच भारतीय जनता पार्टी भी राज्य में अपनी स्थिति मजबूत करने के लिए सक्रिय हो गई है। पार्टी अब केवल संगठन के विस्तार तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि चुनाव से पहले अलग-अलग राजनीतिक समूहों और प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ जोड़ने की रणनीति पर काम कर रही है।

इसी कड़ी में भाजपा की नजर उन अकाली धड़ों पर भी है, जो शिरोमणि अकाली दल (बादल) से अलग होकर पंजाब की राजनीति में अपनी जगह बनाने की कोशिश कर रहे हैं। पार्टी सूत्रों के मुताबिक, भाजपा इन अकाली जत्थेबंदियों के नेताओं के संपर्क में है और भविष्य में इनके साथ राजनीतिक तालमेल की संभावनाओं पर बातचीत हो सकती है। फिलहाल बादल परिवार के नेतृत्व वाले शिअद को इस कवायद से अलग रखा जा रहा है।

भाजपा की रणनीति का एक अहम हिस्सा दूसरे दलों के मजबूत नेताओं को पार्टी में शामिल करना भी है। पार्टी के एक वरिष्ठ नेता के अनुसार, विभिन्न राजनीतिक दलों से जुड़े करीब 16 बड़े चेहरे आने वाले समय में भाजपा का दामन थाम सकते हैं। इससे पहले भी कई बाहरी नेता भाजपा में शामिल हो चुके हैं। पार्टी का दावा है कि अब तक 44 ऐसे नेता उसके साथ जुड़ चुके हैं, जो पहले किसी दूसरे राजनीतिक दल में सक्रिय थे।

117 सीटों में 99 को मजबूत मान रही भाजपा

पंजाब विधानसभा में कुल 117 सीटें हैं। भाजपा के एक वरिष्ठ नेता के मुताबिक पार्टी फिलहाल करीब 99 सीटों को अपनी स्थिति के लिहाज से मजबूत मानती है, जबकि 18 सीटों पर संगठन को अभी और मेहनत करने की जरूरत है। हालांकि, चुनावी रणनीति के लिहाज से पार्टी का विशेष ध्यान 73 विधानसभा क्षेत्रों पर रहने वाला है।

भाजपा का आकलन है कि इन सीटों पर संगठन को और मजबूत करके वह चुनावी मुकाबले में अपनी स्थिति काफी बेहतर कर सकती है। पार्टी का प्रयास बूथ स्तर तक संगठन को सक्रिय करने के साथ-साथ ऐसे स्थानीय नेताओं को साथ जोड़ने का है, जिनका अपने इलाकों में प्रभाव है।

पंजाब की राजनीति में भाजपा लंबे समय तक शिअद के साथ गठबंधन के सहारे चुनाव लड़ती रही है। लेकिन दोनों दलों के बीच पुराना गठबंधन टूटने के बाद भाजपा ने राज्य में अपने दम पर राजनीतिक आधार बढ़ाने की कोशिश शुरू की। अब पार्टी के भीतर यह सोच मजबूत होती दिख रही है कि अगले विधानसभा चुनाव में भाजपा को पहले की तुलना में कहीं ज्यादा सीटों पर खुद को प्रभावी स्थिति में लाना होगा।

बादल अकाली दल से दूरी, दूसरे धड़ों पर फोकस

भाजपा के वरिष्ठ नेता ने अकाली दल (बादल) के साथ संभावित गठबंधन को लेकर सीधे तौर पर कोई घोषणा नहीं की। हालांकि, उन्होंने संकेत दिया कि पंजाब की राजनीति में अकाली दल की भूमिका पूरी तरह खत्म नहीं हुई है और आने वाले समय में किसी नए या अलग अकाली राजनीतिक स्वरूप के उभरने की संभावना से इनकार नहीं किया जा सकता।

पंजाब में शिअद (बादल) के अलावा कई अन्य अकाली संगठन भी सक्रिय हैं। इनमें शिअद (पुनर सुरजीत), अकाली दल (वारिस पंजाब दे), शिअद (संयुक्त) और शिअद (अमृतसर) जैसे धड़े शामिल हैं। इनमें से कुछ संगठन हाल के वर्षों में अकाली राजनीति के भीतर हुए विभाजन के बाद अलग अस्तित्व में आए हैं।

भाजपा की नजर इन्हीं अलग-अलग अकाली समूहों पर है। पार्टी का मानना है कि पंजाब में अकाली राजनीति का एक बड़ा सामाजिक और राजनीतिक आधार अभी भी मौजूद है। ऐसे में अगर अलग-अलग अकाली धड़ों के साथ किसी तरह का चुनावी या राजनीतिक तालमेल बनता है तो भाजपा को इसका फायदा मिल सकता है।

हालांकि, यह साफ नहीं है कि भाजपा इन संगठनों के साथ औपचारिक गठबंधन करेगी या चुनाव के दौरान सीटों के स्तर पर कोई समझौता होगा। फिलहाल पार्टी की ओर से सिर्फ संपर्क और संभावनाओं की बात कही जा रही है।

सीएम चेहरे को लेकर भी बड़ा संकेत

भाजपा नेता ने मुख्यमंत्री पद के संभावित चेहरे को लेकर भी महत्वपूर्ण संकेत दिए हैं। उनके मुताबिक यदि पंजाब में भाजपा अपने दम पर सरकार बनाने की स्थिति में पहुंचती है तो इस बार पार्टी जट सिख चेहरे को मुख्यमंत्री बनाने के विकल्प पर विचार कर सकती है।

पंजाब की राजनीति में जट सिख समुदाय का लंबे समय से महत्वपूर्ण प्रभाव रहा है। राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने भी मुख्यमंत्री पद के लिए अलग-अलग समय में इस सामाजिक समीकरण को ध्यान में रखा है। ऐसे में भाजपा की ओर से जट सिख चेहरे को लेकर दिया गया संकेत चुनावी रणनीति के लिहाज से अहम माना जा रहा है।

हालांकि, अभी पार्टी ने किसी संभावित चेहरे का नाम सामने नहीं रखा है। चुनाव में काफी समय बाकी होने के कारण भाजपा नेतृत्व फिलहाल संगठन विस्तार और राजनीतिक समीकरणों को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान दे रहा है।

16 नेताओं की एंट्री से बढ़ेगी हलचल

भाजपा की रणनीति सिर्फ अकाली दलों तक सीमित नहीं है। पार्टी अलग-अलग राजनीतिक दलों के प्रभावशाली नेताओं को अपने साथ लाने की दिशा में भी काम कर रही है। पार्टी के वरिष्ठ नेता का दावा है कि करीब 16 कद्दावर नेता जल्द भाजपा में शामिल हो सकते हैं।

यदि ऐसा होता है तो पंजाब की राजनीति में इसका सीधा असर देखने को मिल सकता है। चुनाव से पहले किसी बड़े नेता का दल बदलना उसके विधानसभा क्षेत्र के राजनीतिक समीकरणों को प्रभावित कर सकता है। यही वजह है कि सभी प्रमुख दल इस तरह की गतिविधियों पर नजर बनाए हुए हैं।

भाजपा का कहना है कि बाहर से आने वाले नेताओं के जरिए पार्टी अपने संगठन को स्थानीय स्तर पर मजबूत करना चाहती है। पहले ही 44 बाहरी नेताओं के भाजपा में शामिल होने का दावा किया गया है। आने वाले महीनों में यदि यह सिलसिला जारी रहता है तो भाजपा का चुनावी नेटवर्क पहले की तुलना में काफी व्यापक हो सकता है।

भाजपा-अकाली गठबंधन की चर्चा पर सफाई

पंजाब की राजनीति में भाजपा और शिअद (बादल) के बीच दोबारा गठबंधन की चर्चा लगातार उठती रही है। दोनों दल लंबे समय तक सहयोगी रहे हैं, इसलिए चुनाव के करीब आते ही संभावित गठबंधन को लेकर अटकलें तेज होना स्वाभाविक माना जा रहा है।

लेकिन भाजपा के वरिष्ठ नेता ने इस चर्चा को पार्टी की आधिकारिक रणनीति मानने से इनकार किया। उन्होंने कहा कि भाजपा की शीर्ष नेतृत्व की ओर से ऐसा कोई संकेत नहीं दिया गया है कि पार्टी और शिअद (बादल) के बीच गठबंधन तय है या होने वाला है।

उनके मुताबिक, गठबंधन की कहानी उन लोगों की ओर से आगे बढ़ाई जा रही है जो अपने राजनीतिक अस्तित्व को लेकर चिंतित हैं। भाजपा का कहना है कि पंजाब की तरक्की और राज्य की खुशहाली के लिए काम करने वाले नेताओं के लिए पार्टी के दरवाजे खुले हैं।

इस बयान का राजनीतिक अर्थ यही निकाला जा रहा है कि भाजपा फिलहाल किसी एक अकाली धड़े के साथ खुद को बांधने के बजाय सभी संभावित विकल्प खुले रखना चाहती है।

गठबंधन की अटकलों से AAP और कांग्रेस सतर्क

भाजपा और शिअद (बादल) के बीच फिलहाल कोई औपचारिक गठबंधन सामने नहीं आया है, लेकिन संभावित तालमेल की चर्चा ने पंजाब के दूसरे राजनीतिक दलों की चिंता जरूर बढ़ा दी है। आम आदमी पार्टी और कांग्रेस दोनों ही भाजपा-अकाली समीकरण पर लगातार नजर रख रहे हैं।

रखड़ पुण्या मेले के दौरान मुख्यमंत्री भगवंत मान ने भाजपा और अकाली दल को लेकर निशाना साधा था। उनके बयानों से साफ संकेत मिला कि आम आदमी पार्टी भी इस संभावित राजनीतिक समीकरण को गंभीरता से देख रही है।

दूसरी तरफ प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग भी भाजपा और अकाली दल के बीच गठबंधन की संभावना को लेकर बयान दे चुके हैं। उन्होंने दोनों दलों के नेताओं से यह स्पष्ट करने को कहा है कि वे भाजपा के साथ गठबंधन नहीं करेंगे।

कांग्रेस और आम आदमी पार्टी दोनों के लिए भाजपा का मजबूत होना अलग-अलग वजहों से चुनौती बन सकता है। यदि भाजपा अकेले चुनाव लड़ती है और बड़ी संख्या में सीटों पर अपना आधार बढ़ाती है तो वह सीधे तौर पर कई विधानसभा क्षेत्रों में मुकाबला त्रिकोणीय बना सकती है। वहीं, यदि भाजपा को किसी अकाली धड़े का समर्थन मिलता है तो पंजाब के ग्रामीण और शहरी क्षेत्रों में उसके चुनावी समीकरण बदल सकते हैं।

चुनाव से पहले बदल सकते हैं समीकरण

पंजाब विधानसभा चुनाव में अभी समय है, लेकिन राजनीतिक गतिविधियों ने संकेत दे दिया है कि अगले चुनाव की तैयारी शुरू हो चुकी है। भाजपा अपने संगठन, नए चेहरों और संभावित सहयोगियों के जरिए राज्य में अपना प्रभाव बढ़ाने की कोशिश कर रही है।

सबसे बड़ा सवाल यही है कि भाजपा चुनाव के समय किसके साथ जाएगी और कितनी सीटों पर खुद मैदान में उतरेगी। फिलहाल पार्टी की ओर से 117 में से बड़ी संख्या में सीटों पर अपनी तैयारी का संकेत दिया गया है। दूसरी ओर अकाली दलों के अलग-अलग धड़ों से संपर्क और बड़े नेताओं को पार्टी में शामिल कराने की कोशिश इस रणनीति को और स्पष्ट करती है।

आने वाले दिनों में यदि 16 प्रभावशाली नेता भाजपा में शामिल होते हैं या किसी अकाली जत्थेबंदी के साथ औपचारिक समझौते की दिशा में कदम बढ़ता है, तो पंजाब का चुनावी मुकाबला और दिलचस्प हो सकता है। फिलहाल भाजपा अपने सभी विकल्प खुले रखकर आगे बढ़ती दिखाई दे रही है और यही रणनीति 2027 के चुनाव में उसके लिए सबसे महत्वपूर्ण हथियार बन सकती है।