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री-नीट में लुधियाना का दबदबा, आर्यन गुप्ता बने देश के टॉपर; मेरिट लिस्ट में नाम नहीं होने पर छात्रा सिमरन ने उठाए सवाल

री-नीट यूजी 2026 के घोषित नतीजों ने पंजाब के लुधियाना को राष्ट्रीय स्तर पर नई पहचान दिलाई है। इस बार शहर के तीन विद्यार्थियों ने ऑल इंडिया टॉप-100 में जगह बनाकर शानदार प्रदर्शन किया। इनमें सबसे बड़ी उपलब्धि दुगरी निवासी आर्यन गुप्ता के नाम रही, जिन्होंने 720 में से 715 अंक हासिल कर देशभर में पहली रैंक प्राप्त की। उनके अलावा दिवित जैन ने 695 अंकों के साथ 79वीं और रिशित सिंगला ने 690 अंकों के साथ 100वीं रैंक हासिल की। हालांकि परिणाम घोषित होने के बाद समराला की छात्रा सिमरन रानी का मामला भी चर्चा का विषय बन गया, जिन्होंने समान अंक होने के बावजूद मेरिट सूची में अपना नाम नहीं होने का आरोप लगाया है।

देशभर में पहली रैंक हासिल करने वाले आर्यन गुप्ता की सफलता केवल परीक्षा में अच्छे अंक लाने तक सीमित नहीं है। उनकी उपलब्धि के पीछे एक ऐसा संकल्प छिपा है, जिसने बचपन से ही उनके जीवन का लक्ष्य तय कर दिया था। जब वह तीसरी कक्षा में पढ़ते थे, तब उनकी दादी का कैंसर से निधन हो गया। इस घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया और उसी समय उन्होंने निश्चय किया कि वह बड़े होकर कैंसर रोग विशेषज्ञ यानी ऑन्कोलॉजिस्ट बनेंगे। उनका मानना है कि यदि बेहतर इलाज और समय पर उपचार उपलब्ध हो तो कई मरीजों की जान बचाई जा सकती है।

आर्यन बताते हैं कि पहली बार आयोजित नीट परीक्षा के बाद जब पेपर लीक का मामला सामने आया और दोबारा परीक्षा कराने की घोषणा हुई तो वह मानसिक रूप से काफी परेशान हो गए थे। कुछ समय के लिए उनका आत्मविश्वास भी डगमगा गया था। उन्होंने स्वीकार किया कि इस दौरान भावनात्मक दबाव इतना अधिक था कि वह रो भी पड़े थे। लेकिन जल्द ही उन्होंने खुद को संभाला और फिर से पूरे अनुशासन के साथ पढ़ाई शुरू कर दी। उनका कहना है कि यदि लक्ष्य स्पष्ट हो तो कठिन परिस्थितियां भी सफलता का रास्ता नहीं रोक सकतीं।

उनकी तैयारी में परिवार की महत्वपूर्ण भूमिका रही। खासकर उनके बड़े भाई ने हर कदम पर उनका मार्गदर्शन किया। आर्यन के भाई ने वर्ष 2025 की नीट परीक्षा में ऑल इंडिया 54वीं रैंक प्राप्त की थी और वर्तमान में दिल्ली में एमबीबीएस की पढ़ाई कर रहे हैं। उन्होंने छोटे भाई को विषयों की तैयारी, समय प्रबंधन, नोट्स तैयार करने और परीक्षा रणनीति बनाने में लगातार सहयोग दिया। आर्यन का कहना है कि भाई के अनुभव ने उन्हें दोबारा परीक्षा की तैयारी के दौरान काफी आत्मविश्वास दिया।

आर्यन के परिवार का चिकित्सा क्षेत्र से गहरा जुड़ाव भी उनकी प्रेरणा बना। उनके पिता डॉ. सचिन गुप्ता एनेस्थीसिया विशेषज्ञ हैं, जबकि मां डॉ. रीनू गुप्ता स्त्री एवं प्रसूति रोग विशेषज्ञ के रूप में कार्यरत हैं। पिछले दो वर्षों से वह लुधियाना के एक कोचिंग संस्थान में तैयारी कर रहे थे। नियमित कक्षाओं के अलावा वह प्रतिदिन लगभग 16 से 17 घंटे तक पढ़ाई करते थे। उन्होंने अपनी स्कूली शिक्षा सेक्रेड हार्ट स्कूल, सराभा नगर से पूरी की और मेडिकल स्ट्रीम में 97.2 प्रतिशत अंक हासिल किए। पढ़ाई के साथ-साथ वह टेबल टेनिस के भी अच्छे खिलाड़ी हैं और राज्य स्तरीय प्रतियोगिताओं में हिस्सा ले चुके हैं।

आर्यन ने बताया कि पहली परीक्षा में उनसे पांच प्रश्न गलत हो गए थे, जबकि री-नीट में केवल एक प्रश्न गलत हुआ। इसी वजह से उन्हें पहले से बेहतर प्रदर्शन करने का अवसर मिला और वह देशभर में शीर्ष स्थान हासिल करने में सफल रहे। उनका कहना है कि दूसरी परीक्षा को उन्होंने एक नई शुरुआत की तरह लिया और उसी सोच ने उन्हें बेहतर परिणाम दिलाया।

लुधियाना के एक अन्य प्रतिभाशाली छात्र दिवित जैन ने भी शानदार सफलता हासिल की। उन्होंने 695 अंक प्राप्त कर ऑल इंडिया 79वीं रैंक हासिल की। दिवित के अनुसार पहली परीक्षा में उनका प्रदर्शन बहुत अच्छा रहा था और लगभग 715 अंक बनने की उम्मीद थी। लेकिन पेपर लीक और री-नीट की घोषणा ने उन्हें मानसिक रूप से काफी प्रभावित किया। शुरुआती दो दिनों तक उन्होंने पढ़ाई से दूरी बनाई, लेकिन बाद में खुद को समझाया कि सभी अभ्यर्थियों को समान परिस्थिति का सामना करना पड़ रहा है। इसके बाद उन्होंने पूरी एकाग्रता के साथ दोबारा तैयारी शुरू की।

दिवित ने पढ़ाई के साथ मानसिक संतुलन बनाए रखने पर भी विशेष ध्यान दिया। वह नियमित रूप से बैडमिंटन खेलते रहे, जिम जाते रहे और संगीत सुनकर तनाव कम करते रहे। उनका मानना है कि लगातार पढ़ाई के बीच मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना भी उतना ही जरूरी है। परीक्षा की तैयारी के दौरान उन्होंने प्रतिदिन लगभग 12 से 13 घंटे अध्ययन किया। उन्होंने दसवीं तक की पढ़ाई केवीएम स्कूल और बारहवीं की शिक्षा एमजीएम स्कूल से मेडिकल स्ट्रीम में 90 प्रतिशत अंकों के साथ पूरी की।

दिवित का परिवार भी चिकित्सा क्षेत्र से जुड़ा हुआ है। उनके पिता डॉ. कुनाल जैन कैंसर विशेषज्ञ हैं, जबकि मां डॉ. कनुप्रिया जैन स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। दिवित का कहना है कि परीक्षा जीवन का केवल एक पड़ाव है। कभी परिणाम उम्मीद के अनुसार आते हैं तो कभी परिस्थितियां बदल जाती हैं, लेकिन मेहनत और धैर्य बनाए रखना सबसे महत्वपूर्ण होता है।

लुधियाना के तीसरे छात्र रिशित सिंगला ने भी ऑल इंडिया टॉप-100 में स्थान बनाकर शहर का नाम रोशन किया। उन्होंने 690 अंक प्राप्त कर देशभर में 100वीं रैंक हासिल की। पहली परीक्षा में उनके लगभग 715 अंक बनने की संभावना थी, लेकिन दोबारा परीक्षा होने से उन्हें भी मानसिक दबाव का सामना करना पड़ा। हालांकि उन्होंने तनाव को अपनी तैयारी पर हावी नहीं होने दिया।

रिशित ने बताया कि पढ़ाई के साथ उन्होंने अपने शौक भी जारी रखे। खाली समय में वह टेबल टेनिस खेलते, शतरंज खेलते और फिल्में देखकर खुद को तनावमुक्त रखते थे। कोचिंग के अलावा वह प्रतिदिन करीब नौ से दस घंटे स्वयं अध्ययन करते थे। उन्होंने जीएनपीएस स्कूल से मेडिकल स्ट्रीम में 98.4 प्रतिशत अंकों के साथ बारहवीं की परीक्षा पास की है। उनके पिता डॉ. मनीकांत सिंगला एंडोक्रिनोलॉजिस्ट हैं और मां मोनिका सिंगला स्त्री रोग विशेषज्ञ हैं। रिशित भी भविष्य में अपने पिता की तरह एंडोक्रिनोलॉजिस्ट बनना चाहते हैं।

जहां एक ओर लुधियाना के विद्यार्थियों की उपलब्धियां चर्चा में रहीं, वहीं समराला क्षेत्र की छात्रा सिमरन रानी का मामला नए विवाद का कारण बन गया। सिमरन और उनके परिवार का दावा है कि आधिकारिक परिणाम में उन्हें 720 में से 715 अंक मिले हैं, लेकिन इसके बावजूद जारी मेरिट सूची में उनका नाम शामिल नहीं किया गया। परिवार के अनुसार परिणाम घोषित होने के बाद लगातार वेबसाइट पर लॉग इन करने पर हर बार 715 अंक ही दिखाई दिए, जिससे उन्हें पूरा विश्वास था कि उन्हें शीर्ष रैंक मिलेगी। लेकिन आधिकारिक मेरिट सूची में नाम नहीं मिलने से वे हैरान रह गए।

परिवार का कहना है कि पहले उन्हें बधाई देने वालों का तांता लग गया था और सोशल मीडिया पर भी उनकी उपलब्धि तेजी से साझा की जा रही थी। लेकिन बाद में जब विस्तृत मेरिट सूची सामने आई तो उसमें नाम गायब देखकर पूरे परिवार को बड़ा झटका लगा। उनका आरोप है कि यदि यह तकनीकी गलती है तो उसे तुरंत सुधारा जाना चाहिए, क्योंकि इससे एक मेहनती छात्रा के भविष्य पर असर पड़ सकता है।

सिमरन ने बताया कि उन्होंने इस परीक्षा के लिए लंबे समय तक कठिन परिश्रम किया। वह प्रतिदिन लगभग छह घंटे ऑनलाइन कक्षाओं में शामिल होती थीं और इसके बाद 12 से 13 घंटे स्वयं अध्ययन करती थीं। पहली परीक्षा रद्द होने के बाद वह मानसिक रूप से काफी परेशान थीं, क्योंकि उन्हें उम्मीद थी कि उस परीक्षा में भी उनके लगभग 710 अंक आते। लेकिन री-नीट की घोषणा के बाद उन्होंने पूरी मेहनत से दोबारा तैयारी की और बेहतर प्रदर्शन किया।

छात्रा के परिवार ने परीक्षा आयोजित करने वाली संस्था से पूरे मामले की पारदर्शी जांच की मांग की है। उनका कहना है कि यदि किसी प्रकार की त्रुटि हुई है तो उत्तर पुस्तिका और उत्तर कुंजी उपलब्ध कराई जाए ताकि वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके। परिवार ने यह भी कहा है कि यदि गलती छात्रा की होगी तो वे उसे स्वीकार करेंगे, लेकिन यदि त्रुटि प्रशासनिक स्तर पर हुई है तो उसका नुकसान उनकी बेटी को नहीं उठाना चाहिए। उन्होंने चेतावनी दी है कि यदि सिमरन को उसके अंकों के अनुरूप उचित स्थान नहीं दिया गया तो न्याय पाने के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया जाएगा। उनका कहना है कि यह मामला केवल एक छात्रा का नहीं, बल्कि उन सभी अभ्यर्थियों के भरोसे से जुड़ा है जो पूरी मेहनत और ईमानदारी के साथ प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी करते हैं।