पंजाब की राजनीति में 2027 का विधानसभा चुनाव आम आदमी पार्टी (AAP) के लिए सिर्फ एक और चुनाव नहीं, बल्कि अपनी राजनीतिक जमीन बचाए रखने की बड़ी परीक्षा बनने जा रहा है। दिल्ली में सत्ता गंवाने के बाद पार्टी के लिए पंजाब का महत्व पहले से कहीं अधिक बढ़ गया है। ऐसे में आम आदमी पार्टी अब राज्य में दोबारा सरकार बनाने की रणनीति पर तेजी से काम कर रही है। पार्टी का सबसे बड़ा भरोसा मुख्यमंत्री भगवंत मान पर है और चुनावी अभियान का चेहरा भी उन्हें ही बनाए रखने की तैयारी है।
AAP के राष्ट्रीय संयोजक अरविंद केजरीवाल पहले ही भगवंत मान को अगले विधानसभा चुनाव के लिए मुख्यमंत्री पद का चेहरा घोषित कर चुके हैं। इसका सीधा संकेत है कि पार्टी 2027 की चुनावी लड़ाई में किसी नए चेहरे की तलाश के बजाय मौजूदा मुख्यमंत्री के कार्यकाल और उनकी सरकार के कामकाज को ही जनता के सामने प्रमुखता से रखेगी।
पार्टी की रणनीति का केंद्र ‘काम के आधार पर वोट’ मांगने पर रहेगा। सरकार अपने लगभग पांच साल के कार्यकाल में लागू की गई योजनाओं और फैसलों को चुनावी मुद्दा बनाएगी। इसके लिए सरकार के काम का विस्तृत रिपोर्ट कार्ड तैयार किए जाने की योजना है। इस रिपोर्ट कार्ड को लोगों तक पहुंचाकर यह संदेश देने की कोशिश होगी कि पंजाब में मौजूदा सरकार ने अपने कार्यकाल के दौरान क्या-क्या किया।
दिल्ली हारने के बाद पंजाब पर बढ़ा दांव
आम आदमी पार्टी के लिए पंजाब इसलिए भी महत्वपूर्ण हो गया है क्योंकि पार्टी अब दिल्ली में सत्ता में नहीं है। वर्ष 2022 में जब AAP ने पंजाब में प्रचंड बहुमत के साथ सरकार बनाई थी, उस समय दिल्ली में भी पार्टी की सरकार थी। दिल्ली मॉडल को पंजाब में राजनीतिक अभियान का अहम हिस्सा बनाया गया था। पार्टी ने दिल्ली में किए गए कामों और शासन के अपने मॉडल को पंजाब के मतदाताओं के सामने पेश किया था।
लेकिन अब राजनीतिक परिस्थितियां बदल चुकी हैं। दिल्ली में सत्ता हाथ से निकलने के बाद पंजाब AAP के लिए सबसे महत्वपूर्ण राज्यों में से एक बन गया है। यही वजह है कि पार्टी पंजाब में किसी भी तरह की राजनीतिक कमजोरी नहीं छोड़ना चाहती। अगर 2027 में पंजाब में भी सरकार चली जाती है तो राष्ट्रीय स्तर पर AAP की राजनीतिक स्थिति पर इसका बड़ा असर पड़ सकता है।
इसी कारण पार्टी नेतृत्व पंजाब को लेकर संगठन, चुनावी रणनीति और प्रचार अभियान तीनों स्तरों पर अभी से सक्रिय दिखाई दे रहा है। अरविंद केजरीवाल भी पंजाब में सत्ता बरकरार रखने की कोशिशों में जुटे हैं।
बूथ से लेकर विधानसभा क्षेत्र तक संगठन पर जोर
चुनाव में अभी समय है, लेकिन आम आदमी पार्टी ने संगठन को चुनावी मोड में लाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। पार्टी के भीतर खाली पड़े पदों पर नियुक्तियों का काम लगभग पूरा किया जा चुका है। इसके साथ ही जमीनी स्तर पर संगठन को मजबूत करने की कोशिश जारी है।
पार्टी की नजर केवल बड़े नेताओं और विधानसभा क्षेत्रों तक सीमित नहीं है। बूथ स्तर से लेकर हलका स्तर तक संगठनात्मक ढांचे को मजबूत किया जा रहा है। चुनाव के दौरान मतदाताओं तक सीधे पहुंचने और स्थानीय स्तर पर पार्टी के पक्ष में माहौल बनाने के लिए मजबूत कैडर तैयार करना AAP की रणनीति का अहम हिस्सा है।
चुनावी अभियान की मुख्य जिम्मेदारी मुख्यमंत्री भगवंत सिंह मान के कंधों पर रहने की संभावना है। वहीं, चुनावी प्रबंधन में दिल्ली की टीम की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है। पार्टी दिल्ली के कई नेताओं को पंजाब में सक्रिय करने की तैयारी कर रही है। इन नेताओं को अलग-अलग क्षेत्रों में जिम्मेदारियां सौंपने पर काम चल रहा है।
पंजाब के प्रभारी मनीष सिसोदिया भी संगठनात्मक और चुनावी तैयारियों को लेकर सक्रिय हैं। दिल्ली की चुनावी रणनीति और प्रबंधन का अनुभव रखने वाले नेताओं को पंजाब में इस्तेमाल करना पार्टी की व्यापक योजना का हिस्सा माना जा रहा है।
सरकार के काम को बनाया जाएगा मुख्य चुनावी हथियार
AAP की चुनावी रणनीति का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा मौजूदा सरकार के प्रदर्शन को जनता के बीच ले जाना होगा। पार्टी विपक्ष के आरोपों और राजनीतिक चुनौतियों का जवाब सरकार के कामकाज के आंकड़ों और उपलब्धियों के जरिए देने की कोशिश करेगी।
इसके लिए मान सरकार के पांच साल के कार्यकाल का रिपोर्ट कार्ड तैयार किया जाएगा। इसमें सरकार की योजनाओं, फैसलों और उपलब्धियों को शामिल किया जाएगा। पार्टी की कोशिश होगी कि चुनाव के दौरान यह रिपोर्ट कार्ड केवल भाषणों तक सीमित न रहे, बल्कि इसे मतदाताओं तक भी पहुंचाया जाए।
AAP अपने शासन की तुलना पिछली सरकारों से करने की रणनीति भी अपना सकती है। पार्टी नेताओं की ओर से जनता को यह समझाने का प्रयास होगा कि पंजाब में सत्ता संभालने के बाद उनकी सरकार ने किन क्षेत्रों में बदलाव किए। साथ ही, विपक्षी दलों को घेरते हुए यह सवाल भी उठाया जाएगा कि उनके शासनकाल की तुलना में वर्तमान सरकार का प्रदर्शन कैसा रहा।
इस पूरी रणनीति का मकसद चुनाव को केवल राजनीतिक आरोप-प्रत्यारोप तक सीमित रखने के बजाय सरकार के कामकाज के इर्द-गिर्द केंद्रित करना होगा।
राज्यसभा के कई चेहरों का साथ छूटा
हालांकि AAP के सामने केवल विपक्षी दलों की चुनौती नहीं है। पार्टी के लिए एक बड़ा झटका यह भी है कि पंजाब की राजनीति में सक्रिय रहे उसके कई राज्यसभा सांसद अब उसके साथ नहीं हैं। इनमें राघव चड्ढा, संदीप पाठक, अशोक मित्तल, हरभजन सिंह, विक्रमजीत सिंह साहनी और राजिंदर गुप्ता जैसे नाम शामिल हैं, जो अलग-अलग क्षेत्रों में अपनी पहचान रखते थे।
इन नेताओं की मौजूदगी पार्टी को राजनीतिक और सामाजिक स्तर पर अलग-अलग वर्गों तक पहुंच बनाने में मदद करती थी। वर्ष 2022 के पंजाब विधानसभा चुनाव के दौरान राघव चड्ढा AAP के प्रमुख रणनीतिक चेहरों में शामिल रहे थे। वहीं संदीप पाठक को संगठन और चुनावी रणनीति के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता रहा है।
पूर्व क्रिकेटर हरभजन सिंह की पहचान खेल जगत और युवाओं के बीच रही है। अशोक मित्तल शिक्षा क्षेत्र से जुड़े प्रमुख चेहरे रहे हैं। विक्रमजीत सिंह साहनी उद्योग, सामाजिक गतिविधियों और पंजाबी प्रवासी समुदाय के बीच अपनी पहचान रखते हैं। राजिंदर गुप्ता का प्रभाव कारोबारी और औद्योगिक क्षेत्र में रहा है।
ऐसे में चुनाव से पहले इन नेताओं का पार्टी से अलग होना AAP के लिए चुनौती बन सकता है। हालांकि पार्टी अब नए चेहरों और मजबूत स्थानीय संगठन के जरिए इस कमी को पूरा करने की कोशिश कर रही है।
2014 में बनी पहचान, 2022 में मिली बड़ी कामयाबी
पंजाब में AAP की राजनीतिक यात्रा को देखें तो पार्टी ने बेहद कम समय में राज्य की राजनीति में अपनी मजबूत जगह बनाई। वर्ष 2014 के लोकसभा चुनाव में पार्टी ने पहली बार बड़े स्तर पर अपनी ताकत दिखाई। पंजाब की 13 लोकसभा सीटों में से AAP ने चार सीटों पर जीत हासिल की। फतेहगढ़ साहिब, फरीदकोट, संगरूर और पटियाला से पार्टी उम्मीदवार विजयी रहे।
इसके बाद 2017 के विधानसभा चुनाव में AAP ने 20 सीटें जीतीं और कांग्रेस के बाद राज्य की प्रमुख विपक्षी पार्टी बन गई। हालांकि सत्ता हासिल करने में पार्टी सफल नहीं हो सकी, लेकिन उसने पंजाब की पारंपरिक द्विदलीय राजनीति में अपनी मजबूत उपस्थिति दर्ज करा दी।
वर्ष 2019 के लोकसभा चुनाव में पार्टी का प्रदर्शन कमजोर हुआ और वह तीन सीटों तक सीमित रह गई। ऐसा लगा कि पंजाब में AAP का प्रभाव घट रहा है। लेकिन 2022 के विधानसभा चुनाव में तस्वीर पूरी तरह बदल गई।
भगवंत मान के नेतृत्व में पार्टी ने 117 विधानसभा सीटों में से 92 सीटों पर जीत हासिल की। इस जबरदस्त प्रदर्शन के साथ AAP ने दो-तिहाई से अधिक बहुमत हासिल करते हुए पंजाब में सरकार बनाई। यह पार्टी के लिए अब तक की सबसे बड़ी चुनावी उपलब्धियों में से एक थी।
2027 में आसान नहीं होगी राह
2022 की भारी जीत के बावजूद 2027 का चुनाव AAP के लिए आसान नहीं माना जा सकता। सत्ता में रहते हुए सरकार को जनता की उम्मीदों पर खरा उतरने के साथ-साथ विपक्ष के लगातार हमलों का सामना भी करना होगा। दूसरी ओर, पार्टी के कुछ प्रमुख चेहरों का अलग होना भी संगठन के लिए चुनौती पैदा कर सकता है।
AAP अब इस बात पर निर्भर करेगी कि वह अपने मौजूदा संगठन को कितना मजबूत कर पाती है और सरकार के काम को मतदाताओं के सामने कितनी प्रभावी तरीके से रखती है। पार्टी के सामने सबसे बड़ा सवाल यही होगा कि 2022 जैसी लहर को दोबारा कैसे तैयार किया जाए।
भगवंत मान को मुख्यमंत्री चेहरे के तौर पर आगे करना इसी रणनीति का हिस्सा है। पार्टी उम्मीद कर रही है कि मान का चेहरा, सरकार का रिपोर्ट कार्ड और मजबूत संगठन मिलकर उसे सत्ता विरोधी माहौल से बचाने में मदद करेंगे।
कुल मिलाकर पंजाब 2027 की चुनावी लड़ाई AAP के लिए प्रतिष्ठा की लड़ाई भी होगी और राजनीतिक अस्तित्व से जुड़ी चुनौती भी। दिल्ली की सत्ता गंवाने के बाद पंजाब को अपने पास बनाए रखना पार्टी की प्राथमिकता बन चुका है। अब देखना यह होगा कि ‘रंगला पंजाब’ का नारा, सरकार के कामकाज का रिपोर्ट कार्ड और भगवंत मान का नेतृत्व मिलकर AAP को लगातार दूसरी बार सत्ता तक पहुंचा पाते हैं या पंजाब की सियासत 2027 में एक बार फिर करवट लेती है।