भारत ने पाकिस्तान के राष्ट्रपति आसिफ अली जरदारी की उस टिप्पणी पर कड़ा ऐतराज जताया है जिसमें उन्होंने वाराणसी स्थित एक मस्जिद को लेकर चिंता जताई थी और भारत से कार्रवाई रोकने की अपील की थी। भारतीय विदेश मंत्रालय ने साफ कहा है कि पाकिस्तान को भारत के घरेलू मुद्दों पर टिप्पणी करने का कोई अधिकार नहीं है।
विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल की ओर से जारी बयान में कहा गया कि पाकिस्तान का मानवाधिकारों को लेकर खुद का रिकॉर्ड बेहद खराब रहा है और दुनिया भर में उस पर सवाल उठते रहे हैं। ऐसे में उसके द्वारा भारत को उपदेश देना या टिप्पणी करना पूरी तरह अनुचित और आधारहीन है। मंत्रालय ने यह भी कहा कि पाकिस्तान लगातार अल्पसंख्यकों के साथ भेदभाव और उत्पीड़न के मामलों में चर्चा में रहा है, इसलिए उसकी बातें गंभीरता से नहीं ली जा सकतीं।
जरदारी का दावा: भारत में मुस्लिम धार्मिक स्थलों को खतरा
पाकिस्तान के राष्ट्रपति कार्यालय की ओर से जारी बयान में आसिफ अली जरदारी ने कहा था कि भारत में कई ऐतिहासिक मुस्लिम धार्मिक स्थल जोखिम में हैं। उन्होंने विशेष रूप से वाराणसी की गंज शहीदा मस्जिद का उल्लेख करते हुए कहा कि यह लगभग एक हजार साल पुरानी विरासत है और इसे लेकर चिंता बढ़ रही है।
जरदारी ने भारत सरकार से आग्रह किया था कि ऐसे किसी भी कदम को रोका जाए जिससे धार्मिक स्थलों पर असर पड़े। उनके अनुसार, इससे सामाजिक तनाव बढ़ सकता है और देश में अस्थिरता पैदा हो सकती है। उन्होंने यह भी कहा कि अल्पसंख्यकों के अधिकारों और साझा सांस्कृतिक धरोहर की सुरक्षा सुनिश्चित करना जरूरी है।
क्या है वाराणसी की गंज शहीदा मस्जिद का मामला
यह विवाद वाराणसी में काशी रेलवे स्टेशन के पुनर्विकास और मल्टी-मॉडल ट्रांसपोर्ट हब परियोजना से जुड़ा है। इस विकास कार्य के तहत रेलवे प्रशासन ने स्टेशन के पास स्थित गंज शहीदा मस्जिद को लेकर नोटिस जारी किया था। प्रशासन का कहना है कि यह संरचना रेलवे की भूमि पर अवैध रूप से बनी हुई है।
रेलवे ने मस्जिद प्रबंधन को 20 जून तक परिसर खाली करने का निर्देश दिया था। अधिकारियों का दावा है कि 1991 में दर्ज एक दीवानी मामले में अगस्त 2024 में आए फैसले के बाद इस जमीन को खाली कराने की प्रक्रिया आगे बढ़ाई गई।
रेलवे का पक्ष है कि अदालत के निर्णय के बाद इस ढांचे को हटाने का रास्ता साफ हो गया है और स्टेशन विस्तार परियोजना के लिए यह जमीन आवश्यक है।
रेलवे प्रशासन के मुख्य तर्क
- मस्जिद रेलवे की जमीन पर स्थित है
- स्टेशन विस्तार और सड़क चौड़ीकरण परियोजना के लिए भूमि जरूरी है
- अदालत के फैसले के बाद कार्रवाई का आधार मिला
- तय समय में जगह खाली न करने पर प्रशासन खुद कार्रवाई कर सकता है
मस्जिद कमेटी का दावा और विरोध
वहीं मस्जिद प्रबंधन समिति ने इन दावों को स्वीकार नहीं किया है। उनका कहना है कि यह धार्मिक स्थल बहुत पुराना है और 17वीं सदी से इसका ऐतिहासिक उल्लेख मिलता है। समिति के अनुसार 1883-84 के राजस्व रिकॉर्ड और पुराने नक्शों में भी इसका उल्लेख मौजूद है।
समिति का दावा है कि यह मस्जिद रेलवे लाइन बनने से पहले से मौजूद है, इसलिए इसे अवैध नहीं कहा जा सकता। उनका यह भी कहना है कि रेलवे जिस अदालत के फैसले का हवाला दे रहा है, उसकी व्याख्या गलत तरीके से की जा रही है।
इसके अलावा मस्जिद कमेटी ने नोटिस की वैधता पर भी सवाल उठाए हैं। उनका कहना है कि नोटिस पर किसी अधिकृत अधिकारी के हस्ताक्षर और स्पष्ट तारीख नहीं है, जिससे इसकी कानूनी स्थिति संदिग्ध लगती है।
आगे क्या होगा
मामले को लेकर मस्जिद प्रबंधन ने कानूनी लड़ाई लड़ने का फैसला किया है और अब वे हाईकोर्ट का दरवाजा खटखटाने की तैयारी में हैं। दूसरी ओर रेलवे प्रशासन अपनी विकास परियोजना को आगे बढ़ाने के पक्ष में अड़ा हुआ है, जिससे यह विवाद और तेज होने की संभावना है।