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पंजाब में 2027 की सियासी तैयारी तेज: घर-घर पहुंचने से लेकर यात्राओं तक, चारों दलों ने कसी कमर

पंजाब की राजनीति में 2027 के विधानसभा चुनाव की आहट अब साफ दिखाई देने लगी है। चुनाव में अभी समय बाकी है, लेकिन राज्य की प्रमुख राजनीतिक पार्टियों ने संगठन को सक्रिय करने और अपने-अपने मुद्दों को जनता के बीच ले जाने की प्रक्रिया तेज कर दी है। आम आदमी पार्टी जहां राज्य सरकार के अब तक के कार्यकाल को अपने अभियान का मुख्य आधार बना रही है, वहीं भारतीय जनता पार्टी नशे और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर राज्यभर में अभियान चला रही है। शिरोमणि अकाली दल अपनी पुरानी राजनीतिक पहचान और प्रकाश सिंह बादल की विरासत को केंद्र में रखकर संगठन को फिर सक्रिय करने में जुटा है। दूसरी ओर कांग्रेस अपने अंदरूनी मतभेदों को पीछे छोड़कर सामूहिक नेतृत्व का संदेश देने की कोशिश कर रही है।

सितंबर 2026 के दौरान इन गतिविधियों में तेजी आई है। आप ने बूथ स्तर के कार्यकर्ताओं को घर-घर भेजने का कार्यक्रम शुरू किया है, भाजपा ने 117 विधानसभा क्षेत्रों को कवर करने वाली नशा मुक्त पंजाब यात्राएं निकाली हैं और कांग्रेस में नए प्रदेश प्रभारी सचिन पायलट के आने के बाद नेताओं को एक मंच पर लाने की कोशिशें दिखाई दे रही हैं। वहीं अकाली दल भी अपनी क्षेत्रीय राजनीतिक पहचान को दोबारा मजबूत करने के लिए लगातार जनसंपर्क और रैलियों पर जोर दे रहा है।

आप का फोकस बूथ से लेकर हर घर तक

सत्तारूढ़ आम आदमी पार्टी ने अपने चुनावी अभियान की शुरुआत बड़े स्तर के संगठनात्मक संपर्क कार्यक्रम से की है। पार्टी ने 20 सितंबर से पंजाब में डोर-टू-डोर अभियान शुरू करने की घोषणा की थी। इसके तहत 2,68,553 बूथ कमेटी सदस्यों को अलग-अलग इलाकों में घरों तक पहुंचने की जिम्मेदारी दी गई है। पार्टी का उद्देश्य सरकार के कामकाज और उपलब्धियों को सीधे मतदाताओं तक पहुंचाना तथा संगठन के स्थानीय नेटवर्क को सक्रिय करना है।

मुख्यमंत्री भगवंत मान ने धूरी से इस अभियान में हिस्सा लिया। इससे पहले पार्टी की ओर से चुनावी प्रचार सामग्री भी जारी की गई। अभियान में सदस्यता बढ़ाने पर भी जोर दिया जा रहा है, यानी पार्टी केवल सरकार के काम गिनाने तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि बूथ स्तर पर संगठन को भी मजबूत करने की कोशिश कर रही है।

आप की रणनीति का एक महत्वपूर्ण हिस्सा अपने शासनकाल को चुनावी चर्चा का केंद्र बनाना है। पार्टी नेताओं का कहना है कि सरकार ने करीब साढ़े चार साल के दौरान अलग-अलग वर्गों के लिए काम किए हैं और अब इन्हें सीधे परिवारों तक पहुंचाया जाएगा। इस रणनीति में किसान, युवा, महिलाएं, कारोबारी और अन्य सामाजिक वर्गों को अलग-अलग मुद्दों के माध्यम से संबोधित करने की योजना शामिल है।

इस तरह पार्टी का अभियान बड़े मंचों की बजाय बूथ और परिवार के स्तर पर अपनी मौजूदगी दर्ज कराने पर केंद्रित नजर आ रहा है। आने वाले महीनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि यह संगठनात्मक अभियान किस तरह आगे बढ़ता है और इसके जरिए पार्टी किन स्थानीय मुद्दों को प्राथमिकता देती है।

भाजपा ने नशे के मुद्दे को बनाया प्रमुख अभियान

भारतीय जनता पार्टी ने पंजाब में अपनी राजनीतिक गतिविधियों को एक अलग मुद्दे के इर्द-गिर्द तेज किया है। पार्टी ने 18 सितंबर से ‘नशा मुक्त पंजाब यात्रा’ शुरू की है। चार अलग-अलग दिशाओं से शुरू हुई इन यात्राओं का लक्ष्य राज्य की सभी 117 विधानसभा सीटों तक पहुंचना है। करीब 4,000 किलोमीटर की इस यात्रा को 13 दिनों में पूरा करने की योजना बनाई गई है और इसका समापन 30 सितंबर को जालंधर में प्रस्तावित है।

भाजपा नेताओं का कहना है कि नशे की समस्या को केवल राजनीतिक मुद्दे के तौर पर नहीं, बल्कि सामाजिक चुनौती के रूप में भी सामने लाया जाना चाहिए। पार्टी ने इस अभियान के जरिए परिवारों और युवाओं के बीच संपर्क बढ़ाने की कोशिश की है। भाजपा की ओर से राज्य सरकार की नशे के खिलाफ कार्रवाई पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। दूसरी तरफ सरकार और सत्तारूढ़ दल अपनी नीतियों तथा कार्रवाई को अलग-अलग मौकों पर सामने रखते रहे हैं।

भाजपा राज्य की सभी 117 सीटों पर अपने संगठन को मजबूत करने की बात भी कह रही है। पार्टी अपने राष्ट्रीय स्तर और दूसरे राज्यों की भाजपा सरकारों के कामकाज को पंजाब के मतदाताओं के सामने रखने की रणनीति पर आगे बढ़ रही है। भाजपा नेताओं के बयानों में नशे, गैंगस्टरवाद, कानून-व्यवस्था और केंद्र सरकार की नीतियों का उल्लेख प्रमुखता से हो रहा है।

इस अभियान से साफ है कि भाजपा पंजाब में केवल संगठन विस्तार तक सीमित नहीं रहना चाहती, बल्कि ऐसे मुद्दों को चुनावी बहस का हिस्सा बनाने की कोशिश कर रही है जिनका सीधा संबंध सुरक्षा, युवा और सामाजिक व्यवस्था से है।

अकाली दल के लिए विरासत और क्षेत्रीय पहचान अहम

शिरोमणि अकाली दल की रणनीति बाकी तीन प्रमुख दलों से कुछ अलग दिखाई देती है। पार्टी अपने पुराने राजनीतिक आधार और पंजाब से जुड़े क्षेत्रीय मुद्दों पर जोर दे रही है। पांच बार मुख्यमंत्री रहे प्रकाश सिंह बादल की राजनीतिक विरासत को अकाली दल लगातार अपनी पहचान के हिस्से के रूप में सामने रख रहा है।

सुखबीर सिंह बादल की रैलियों और सार्वजनिक कार्यक्रमों में अकाली शासन के दौरान किए गए विकास कार्यों का उल्लेख किया जा रहा है। पार्टी ग्रामीण पंजाब के साथ अपने पुराने संपर्क और पंथक राजनीति में अपनी भूमिका को भी फिर से प्रमुखता देने की कोशिश कर रही है।

अकाली दल के सामने चुनौती केवल चुनावी अभियान चलाने की नहीं, बल्कि संगठन और पारंपरिक समर्थक आधार को दोबारा सक्रिय करने की भी है। ऐसे में पार्टी की गतिविधियों में पुराने नेतृत्व की विरासत, क्षेत्रीय मुद्दों और ग्रामीण संपर्क का मिश्रण दिखाई दे रहा है।

प्रकाश सिंह बादल की विरासत का उल्लेख अकाली दल के लिए सिर्फ एक चुनावी नारा नहीं है। पार्टी अपने लंबे राजनीतिक इतिहास को मौजूदा दौर से जोड़ने की कोशिश कर रही है। इसी के जरिए वह अपने पारंपरिक राजनीतिक आधार तक दोबारा पहुंच बनाने का प्रयास कर रही है।

कांग्रेस में एक मंच पर आने की कोशिश

पंजाब कांग्रेस के लिए इस समय संगठन को एकजुट रखना प्रमुख चुनौती और प्राथमिकता दोनों है। पार्टी के भीतर अलग-अलग नेताओं के बीच मतभेदों की खबरों के बीच सितंबर की शुरुआत में सचिन पायलट को पंजाब का AICC प्रभारी बनाया गया। उनके आने के बाद पार्टी में अलग-अलग धड़ों के बीच समन्वय बढ़ाने की कोशिशें तेज हुई हैं।

पार्टी के सामने सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि प्रदेश स्तर के प्रमुख नेता किस तरह सामूहिक रूप से चुनावी अभियान चलाते हैं। पूर्व मुख्यमंत्री चरणजीत सिंह चन्नी, प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष अमरिंदर सिंह राजा वड़िंग, नेता प्रतिपक्ष प्रताप सिंह बाजवा और सांसद सुखजिंदर सिंह रंधावा जैसे नेताओं के बीच समन्वय को लेकर लंबे समय से राजनीतिक चर्चा होती रही है।

सचिन पायलट की भूमिका के बाद कांग्रेस ने सार्वजनिक कार्यक्रमों में एकजुटता दिखाने पर जोर दिया है। हालिया कार्यक्रमों में वरिष्ठ नेताओं का एक मंच पर दिखाई देना इसी दिशा में पार्टी के संदेश का हिस्सा माना जा रहा है।

कांग्रेस की रणनीति में राहुल गांधी के नेतृत्व को भी प्रमुखता दी जा रही है। पार्टी का प्रयास है कि राज्य के नेताओं के बीच मतभेदों की जगह सामूहिक अभियान की तस्वीर सामने आए। हालांकि पार्टी के भीतर मौजूद पुराने मतभेदों को पूरी तरह खत्म करने की प्रक्रिया अभी भी संगठनात्मक स्तर पर जारी है।

चारों दलों की रणनीति अलग, लेकिन लक्ष्य एक

पंजाब की राजनीति में इस समय चार प्रमुख दल अलग-अलग मुद्दों और संदेशों के साथ जनता तक पहुंच रहे हैं। आप अपने शासनकाल के काम को लेकर घर-घर संपर्क बढ़ा रही है। भाजपा नशे और कानून-व्यवस्था जैसे मुद्दों को लेकर राज्यव्यापी यात्रा के जरिए संगठन को सक्रिय कर रही है। अकाली दल अपनी क्षेत्रीय पहचान और प्रकाश सिंह बादल की विरासत के सहारे पारंपरिक आधार को मजबूत करने में लगा है। कांग्रेस संगठनात्मक मतभेदों को कम करते हुए सामूहिक नेतृत्व का संदेश देने की कोशिश कर रही है।

इन अभियानों में एक समानता यह है कि सभी दलों ने चुनावी तैयारी को केवल राजधानी या बड़े शहरों तक सीमित नहीं रखा है। बूथ कमेटियों, यात्राओं, रैलियों और स्थानीय कार्यकर्ताओं के जरिए गांवों और परिवारों तक पहुंच बनाने पर जोर दिया जा रहा है।

सितंबर 2026 की गतिविधियां संकेत देती हैं कि पंजाब में 2027 का चुनावी मैदान तैयार करने की प्रक्रिया शुरू हो चुकी है। हालांकि उम्मीदवारों, सीटों और अंतिम चुनावी गठबंधनों से जुड़ी तस्वीर अभी पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। आने वाले महीनों में पार्टियों के संगठनात्मक फैसले, स्थानीय मुद्दे, संभावित गठबंधन और नेताओं की सक्रियता इस राजनीतिक मुकाबले की दिशा तय करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकते हैं।

फिलहाल पंजाब में राजनीतिक गतिविधियों का केंद्र विधानसभा चुनाव से पहले जनता के बीच अपनी मौजूदगी मजबूत करना है। आने वाले समय में यही शुरुआती अभियान बड़े चुनावी मुद्दों और विस्तृत घोषणापत्रों का रूप ले सकते हैं।