बांग्लादेश ने अपनी बहुप्रतीक्षित तीस्ता नदी प्रबंधन परियोजना (Teesta River Management Project) को लेकर बड़ा रणनीतिक फैसला लिया है। नई सरकार ने भारत के पुराने निवेश प्रस्ताव को आगे नहीं बढ़ाते हुए चीन के साथ समझौता करने का निर्णय लिया है। इस फैसले के तहत चीन सरकारी सहयोग के माध्यम से करीब 7 हजार करोड़ रुपये का सॉफ्ट लोन उपलब्ध कराएगा, जिससे परियोजना का निर्माण और विकास किया जाएगा। इस कदम को केवल आर्थिक समझौता नहीं बल्कि दक्षिण एशिया की बदलती भू-राजनीतिक परिस्थितियों से जोड़कर भी देखा जा रहा है।
सूत्रों के मुताबिक चीन और बांग्लादेश के बीच सरकार-से-सरकार (G2G) समझौते के तहत इस परियोजना पर काम शुरू करने की तैयारी हो चुकी है। चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना के इंजीनियरों और तकनीकी विशेषज्ञों का एक दल हाल ही में बांग्लादेश पहुंचा है, जिसने परियोजना क्षेत्र का प्रारंभिक निरीक्षण भी शुरू कर दिया है। आने वाले महीनों में विस्तृत सर्वे के बाद निर्माण संबंधी अंतिम योजना तैयार की जाएगी।
भारत का प्रस्ताव पीछे छूटा
जानकारी के अनुसार भारत ने वर्ष 2024 में तत्कालीन शेख हसीना सरकार के सामने लगभग 9 हजार करोड़ रुपये का निवेश प्रस्ताव रखा था। उस समय माना जा रहा था कि तीस्ता परियोजना भारत और बांग्लादेश के बीच सहयोग का एक महत्वपूर्ण उदाहरण बन सकती है। हालांकि राजनीतिक परिस्थितियों में बदलाव के बाद शेख हसीना सरकार सत्ता से बाहर हो गई और अंतरिम प्रशासन के दौरान इस प्रस्ताव पर कोई अंतिम निर्णय नहीं लिया गया।
अब प्रधानमंत्री तारिक रहमान के नेतृत्व वाली नई सरकार ने चीन के साथ आगे बढ़ने का फैसला किया है। बताया जा रहा है कि चीन द्वारा दिए जाने वाले सॉफ्ट लोन की भुगतान अवधि लगभग 50 वर्ष रखी गई है, जिससे बांग्लादेश पर तत्काल वित्तीय दबाव कम रहेगा। इसी वजह से सरकार ने चीनी प्रस्ताव को अधिक व्यावहारिक माना।
मानसून के दौरान होगा विस्तृत सर्वे
परियोजना को अंतिम रूप देने से पहले चीन का विशेषज्ञ दल पूरे मानसून सीजन में तीस्ता नदी के जल प्रवाह, नदी की दिशा, बाढ़ की स्थिति और तलछट (सिल्ट) के जमाव का विस्तृत अध्ययन करेगा। सर्वे के आधार पर यह तय किया जाएगा कि किन स्थानों पर बांध, तटबंध, जेट्टी और जल प्रबंधन से जुड़े अन्य ढांचे बनाए जाएंगे।
विशेषज्ञ नदी के बहाव का वैज्ञानिक विश्लेषण करने के साथ यह भी देखेंगे कि किस प्रकार अतिरिक्त पानी को नियंत्रित कर कृषि उपयोग के लिए सुरक्षित रखा जा सकता है। इसके बाद विस्तृत परियोजना रिपोर्ट तैयार होगी, जिसके आधार पर निर्माण कार्य शुरू किया जाएगा।
बांग्लादेश की प्राथमिकता कृषि और जल प्रबंधन
बांग्लादेश लंबे समय से तीस्ता नदी के अतिरिक्त बहाव को नियंत्रित करने की मांग करता रहा है। सरकार का मानना है कि यदि मानसून के दौरान बहने वाले अतिरिक्त पानी को संरक्षित किया जाए तो अगले वर्ष से खरीफ सीजन में किसानों को सिंचाई के लिए अधिक पानी उपलब्ध कराया जा सकेगा।
बताया जा रहा है कि बांग्लादेश ने चीन से अनुरोध किया है कि निर्माण कार्य शुरू होने से पहले ही नदी में जल नियंत्रण और सिल्ट हटाने जैसे प्रारंभिक कार्यों में सहयोग दिया जाए। यदि ऐसा होता है तो परियोजना पूरी होने से पहले भी स्थानीय किसानों को कुछ लाभ मिल सकता है।
पावर चाइना को मिली अहम जिम्मेदारी
इस परियोजना का जिम्मा चीन की सरकारी कंपनी पावर चाइना को सौंपा गया है। यह कंपनी दुनिया के कई देशों में बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर, जल संसाधन और ऊर्जा परियोजनाओं पर काम कर चुकी है। बांग्लादेश में भी यही कंपनी परियोजना की डिजाइन, निर्माण और तकनीकी संचालन की जिम्मेदारी संभालेगी।
सूत्रों का कहना है कि कंपनी के विशेषज्ञों के साथ बड़ी संख्या में तकनीकी कर्मचारी और इंजीनियर भी लंबे समय तक परियोजना क्षेत्र में मौजूद रहेंगे। इससे निर्माण कार्य की निगरानी और तकनीकी सहायता लगातार जारी रहेगी।
सीमा के नजदीक होने से बढ़ी रणनीतिक चर्चा
तीस्ता परियोजना का अधिकांश हिस्सा बांग्लादेश के उत्तरी जिलों में स्थित है, जो भारत की सीमा से काफी निकट हैं। यह इलाका पश्चिम बंगाल की सीमा से कुछ किलोमीटर की दूरी पर है और भारत के रणनीतिक दृष्टि से महत्वपूर्ण सिलीगुड़ी कॉरिडोर के भी अपेक्षाकृत करीब माना जाता है।
सिलीगुड़ी कॉरिडोर को भारत के पूर्वोत्तर राज्यों को मुख्य भूमि से जोड़ने वाला सबसे महत्वपूर्ण भू-भाग माना जाता है। ऐसे में परियोजना में बड़ी संख्या में चीनी विशेषज्ञों की मौजूदगी को लेकर भारत के सुरक्षा विशेषज्ञों के बीच चर्चा तेज हो गई है। उनका मानना है कि इस क्षेत्र में चीन की सक्रियता भविष्य में सामरिक दृष्टि से नए सवाल खड़े कर सकती है।
सुरक्षा विशेषज्ञों की बढ़ी चिंता
रक्षा मामलों के जानकारों का कहना है कि किसी भी बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट में वर्षों तक विदेशी तकनीकी टीमों की मौजूदगी सामान्य बात होती है, लेकिन जब परियोजना किसी संवेदनशील सीमा क्षेत्र के पास हो तो सुरक्षा एजेंसियां अतिरिक्त सतर्कता बरतती हैं।
विशेषज्ञों का मानना है कि यदि बड़ी संख्या में चीनी इंजीनियर और तकनीकी कर्मचारी लंबे समय तक इस इलाके में काम करते हैं तो भारत को अपनी सीमा पर निगरानी और सुरक्षा व्यवस्था और मजबूत करनी पड़ सकती है। हालांकि इस संबंध में किसी भी पक्ष की ओर से आधिकारिक सुरक्षा टिप्पणी सामने नहीं आई है।
सैन्य सहयोग को लेकर भी बढ़ी हलचल
तीस्ता परियोजना के साथ-साथ बांग्लादेश और चीन के बीच रक्षा सहयोग को लेकर भी चर्चाएं तेज हो गई हैं। सूत्रों के अनुसार हाल ही में बांग्लादेश के रक्षा सलाहकार और चीन के राजदूत के बीच कई दौर की बातचीत हुई, जिसमें रक्षा उपकरणों की खरीद समेत विभिन्न विषयों पर चर्चा हुई।
मीडिया रिपोर्टों में दावा किया जा रहा है कि बांग्लादेश चीन से जे-सीरीज के लड़ाकू विमान खरीदने पर विचार कर रहा है। यदि यह समझौता अंतिम रूप लेता है तो आने वाले समय में दोनों देशों के सैन्य संबंध और मजबूत हो सकते हैं।
फाइटर जेट्स की पहली खेप पर चर्चा
सूत्रों के अनुसार चीन इस वर्ष के अंत तक लड़ाकू विमानों की पहली खेप बांग्लादेश को सौंप सकता है। हालांकि दोनों देशों की ओर से इस संबंध में आधिकारिक घोषणा नहीं की गई है, लेकिन रक्षा विशेषज्ञ इसे दोनों देशों के बढ़ते सामरिक सहयोग का संकेत मान रहे हैं।
यदि यह सौदा पूरा होता है तो बांग्लादेश की वायुसेना को आधुनिक लड़ाकू विमान मिलेंगे और चीन की रक्षा उद्योग को दक्षिण एशिया में एक और बड़ा ग्राहक प्राप्त होगा।
पनडुब्बी बेस और एयरबेस पर भी सहयोग
चीन पहले से ही बांग्लादेश के कई रक्षा और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं में सहयोग कर रहा है। कॉक्स बाजार के पेकुआ क्षेत्र में चीन के सहयोग से विकसित पनडुब्बी बेस को रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण माना जाता है। बताया जाता है कि यहां पनडुब्बियों के रखरखाव और तकनीकी सुविधाओं का भी विकास किया गया है।
इसके अलावा लालमोनिरहाट क्षेत्र में एयरबेस के आधुनिकीकरण में भी चीन सहयोग कर रहा है। यह इलाका भारत की सीमा और सिलीगुड़ी कॉरिडोर के अपेक्षाकृत निकट होने के कारण सामरिक चर्चाओं का केंद्र बना हुआ है।
बदलते समीकरणों पर नजर
विश्लेषकों का कहना है कि बांग्लादेश का यह फैसला केवल एक नदी परियोजना तक सीमित नहीं है, बल्कि यह दक्षिण एशिया में बदलते कूटनीतिक और आर्थिक समीकरणों की भी झलक देता है। चीन पिछले कुछ वर्षों से बांग्लादेश में सड़क, ऊर्जा, बंदरगाह, रेलवे और रक्षा क्षेत्र सहित कई बड़े निवेश कर चुका है। दूसरी ओर भारत भी अपने पड़ोसी देशों के साथ बुनियादी ढांचा और संपर्क परियोजनाओं के जरिए संबंध मजबूत करने की नीति पर काम कर रहा है।
ऐसे में तीस्ता परियोजना का चीन के हाथ में जाना दोनों देशों के बीच प्रतिस्पर्धा का नया अध्याय माना जा रहा है। आने वाले समय में इस परियोजना की प्रगति, चीन की भूमिका और भारत की रणनीतिक प्रतिक्रिया पर क्षेत्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार नजर बनी रहेगी। फिलहाल बांग्लादेश सरकार का कहना है कि उसका मुख्य उद्देश्य नदी प्रबंधन को बेहतर बनाना, बाढ़ नियंत्रण को मजबूत करना और कृषि क्षेत्र के लिए स्थायी जल उपलब्धता सुनिश्चित करना है, जबकि विशेषज्ञ इस फैसले के आर्थिक, कूटनीतिक और सुरक्षा संबंधी प्रभावों का लगातार आकलन कर रहे हैं।