देश में दक्षिण-पश्चिम मानसून का चार महीने का सफर अब अंतिम दौर में पहुंच गया है, लेकिन इस बार बारिश का आंकड़ा सामान्य से काफी नीचे बना हुआ है। 21 सितंबर तक देशभर में मानसूनी बारिश सामान्य से करीब 15% कम दर्ज की गई है। भारतीय उष्णकटिबंधीय मौसम विज्ञान संस्थान (IITM) के मॉनसून ऑनलाइन आंकड़ों के मुताबिक, 1 जून से 21 सितंबर के बीच देश में 703.6 मिमी बारिश हुई, जबकि इस अवधि का सामान्य आंकड़ा 827.2 मिमी है। यानी करीब 123.6 मिमी बारिश कम हुई है।
मौसम विभाग के ताजा आंकड़ों के अनुसार, 2026 का मानसून देश के लिए हाल के वर्षों के कमजोर मानसून सीजन में शामिल हो गया है। 2009 में पूरे मानसून सीजन के दौरान बारिश सामान्य से करीब 18.3% कम रही थी। इस बार भी सीजन के अंतिम दिनों में बड़ा सुधार होने की संभावना सीमित दिखाई दे रही है। हालांकि अलग-अलग क्षेत्रों में स्थिति एक जैसी नहीं है। कुछ इलाकों में सामान्य से कम बारिश हुई है, जबकि मध्य भारत के कई हिस्सों में बारिश का प्रदर्शन तुलनात्मक रूप से बेहतर रहा है।
बिहार समेत कई राज्यों में बारिश की कमी
मानसून की सबसे बड़ी परेशानी इसका असमान वितरण रहा है। पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में बारिश सामान्य से काफी कम रही है। बिहार भी उन राज्यों में शामिल है जहां इस सीजन में बारिश की कमी ने चिंता बढ़ाई है। उपलब्ध मौसम आंकड़ों के मुताबिक बिहार में मानसूनी बारिश का घाटा करीब 36% तक पहुंचा है।
वहीं राजस्थान में भी बारिश सामान्य से कम रही है। उत्तर-पश्चिम भारत के कई हिस्सों में कमजोर बारिश के कारण खेतों की नमी और जल संसाधनों पर असर पड़ा है। पंजाब और हरियाणा जैसे कृषि प्रधान राज्यों में भी मानसून का प्रदर्शन कमजोर रहा है। पंजाब में मौसमी बारिश करीब 39% कम दर्ज की गई, जबकि हरियाणा में भी लगभग 23% की कमी बताई गई है।
हालांकि पूरे देश का आंकड़ा राज्यों की वास्तविक स्थिति को पूरी तरह नहीं बताता। मध्य भारत में बारिश की स्थिति अपेक्षाकृत बेहतर रही है, जबकि पूर्वी, पूर्वोत्तर और दक्षिणी प्रायद्वीपीय क्षेत्रों के कई हिस्सों में कमी ज्यादा रही। यही वजह है कि बारिश का असर खेती और जल उपलब्धता पर राज्य-दर-राज्य अलग-अलग दिखाई दे रहा है।
पश्चिमी राजस्थान से शुरू हुई मानसून की वापसी
कम बारिश के बीच अब मानसून की वापसी भी शुरू हो चुकी है। 19 सितंबर को पश्चिमी राजस्थान से दक्षिण-पश्चिम मानसून की विदाई की शुरुआत हुई थी। इसके बाद 21 सितंबर को मानसून राजस्थान के कुछ और हिस्सों के साथ पंजाब और हरियाणा के अधिकांश हिस्सों से पीछे हट गया। IMD के मुताबिक, वापसी की रेखा अब जैसलमेर, नागौर, सीकर, रोहतक, पटियाला और गुरदासपुर से होकर गुजर रही है।
मौसम विभाग ने बताया है कि अगले कुछ दिनों में पंजाब, हरियाणा-चंडीगढ़ और दिल्ली के बाकी हिस्सों, राजस्थान के कुछ और इलाकों तथा जम्मू-कश्मीर, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड और पश्चिमी उत्तर प्रदेश के कुछ हिस्सों से भी मानसून की वापसी के लिए परिस्थितियां अनुकूल हैं।
मानसून की वापसी का मतलब यह नहीं है कि देश के हर हिस्से में तुरंत बारिश पूरी तरह बंद हो जाएगी। अलग-अलग मौसम प्रणालियों के कारण कुछ राज्यों में बारिश जारी रह सकती है। IMD के अनुसार, मानसून की वापसी तय करने के लिए बारिश में लगातार कमी, निचले वायुमंडल में एंटी-साइक्लोनिक स्थिति और वातावरण में नमी घटने जैसे संकेत देखे जाते हैं।
बंगाल की खाड़ी का सिस्टम बदल सकता है मौसम का मिजाज
उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून कमजोर पड़ रहा है, लेकिन बंगाल की खाड़ी में बनी मौसम प्रणाली ने देश के दूसरे हिस्सों में बारिश की उम्मीद बनाए रखी है। उत्तर-पश्चिम बंगाल की खाड़ी में बना कम दबाव का क्षेत्र अगले 48 घंटे में डिप्रेशन और फिर डीप डिप्रेशन में बदलने की संभावना में है।
इस सिस्टम के कारण ओडिशा और उत्तर आंध्र प्रदेश के तटीय इलाकों में भारी से बहुत भारी बारिश की संभावना जताई गई है। इसके प्रभाव से पूर्वी और मध्य भारत के कई हिस्सों में भी बारिश की गतिविधियां बढ़ सकती हैं। मौसम प्रणाली के आगे बढ़ने के साथ ओडिशा, छत्तीसगढ़ और आसपास के क्षेत्रों में भी बारिश का दौर देखने को मिल सकता है।
यानी देश के एक हिस्से में मानसून की विदाई का दौर चल रहा है, तो दूसरी ओर बंगाल की खाड़ी की सक्रिय प्रणाली कुछ राज्यों में सीजन के अंतिम दौर में तेज बारिश करा सकती है।
अल नीनो को भी माना जा रहा अहम कारण
इस साल मानसून के कमजोर रहने के पीछे अल नीनो की भूमिका भी चर्चा में रही है। अल नीनो प्रशांत महासागर के भूमध्यरेखीय हिस्से में समुद्र की सतह के तापमान में असामान्य बढ़ोतरी से जुड़ी जलवायु घटना है। इसके कारण समुद्र और वायुमंडल के बीच ऊर्जा तथा हवाओं का सामान्य पैटर्न बदल सकता है।
इस बदलाव का असर दुनिया के अलग-अलग हिस्सों में वर्षा और तापमान के पैटर्न पर पड़ता है। भारत के संदर्भ में अल नीनो को अक्सर मानसूनी हवाओं और बारिश के लिए जोखिम कारक माना जाता है। इस साल भी कमजोर बारिश के साथ गर्म परिस्थितियों और अल नीनो के प्रभाव ने मिट्टी की नमी तथा फसल उत्पादन को लेकर चिंता बढ़ाई है। ICRA ने भी अपनी रिपोर्ट में सामान्य से अधिक तापमान और अल नीनो परिस्थितियों को फसल की नमी और पैदावार के लिए जोखिम बताया है।
खरीफ के बाद अब रबी फसलों पर नजर
कम बारिश का असर केवल मौजूदा खरीफ सीजन तक सीमित नहीं रहने की आशंका है। खरीफ फसलों की बुवाई के दौरान भी कई क्षेत्रों में बारिश की कमी रही। हालांकि सीजन आगे बढ़ने के साथ बुवाई का अंतर कुछ कम हुआ, लेकिन चावल और मक्का जैसी कुछ प्रमुख फसलों पर दबाव बना हुआ है।
चावल के उत्पादन को लेकर भी बड़ा अनुमान सामने आया है। Reuters की रिपोर्ट के अनुसार, 2026 में भारत का चावल उत्पादन करीब 10 मिलियन टन घटकर लगभग 144 मिलियन टन रहने का अनुमान है। यह पिछले साल के रिकॉर्ड उत्पादन की तुलना में लगभग 6.5% कम होगा। कम बारिश के अलावा चावल के रकबे में कमी को भी इसके पीछे एक कारण बताया गया है।
अब अक्टूबर से रबी सीजन की तैयारी शुरू होगी। गेहूं, चना और दूसरी रबी फसलों के लिए शुरुआती सिंचाई बेहद महत्वपूर्ण रहती है। ऐसे में जिन राज्यों में जलाशयों और मिट्टी में पर्याप्त नमी नहीं है, वहां किसानों को सिंचाई पर ज्यादा निर्भर रहना पड़ सकता है।
जलाशयों में कम पानी से बढ़ी चिंता
कम बारिश का एक और असर देश के जल भंडार पर पड़ रहा है। ICRA ने अपनी रिपोर्ट में खासतौर पर उत्तर और दक्षिण भारत के जलाशयों में भंडारण में गिरावट को आगामी रबी सीजन के लिए जोखिम बताया है। जून से अगस्त 2026 के दौरान देश में बारिश लंबी अवधि के औसत की करीब 86% रही थी।
जलाशयों में पानी की स्थिति खेती के अलावा बिजली उत्पादन के लिहाज से भी महत्वपूर्ण है। हाइड्रोपावर उत्पादन सीधे जल उपलब्धता से जुड़ा है। अगर जलाशयों में पर्याप्त पानी नहीं रहता, तो जलविद्युत उत्पादन पर दबाव आ सकता है। दूसरी तरफ सिंचाई और घरेलू जरूरतों के लिए पानी की मांग बनी रहने से उपलब्ध संसाधनों पर अतिरिक्त दबाव पड़ सकता है।
मानसून खत्म होने से पहले कितनी भरपाई संभव?
21 सितंबर तक बारिश में करीब 15% की कमी बनी हुई है। मानसून सीजन का आधिकारिक सामान्य अंत 30 सितंबर माना जाता है, लेकिन अब समय काफी कम बचा है। उत्तर-पश्चिम भारत में मानसून की वापसी शुरू होने के कारण पूरे देश के औसत आंकड़े में बड़ी भरपाई के लिए पर्याप्त समय नहीं बचा है।
फिर भी बंगाल की खाड़ी में बनी नई मौसम प्रणाली के कारण पूर्वी और मध्य भारत में अगले कुछ दिनों में अच्छी बारिश हो सकती है। इससे स्थानीय स्तर पर बारिश की कमी कुछ कम हो सकती है, लेकिन पूरे देश के मौसमी आंकड़े में कितना सुधार होगा, यह आने वाली बारिश की मात्रा और उसके वितरण पर निर्भर करेगा।
इस तरह 2026 का मानसून अब अंतिम चरण में है। एक तरफ उत्तर-पश्चिम भारत से बारिश का दौर खत्म होने की ओर है, वहीं पूर्वी और दक्षिणी हिस्सों में सक्रिय मौसम प्रणालियां अभी भी बारिश करा सकती हैं। कमजोर मानसून का वास्तविक असर अब खरीफ उत्पादन, जलाशयों की स्थिति और अक्टूबर से शुरू होने वाले रबी सीजन में पानी की उपलब्धता के जरिए सामने आएगा।