लुधियाना में आयोजित श्री हनुमंत कथा के दौरान बागेश्वर धाम के पीठाधीश्वर पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने धार्मिक आस्था के साथ सामाजिक सेवा और जागरूकता का संदेश दिया। मंगलम वेलफेयर एंड चैरिटेबल सोसाइटी की ओर से ग्लाडा ग्राउंड में चल रही कथा के तीसरे दिन दिव्य दरबार का आयोजन हुआ। इस दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। धीरेंद्र शास्त्री ने भक्तों की समस्याएं सुनीं और पर्चियों के माध्यम से उनकी परेशानियों पर चर्चा की। कार्यक्रम में उन्होंने मतांतरण को लेकर भी अपनी चिंता जाहिर की और कहा कि किसी व्यक्ति को डर, दबाव या लालच देकर धर्म परिवर्तन के लिए प्रेरित करना उचित नहीं है।
धीरेंद्र शास्त्री ने अपने संबोधन में कहा कि उनका उद्देश्य किसी धर्म या समुदाय के खिलाफ खड़ा होना नहीं है। उन्होंने कहा कि सभी धर्मों का सम्मान किया जाना चाहिए, लेकिन यदि किसी व्यक्ति को भय या आर्थिक लाभ का लालच देकर उसका मत परिवर्तन कराया जाता है तो यह गलत है। उन्होंने पंजाब में ऐसी गतिविधियों को लेकर चिंता जताते हुए लोगों को अपने धार्मिक और सांस्कृतिक मूल्यों के प्रति जागरूक रहने का आह्वान किया।
उन्होंने कहा कि जब तक उनके शरीर में प्राण हैं, वह देश में मतांतरण के नाम पर चल रहे कथित काले बाजार के खिलाफ आवाज उठाते रहेंगे। शास्त्री ने लोगों से अपील की कि वे अपने धर्म और परंपराओं को समझें, उनसे जुड़ें और आने वाली पीढ़ी को भी इनके बारे में बताएं। उनके मुताबिक किसी भी समाज की मजबूती उसके लोगों की जागरूकता और आपसी सहयोग से बढ़ती है।
दिव्य दरबार में सुनी गईं भक्तों की परेशानियां
कार्यक्रम की शुरुआत धार्मिक विधि-विधान के साथ हुई। पूजा-अर्चना, वैदिक मंत्रोच्चारण और आरती के बाद दिव्य दरबार शुरू किया गया। इस दौरान पंडित धीरेंद्र कृष्ण शास्त्री ने श्रद्धालुओं की ओर से प्रस्तुत की गई पर्चियों के आधार पर उनकी समस्याओं को सुना। उन्होंने भक्तों को भगवान बालाजी के प्रति विश्वास बनाए रखने और जीवन में सकारात्मक सोच के साथ आगे बढ़ने का संदेश दिया।
शास्त्री ने कहा कि दिव्य दरबार का उद्देश्य किसी तरह का चमत्कार प्रदर्शित करना नहीं है। उनके अनुसार इसका मुख्य मकसद लोगों को भगवान बालाजी की भक्ति से जोड़ना और उन्हें आध्यात्मिक रास्ते की ओर प्रेरित करना है। उन्होंने श्रद्धालुओं से अपने जीवन को प्रभु के चरणों में समर्पित करने का संकल्प भी कराया।
भक्तों का उत्साह बढ़ाते हुए उन्होंने कहा कि जब बहुत से लोगों के जीवन में परेशानियों के बीच रास्ता निकला है तो अन्य लोगों के लिए भी उम्मीद बनी रहनी चाहिए। उन्होंने कहा कि व्यक्ति को कठिन परिस्थितियों में घबराने के बजाय ईश्वर पर भरोसा रखते हुए अपने कर्म करते रहना चाहिए।
विरोध और आलोचना पर भी बोले शास्त्री
दिव्य दरबार के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने उन संस्थाओं और लोगों का भी जिक्र किया जो उनके कार्यक्रमों को लेकर सवाल उठाते या आलोचना करते हैं। उन्होंने कहा कि उनके कार्यक्रम का उद्देश्य लोगों को भ्रमित करना नहीं बल्कि उन्हें आध्यात्मिकता और भक्ति से जोड़ना है। उन्होंने विरोध करने वालों को भी अपने तरीके से जवाब दिया और कहा कि उनका ध्यान अपने उद्देश्य पर केंद्रित है।
उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि केवल धार्मिक कार्यक्रम में शामिल होना पर्याप्त नहीं है। व्यक्ति के व्यवहार में भी उसके संस्कार दिखाई देने चाहिए। उनके अनुसार यदि कोई व्यक्ति भगवान की भक्ति करता है लेकिन अपने आसपास के जरूरतमंद लोगों की मदद नहीं करता तो उसकी भक्ति अधूरी रह जाती है।
मंदिरों में भी बढ़े सेवा कार्यों पर जोर
धीरेंद्र शास्त्री ने अपने संबोधन में धार्मिक संस्थानों के साथ सामाजिक सेवा को जोड़ने की बात कही। उन्होंने गुरुद्वारों की सेवा परंपरा का उदाहरण देते हुए कहा कि मंदिरों को भी इसी तरह समाज के जरूरतमंद लोगों की सहायता के केंद्र के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
उन्होंने कहा कि मंदिरों में केवल पूजा-पाठ तक गतिविधियां सीमित नहीं रहनी चाहिए, बल्कि वहां अस्पताल, भोजन और अन्य जनसेवा से जुड़े कार्य भी होने चाहिए। उनका कहना था कि यदि धार्मिक संस्थाएं लोगों की मुश्किल घड़ी में उनके साथ खड़ी होती हैं तो इससे समाज में सेवा और सहयोग की भावना मजबूत होती है।
उन्होंने कहा कि श्रद्धालुओं को मंदिर में भगवान की भक्ति के साथ जरूरतमंदों की सेवा का अवसर भी मिलना चाहिए। उनके अनुसार यदि किसी व्यक्ति को एक स्थान पर आध्यात्मिक सहारा और चिकित्सा जैसी आवश्यक सुविधाएं मिल जाएं तो इससे समाज के कमजोर वर्ग को काफी मदद मिल सकती है।
अपने गांव का उदाहरण देकर बताई सेवा की अहमियत
पंडित धीरेंद्र शास्त्री ने सेवा की भावना को समझाने के लिए अपने जीवन से जुड़ा उदाहरण भी साझा किया। उन्होंने बताया कि जिस गांव में कभी वह भिक्षा मांगने जाया करते थे, आज उसी स्थान पर अन्नपूर्णा रसोई संचालित हो रही है। इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने कहा कि समय के साथ परिस्थितियां बदल सकती हैं और समाज के सहयोग से सेवा के कार्यों को आगे बढ़ाया जा सकता है।
उन्होंने लोगों से कहा कि धार्मिक आस्था को समाज के प्रति जिम्मेदारी से अलग करके नहीं देखा जाना चाहिए। मंदिरों और धार्मिक संस्थानों को ऐसे कार्यों में योगदान देना चाहिए जिनसे गरीब, बीमार और जरूरतमंद लोगों को राहत मिल सके।
गुरु और संत के महत्व पर भी रखी बात
कथा के दौरान धीरेंद्र शास्त्री ने गुरु और संत के महत्व पर भी विस्तार से बात की। उन्होंने कहा कि व्यक्ति के जीवन में किसी संत या गुरु का आगमन उसके विचारों और जीवनशैली में सकारात्मक बदलाव ला सकता है। उन्होंने संत की पहचान केवल बाहरी वेशभूषा से करने के बजाय उसके आचरण और व्यवहार को महत्वपूर्ण बताया।
शास्त्री ने कहा कि साधु या संत का वस्त्र पहन लेना ही संत होने का प्रमाण नहीं है। वास्तविक संतता व्यक्ति के आचरण, व्यवहार और दूसरों के प्रति उसके दृष्टिकोण में दिखाई देती है। उन्होंने श्रद्धालुओं को सलाह दी कि वे परमात्मा के चरणों में श्रद्धा और महात्माओं के अच्छे आचरण को अपने जीवन में अपनाने का प्रयास करें।
उन्होंने कहा कि मनुष्य को अपने जीवन में केवल धार्मिक बातों को सुनने तक सीमित नहीं रहना चाहिए, बल्कि उन्हें व्यवहार में उतारना चाहिए। उनके अनुसार किसी व्यक्ति की वास्तविक आध्यात्मिक प्रगति उसके जीवन में आने वाले बदलाव से दिखाई देती है।
भक्ति में मन लगाने का दिया संदेश
धीरेंद्र शास्त्री ने कथा के आध्यात्मिक पक्ष को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सफलता पाने के लिए व्यक्ति को केवल बाहरी दुनिया में लगातार तलाश करते रहने के बजाय अपने भीतर भी झांकना चाहिए। उन्होंने श्रद्धालुओं को प्रभु की भक्ति में मन लगाने और अहंकार से दूर रहने की सीख दी।
उन्होंने कहा कि जब व्यक्ति का मन भगवान की भक्ति में रम जाता है तो उसके भीतर धैर्य और सकारात्मकता पैदा होती है। कठिन समय में भी उसे आगे बढ़ने की प्रेरणा मिलती है। उन्होंने भक्तों से कहा कि वे अपने जीवन में नियमित रूप से ईश्वर का स्मरण करें और अच्छे कर्मों को महत्व दें।
कार्यक्रम के दौरान श्रद्धालुओं में खासा उत्साह दिखाई दिया। भक्तों ने कथा और दिव्य दरबार में भाग लेकर धार्मिक कार्यक्रम का हिस्सा बने। धीरेंद्र शास्त्री ने लोगों को अपने परिवार और समाज में सकारात्मक वातावरण बनाने, जरूरतमंदों की सहायता करने तथा अपनी धार्मिक परंपराओं से जुड़े रहने का संदेश दिया।
लुधियाना में आयोजित इस कथा के दौरान जहां धार्मिक और आध्यात्मिक विषयों पर चर्चा हुई, वहीं सामाजिक जिम्मेदारी और सेवा को भी प्रमुखता दी गई। धीरेंद्र शास्त्री के संबोधन में एक ओर मतांतरण को लेकर उनकी चिंता सामने आई, तो दूसरी ओर उन्होंने मंदिरों को सेवा गतिविधियों से जोड़ने और लोगों को जरूरतमंदों की मदद के लिए आगे आने का आह्वान किया। उन्होंने श्रद्धालुओं से कहा कि भक्ति केवल व्यक्तिगत आस्था तक सीमित न रहे, बल्कि उसके माध्यम से समाज में सेवा, सहयोग और सद्भाव की भावना भी मजबूत हो।