पाकिस्तान के अशांत प्रांत बलूचिस्तान में बीते चार दिनों के दौरान हिंसा ने एक बार फिर गंभीर रूप ले लिया है। पाकिस्तानी सेना के मुताबिक अलग-अलग स्थानों पर हुए तीन बड़े हमलों में कुल 38 सुरक्षाकर्मियों और चार नागरिकों की जान चली गई। सेना ने इन घटनाओं को हाल के समय की सबसे बड़ी आतंकी चुनौतियों में से एक बताया है। इसके साथ ही सुरक्षा बलों ने जवाबी कार्रवाई में 54 से अधिक विद्रोहियों को मार गिराने का दावा भी किया है। हालांकि इन दावों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।
इन घटनाओं के बाद पाकिस्तान की सेना ने बिना कोई सार्वजनिक सबूत पेश किए भारत पर आरोप लगाए हैं। इसके अलावा अफगानिस्तान की सीमा से संचालित आतंकी गतिविधियों का भी हवाला देते हुए तालिबान प्रशासन पर चरमपंथी संगठनों को शरण देने का आरोप लगाया गया है। भारत और अफगान तालिबान पहले भी ऐसे आरोपों को निराधार बताते रहे हैं।
सुरक्षा एजेंसियों के सामने बढ़ी चुनौती
बलूचिस्तान लंबे समय से पाकिस्तान के लिए सबसे संवेदनशील क्षेत्रों में गिना जाता है। प्राकृतिक संसाधनों से समृद्ध होने के बावजूद यह प्रांत लगातार हिंसा, अलगाववादी गतिविधियों और आतंकी हमलों से जूझ रहा है। यहां बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) समेत कई संगठन सक्रिय हैं, जबकि तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (TTP) भी विभिन्न इलाकों में अपनी मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश करता रहा है।
विशेषज्ञों का मानना है कि लगातार बढ़ते हमले पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं। हाल के दिनों में जिस तरह सुरक्षाबलों को निशाना बनाया गया है, उससे सुरक्षा एजेंसियों की रणनीति पर भी चर्चा तेज हो गई है।
सेना ने प्रेस कॉन्फ्रेंस में दी जानकारी
पाकिस्तानी सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट जनरल अहमद शरीफ चौधरी ने मीडिया को संबोधित करते हुए बताया कि तीन अलग-अलग अभियानों में कुल 42 लोगों की मौत हुई है। इनमें चार नागरिक और 38 पुलिस एवं सैन्यकर्मी शामिल हैं। उन्होंने कहा कि सुरक्षाबलों ने जवाबी कार्रवाई के दौरान बड़ी संख्या में हमलावरों को भी मार गिराया है और कई इलाकों में अभियान अभी भी जारी है।
उनके अनुसार सेना और पुलिस ने समन्वित अभियान चलाकर कई आतंकियों को ढेर किया, लेकिन कुछ क्षेत्रों में अभी भी तलाशी और मुठभेड़ की कार्रवाई जारी है।
पहला हमला क्वेटा के पास
सेना के अनुसार घटनाओं की शुरुआत 4 और 5 जुलाई की रात क्वेटा के नजदीक हन्ना उराक घाटी से हुई। पाकिस्तानी अधिकारियों का कहना है कि यहां टीटीपी से जुड़े लड़ाकों ने स्थानीय ग्रामीणों को निशाना बनाया। इस हमले में चार नागरिकों की मौत हो गई, जबकि छह अन्य घायल हो गए।
हमले के बाद पूरे इलाके में सुरक्षा बलों ने घेराबंदी कर तलाशी अभियान शुरू किया। अधिकारियों का कहना है कि कई संदिग्ध ठिकानों की पहचान कर वहां कार्रवाई की गई।
मांगी बांध पुलिस चौकी पर हमला
दूसरी बड़ी घटना 6 जुलाई को बलूचिस्तान के जियारत जिले में स्थित मांगी बांध के पास हुई। सेना के अनुसार टीटीपी के हथियारबंद सदस्यों ने पुलिस चौकी पर हमला बोल दिया। शुरुआती हमले में नौ पुलिसकर्मी मारे गए।
पाकिस्तानी सेना का दावा है कि जवाबी कार्रवाई में 15 आतंकियों को मार गिराया गया। हालांकि इसी दौरान हमलावर लगभग 18 पुलिसकर्मियों को बंधक बनाकर ले गए। सेना का कहना है कि सुरक्षा बल जब तक वहां पहुंचते, तब तक सभी बंधक पुलिसकर्मियों की हत्या की जा चुकी थी।
इसके बाद शुरू हुए ऑपरेशन के दौरान 11 और विद्रोहियों के मारे जाने का दावा किया गया। इस घटना ने पाकिस्तान की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर नई बहस छेड़ दी है।
बेला और विंडर में सेना के काफिले पर हमला
तीसरा बड़ा हमला बुधवार को बलूचिस्तान के बेला और विंडर क्षेत्रों में हुआ। पाकिस्तानी सेना के मुताबिक प्रतिबंधित बलूच लिबरेशन आर्मी (BLA) के सदस्यों ने सेना के काफिले को निशाना बनाया।
मुठभेड़ के दौरान 11 सैनिकों की मौत हुई, जबकि सेना ने 14 हमलावरों को मार गिराने का दावा किया। इसके अलावा सुरक्षा बलों ने अलग-अलग अभियानों में खारान में छह और दलबंदिन क्षेत्र में आठ टीटीपी चरमपंथियों को भी ढेर करने की बात कही है।
सेना के अनुसार पूरे क्षेत्र में अतिरिक्त बल तैनात कर दिए गए हैं और संभावित हमलों को रोकने के लिए तलाशी अभियान लगातार जारी है।
भारत और अफगानिस्तान पर फिर लगाए आरोप
प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान सेना के प्रवक्ता ने कहा कि पाकिस्तान के खिलाफ काम करने वाली “विदेशी ताकतें” इन संगठनों को समर्थन दे रही हैं। उन्होंने दावा किया कि चरमपंथी संगठन अफगानिस्तान के उन इलाकों का इस्तेमाल कर रहे हैं जो तालिबान प्रशासन के नियंत्रण में हैं।
साथ ही उन्होंने भारत पर भी इन समूहों को बढ़ावा देने का आरोप लगाया। हालांकि पाकिस्तान की ओर से इन आरोपों के समर्थन में कोई सार्वजनिक प्रमाण पेश नहीं किया गया। भारत पहले भी कई बार स्पष्ट कर चुका है कि वह पाकिस्तान के ऐसे आरोपों को पूरी तरह खारिज करता है और उन्हें आधारहीन मानता है।
दूसरी ओर अफगान तालिबान प्रशासन भी पहले यह कह चुका है कि पाकिस्तान को अपनी आंतरिक सुरक्षा कमजोरियों का समाधान स्वयं करना चाहिए और हर घटना के लिए बाहरी देशों को जिम्मेदार ठहराना उचित नहीं है।
बलूचिस्तान क्यों बना हुआ है संघर्ष का केंद्र
बलूचिस्तान पाकिस्तान का क्षेत्रफल के हिसाब से सबसे बड़ा प्रांत है, लेकिन आबादी अपेक्षाकृत कम है। यह इलाका अफगानिस्तान और ईरान की सीमाओं से जुड़ा होने के कारण सामरिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है। लंबे समय से यहां अलगाववादी आंदोलन सक्रिय हैं, जो राजनीतिक अधिकारों, संसाधनों पर स्थानीय नियंत्रण और अधिक स्वायत्तता की मांग करते रहे हैं।
पाकिस्तानी सरकार इन संगठनों को आतंकी संगठन मानती है और उनके खिलाफ लगातार सैन्य अभियान चलाती रही है। वहीं अलगाववादी संगठन दावा करते हैं कि वे अपने अधिकारों और संसाधनों की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहे हैं। इसी कारण यह इलाका वर्षों से हिंसा और सुरक्षा अभियानों का केंद्र बना हुआ है।
लगातार बढ़ती हिंसा से चिंता
हाल के दिनों में बलूचिस्तान और खैबर पख्तूनख्वा में सुरक्षाबलों पर हमलों की घटनाओं में लगातार वृद्धि दर्ज की गई है। सुरक्षा विशेषज्ञों का कहना है कि यदि इन हमलों का सिलसिला इसी तरह जारी रहा तो पाकिस्तान की आंतरिक सुरक्षा के लिए नई चुनौतियां खड़ी हो सकती हैं।
फिलहाल पाकिस्तानी सेना पूरे क्षेत्र में व्यापक अभियान चला रही है। कई इलाकों में अतिरिक्त सुरक्षा बल तैनात किए गए हैं और संदिग्ध ठिकानों पर लगातार कार्रवाई जारी है। दूसरी ओर भारत और अफगानिस्तान पर लगाए गए आरोपों को लेकर क्षेत्रीय स्तर पर राजनीतिक बहस भी तेज हो गई है। आने वाले दिनों में इन घटनाओं के बाद पाकिस्तान की सुरक्षा नीति और सीमा प्रबंधन को लेकर नए फैसले लिए जाने की संभावना जताई जा रही है।