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रुपये की गिरावट की असली वजह क्या? पेट्रोल-गोल्ड नहीं, निवेश व्यवस्था बनी चिंता

रुपये में लगातार कमजोरी और शेयर बाजार में उतार-चढ़ाव के बीच अक्सर लोगों को सलाह दी जाती है कि पेट्रोल कम खर्च करें, सोने की खरीदारी घटाएं और विदेश यात्राओं से बचें। हालांकि विशेषज्ञों का मानना है कि इससे समस्या की जड़ पर असर नहीं पड़ता। असल चुनौती देश की वित्तीय और निवेश व्यवस्था से जुड़ी हुई है, जहां विदेशी पूंजी का भरोसा कमजोर पड़ता दिख रहा है।

दरअसल, भारतीय अर्थव्यवस्था में खपत या बचत की कमी नहीं है, बल्कि दिक्कत यह है कि पूंजी सही सेक्टर्स तक नहीं पहुंच पा रही। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, डिफेंस, मैन्युफैक्चरिंग और ग्रीन एनर्जी जैसे क्षेत्रों में बड़े अवसर मौजूद हैं, लेकिन निवेशक वहां पर्याप्त निवेश नहीं कर रहे। विदेशी निवेशकों को भारत में नीतियों की स्थिरता और आसान एग्जिट की कमी महसूस होती है, जिसके चलते वे सिंगापुर और दुबई जैसे बाजारों की ओर रुख कर रहे हैं।

इस साल भारतीय शेयर बाजार भी दबाव में रहा। निफ्टी 50 इंडेक्स करीब 11% टूट चुका है, जबकि एशिया के कई बाजारों ने बेहतर प्रदर्शन किया। दक्षिण कोरिया का KOSPI, ताइवान का TAIEX और जापान का Nikkei मजबूत बढ़त में रहे। दूसरी ओर डॉलर के मुकाबले रुपया भी लगातार कमजोर हुआ है। साल की शुरुआत में जहां एक डॉलर करीब 89.86 रुपये का था, वहीं अब इसकी कीमत 96 रुपये के करीब पहुंच गई है। RBI की कोशिशों के बावजूद विदेशी निवेशकों की बिकवाली जारी है।

हाल ही में फ्लिपकार्ट से अमेरिकी निवेश कंपनी टाइगर ग्लोबल की हिस्सेदारी बिक्री ने भी विदेशी निवेशकों के बीच चिंता बढ़ाई। कंपनी को इस डील पर भारी टैक्स चुकाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने GAAR नियमों को लागू मानते हुए निवेश पर टैक्स देनदारी को सही ठहराया। कानूनी रूप से फैसला सही माना गया, लेकिन इससे यह संदेश गया कि भारत में निवेश नियमों की व्याख्या समय के साथ बदल सकती है।

विशेषज्ञों का कहना है कि केवल RBI के हस्तक्षेप, NOP लिमिट या TCS जैसी नीतियों से रुपये पर दबाव लंबे समय तक कम नहीं होगा। जरूरत ऐसे निवेश मॉडल की है, जहां विदेशी पूंजी केवल शेयर बाजार तक सीमित न रहे, बल्कि हेल्थकेयर, लॉजिस्टिक्स और इंफ्रास्ट्रक्चर जैसे वास्तविक कारोबारों में भी पहुंचे। इससे बाजार में घबराहट कम होगी और निवेशक लंबी अवधि के प्रदर्शन पर ध्यान देंगे।