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The Scoopp

 

पंजाब में पनबस-PRTC के कच्चे कर्मचारियों की अनिश्चितकालीन हड़ताल, सरकार से नाराज यूनियन ने दी विधानसभा घेरने की चेतावनी

पंजाब में सरकारी बस सेवाओं से जुड़े कर्मचारियों का आंदोलन तेज हो गया है। पंजाब रोडवेज, पनबस और पीआरटीसी के कच्चे कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर 21 अक्टूबर से पूर्ण हड़ताल शुरू करने का ऐलान किया है। कर्मचारियों की यूनियन ने स्पष्ट किया है कि यदि उनकी समस्याओं का समाधान नहीं किया गया तो आंदोलन को और व्यापक किया जाएगा। इसके तहत विधानसभा सत्र का घेराव करने के साथ मुख्यमंत्री भगवंत मान के आवास के बाहर स्थायी धरना लगाने की चेतावनी दी गई है।

यूनियन का कहना है कि कर्मचारी लंबे समय से अपनी नौकरी की सुरक्षा, ठेकेदारी व्यवस्था खत्म करने और विभिन्न आंदोलनों के दौरान दर्ज किए गए मामलों को रद्द करवाने की मांग उठा रहे हैं। कई बार सरकार के सामने अपनी बात रखने के बावजूद उन्हें ठोस समाधान नहीं मिला है। इसी वजह से कर्मचारियों ने एक बार फिर आंदोलन का रास्ता अपनाने का फैसला किया है।

मांगों पर सहमति नहीं बनने से बढ़ा विवाद

पंजाब रोडवेज, पनबस और पीआरटीसी कॉन्ट्रैक्ट वर्कर्स यूनियन पंजाब के अनुसार, कर्मचारियों की समस्याओं को लेकर सरकार के साथ बातचीत की उम्मीद थी। यूनियन ने अपनी मांगों के संबंध में अधिकारियों और सरकार तक बात पहुंचाने के लिए कई प्रयास किए, लेकिन कर्मचारियों का दावा है कि अब तक उनकी प्रमुख मांगों पर संतोषजनक कार्रवाई नहीं हुई है।

यूनियन के नेताओं का कहना है कि अस्थायी और आउटसोर्स व्यवस्था के तहत काम करने वाले कर्मचारियों को लंबे समय से रोजगार की अनिश्चितता का सामना करना पड़ रहा है। कर्मचारियों की मांग है कि उन्हें ऐसी व्यवस्था के तहत काम करने का अवसर मिले, जिसमें उनकी नौकरी सुरक्षित हो और भविष्य को लेकर स्पष्टता बनी रहे।

इसी मुद्दे को लेकर यूनियन ने 21 अक्टूबर से राज्यव्यापी हड़ताल का फैसला किया है। संगठन ने संकेत दिया है कि जब तक मांगों पर ठोस निर्णय नहीं लिया जाता, तब तक आंदोलन जारी रखा जाएगा। यूनियन के मुताबिक, सरकार की ओर से बातचीत और समाधान की पहल नहीं होने पर कर्मचारियों को अपने संघर्ष का दायरा बढ़ाने के लिए मजबूर होना पड़ रहा है।

ठेकेदारी व्यवस्था खत्म करने सहित तीन प्रमुख मांगें

यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष रेशम सिंह गिल ने बताया कि कर्मचारियों का संघर्ष मुख्य रूप से तीन मांगों पर केंद्रित है। इनमें ठेकेदारी व्यवस्था समाप्त करना, आंदोलन के दौरान कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज मामलों को वापस लेना और पनबस में सर्विस रूल लागू कर कॉन्ट्रैक्ट कर्मचारियों को स्थायी करना शामिल है।

पहली मांग के तहत यूनियन चाहती है कि ठेकेदारी व्यवस्था को खत्म करके आउटसोर्स कर्मचारियों को कॉन्ट्रैक्ट के दायरे में लाया जाए। कर्मचारियों का मानना है कि मौजूदा व्यवस्था के कारण उन्हें रोजगार से जुड़ी कई तरह की अनिश्चितताओं का सामना करना पड़ता है। यूनियन चाहती है कि सरकार ऐसी नीति बनाए, जिससे कर्मचारियों को अधिक स्पष्ट और सुरक्षित रोजगार व्यवस्था मिल सके।

दूसरी मांग उन मामलों से संबंधित है, जो अलग-अलग कर्मचारी संघर्षों के दौरान दर्ज किए गए हैं। यूनियन का कहना है कि आंदोलन के समय कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज किए गए मामलों को रद्द किया जाना चाहिए। संगठन इसे अपने सदस्यों के हितों से जुड़ा अहम मुद्दा मानता है और सरकार से इस दिशा में निर्णय लेने की मांग कर रहा है।

तीसरी मांग पनबस में सर्विस रूल बनाने और कॉन्ट्रैक्ट पर काम कर रहे कर्मचारियों को नियमित करने की है। यूनियन का तर्क है कि लंबे समय से सेवाएं दे रहे कर्मचारियों के भविष्य को लेकर स्पष्ट नीति होनी चाहिए। संगठन चाहता है कि सरकार इस दिशा में आवश्यक प्रक्रिया शुरू करे, ताकि कर्मचारियों को स्थायी रोजगार मिल सके।

यूनियन ने कहा है कि इन मांगों के अलावा भी कर्मचारियों से जुड़े दूसरे मुद्दे हैं, लेकिन फिलहाल संगठन सरकार से पहले इन प्रमुख मांगों का समाधान चाहता है।

15 अक्टूबर को डिपो के बाहर किया गया था प्रदर्शन

हड़ताल के फैसले से पहले यूनियन ने 15 अक्टूबर को पंजाब के विभिन्न डिपो के गेटों पर रैलियां आयोजित कर विरोध प्रदर्शन किया था। इन प्रदर्शनों के माध्यम से कर्मचारियों ने अपनी मांगों को दोहराया और सरकार से जल्द बातचीत शुरू करने की अपील की थी।

यूनियन के नेताओं के अनुसार, इन रैलियों का उद्देश्य कर्मचारियों की समस्याओं को सामने लाना और सरकार को यह बताना था कि मांगों को लगातार नजरअंदाज किए जाने से असंतोष बढ़ रहा है। संगठन को उम्मीद थी कि प्रदर्शन के बाद सरकार इस मामले में गंभीरता दिखाएगी और बातचीत के जरिए समाधान निकालने का प्रयास करेगी।

हालांकि, यूनियन का आरोप है कि प्रदर्शन के बावजूद उनकी समस्याओं के समाधान की दिशा में अपेक्षित कदम नहीं उठाए गए। संगठन के मुताबिक, कर्मचारियों ने अपनी मांगों को लेकर पहले भी संघर्ष किया है, लेकिन अब तक उनकी प्रमुख मांगें पूरी नहीं हुई हैं।

15 अक्टूबर को किए गए विरोध प्रदर्शनों के बाद यूनियन ने आंदोलन को आगे बढ़ाने का निर्णय लिया। इसके तहत 21 अक्टूबर से पूर्ण हड़ताल का ऐलान किया गया है। यूनियन ने यह भी स्पष्ट किया है कि यदि सरकार की ओर से ठोस पहल नहीं होती तो आने वाले समय में प्रदर्शन और तेज किए जा सकते हैं।

सरकार के साथ प्रस्तावित बैठक नहीं होने का आरोप

रेशम सिंह गिल के मुताबिक, सरकार की ओर से 15 अक्टूबर को यूनियन के साथ बैठक रखी गई थी। इस बैठक में कर्मचारियों की प्रमुख मांगों के साथ अन्य मुद्दों पर भी चर्चा किए जाने की उम्मीद थी। यूनियन का कहना है कि कर्मचारी बातचीत के माध्यम से अपनी समस्याओं का समाधान चाहते थे और उन्हें उम्मीद थी कि बैठक में कोई रास्ता निकल सकता है।

लेकिन प्रदेश अध्यक्ष ने आरोप लगाया कि सरकार ने यूनियन को बैठक के लिए बुलाने के बावजूद बातचीत नहीं की। संगठन के अनुसार, निर्धारित बैठक नहीं होने के कारण कर्मचारियों में नाराजगी बढ़ी और आंदोलन को दोबारा शुरू करने का फैसला लिया गया।

यूनियन का कहना है कि बातचीत के लिए तैयार होने के बावजूद कर्मचारियों को अपनी मांगों के समाधान के लिए बार-बार संघर्ष करना पड़ रहा है। संगठन चाहता है कि सरकार कर्मचारी प्रतिनिधियों के साथ औपचारिक बैठक करे और सभी प्रमुख मुद्दों पर स्पष्ट रुख सामने रखे।

यूनियन के अनुसार, यदि बातचीत के जरिए मांगों का समाधान निकलता है तो इससे विवाद को समाप्त करने का रास्ता खुल सकता है। हालांकि, फिलहाल संगठन ने हड़ताल वापस लेने को लेकर किसी निर्णय की जानकारी नहीं दी है और मांगें पूरी होने तक संघर्ष जारी रखने की बात कही है।

राज्यभर में करीब 7,000 कर्मचारी प्रभावित

यूनियन के प्रदेश अध्यक्ष ने बताया कि पनबस और पीआरटीसी सहित संबंधित व्यवस्थाओं में कॉन्ट्रैक्ट और आउटसोर्स श्रेणियों के तहत लगभग 7,000 कर्मचारी काम कर रहे हैं। इन कर्मचारियों में बस चालक, कंडक्टर, वर्कशॉप कर्मचारी, डेटा ऑपरेटर, क्लेरिकल स्टाफ और एडवांस बुकिंग से जुड़े कर्मचारी शामिल हैं।

इन कर्मचारियों की जिम्मेदारियां सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था के अलग-अलग हिस्सों से जुड़ी हैं। चालक और कंडक्टर बसों के संचालन तथा यात्रियों की सेवा में भूमिका निभाते हैं, जबकि वर्कशॉप स्टाफ वाहनों के रखरखाव से संबंधित काम करता है। इसके अतिरिक्त, कार्यालयों में कार्यरत कर्मचारी और बुकिंग स्टाफ भी परिवहन सेवाओं के संचालन में योगदान देते हैं।

यूनियन का कहना है कि इतने बड़े कर्मचारी वर्ग से जुड़े मुद्दों को हल करने के लिए सरकार को स्पष्ट नीति बनानी चाहिए। संगठन की मांग है कि रोजगार की सुरक्षा, सेवा नियमों और कर्मचारियों के खिलाफ दर्ज मामलों जैसे विषयों पर निर्णय लेने में देरी नहीं की जाए।

हड़ताल के कारण परिवहन सेवाओं पर कितना असर पड़ेगा, यह कर्मचारियों की भागीदारी और आगे की परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। फिलहाल यूनियन ने पूर्ण हड़ताल की घोषणा की है, लेकिन उपलब्ध जानकारी में बस सेवाओं पर पड़ने वाले वास्तविक असर का विस्तृत विवरण नहीं दिया गया है।

सरकारी बसों की खरीद और निजी बसों पर भी उठाए सवाल

कर्मचारी यूनियन ने रोजगार संबंधी मांगों के साथ पंजाब की सार्वजनिक परिवहन व्यवस्था को लेकर भी सवाल उठाए हैं। रेशम सिंह गिल ने आरोप लगाया कि पिछले साढ़े चार वर्षों में कर्मचारियों की प्रमुख मांगों को पूरा नहीं किया गया। उन्होंने यह भी दावा किया कि इस अवधि में नई सरकारी बसें नहीं खरीदी गईं।

यूनियन का आरोप है कि किलोमीटर स्कीम के तहत निजी बसों को बढ़ावा दिए जाने से सरकारी परिवहन व्यवस्था प्रभावित हो रही है। संगठन का मानना है कि सार्वजनिक परिवहन को मजबूत बनाने के लिए सरकारी बसों की संख्या, कर्मचारियों की स्थिति और सेवा व्यवस्था पर ध्यान देना जरूरी है।

यह मुद्दा भी कर्मचारियों के आंदोलन का हिस्सा बन गया है। यूनियन चाहती है कि सरकार सरकारी परिवहन सेवाओं को लेकर अपनी नीति स्पष्ट करे और कर्मचारियों के रोजगार संबंधी सवालों के साथ बस संचालन से जुड़े विषयों पर भी विचार करे।

हालांकि, सरकारी बसों की खरीद और निजी बसों के संचालन को लेकर लगाए गए आरोप यूनियन की ओर से सामने रखे गए हैं। इन दावों पर सरकार का पक्ष उपलब्ध जानकारी में शामिल नहीं है।

विधानसभा घेराव और मुख्यमंत्री आवास के बाहर धरने की चेतावनी

यूनियन ने साफ किया है कि हड़ताल के बावजूद यदि सरकार ने मांगों पर ध्यान नहीं दिया तो आंदोलन को अगले चरण में ले जाया जाएगा। संगठन ने विधानसभा सत्र के दौरान घेराव करने और मुख्यमंत्री भगवंत मान के आवास के सामने पक्का धरना लगाने की चेतावनी दी है।

इस चेतावनी से स्पष्ट है कि यूनियन अपनी मांगों को लेकर सरकार पर दबाव बढ़ाने की रणनीति अपना रही है। संगठन का कहना है कि कर्मचारियों को नियमित करने, ठेकेदारी व्यवस्था खत्म करने और दर्ज मामलों को वापस लेने जैसे मुद्दों पर निर्णय होने तक संघर्ष जारी रहेगा।

अब इस पूरे मामले में सरकार की अगली कार्रवाई महत्वपूर्ण होगी। यदि यूनियन और सरकार के बीच बातचीत होती है, तो मांगों पर सहमति बनाने की संभावना बन सकती है। वहीं, यदि कोई समाधान नहीं निकलता है तो आंदोलन आगे भी जारी रह सकता है।

फिलहाल कर्मचारियों की प्रमुख मांगें रोजगार की सुरक्षा, सेवा नियमों में स्पष्टता और आंदोलन के दौरान दर्ज मामलों को रद्द करने से जुड़ी हैं। यूनियन ने 21 अक्टूबर से हड़ताल शुरू करने का ऐलान करते हुए सरकार से जल्द हस्तक्षेप करने की मांग की है। आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सरकार कर्मचारियों के प्रतिनिधियों के साथ बातचीत शुरू करती है या आंदोलन का अगला चरण सामने आता है।