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मोदी-पुतिन की कार सवारी ने फिर खींचा ध्यान, जानिए क्या है ‘कार डिप्लोमेसी’ और क्यों खास है दोनों नेताओं का साथ सफर

भारत और रूस के रिश्तों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दोस्ती का अपना एक अलग महत्व है। दोनों नेताओं की मुलाकात जब भी होती है, तो उस पर दुनिया की नजर रहती है। हालांकि, कई बार बड़े कूटनीतिक संदेश किसी औपचारिक बैठक या लंबे भाषण से नहीं, बल्कि एक छोटी-सी तस्वीर से सामने आते हैं। ऐसी ही एक तस्वीर ने दिल्ली में दोनों नेताओं की मुलाकात के बाद चर्चा बटोरी, जब प्रधानमंत्री मोदी और रूसी राष्ट्रपति पुतिन एक बार फिर एक ही कार में सफर करते नजर आए।

दोनों नेताओं का इस तरह साथ बैठना महज एक यात्रा नहीं माना जा रहा है। अंतरराष्ट्रीय कूटनीति में शीर्ष नेताओं का एक ही वाहन में सफर करना आपसी सहजता, व्यक्तिगत तालमेल और भरोसे का संकेत माना जाता है। यही वजह है कि मोदी और पुतिन की कार राइड को लेकर ‘कार डिप्लोमेसी’ शब्द फिर चर्चा में आ गया है।

दिलचस्प बात यह है कि प्रधानमंत्री मोदी और पुतिन की यह साथ कार यात्रा महज 12 दिनों के अंतराल में दूसरी बार हुई। इससे पहले दोनों नेता 31 अगस्त को किर्गिस्तान की राजधानी बिश्केक में भी एक साथ कार में सफर करते दिखाई दिए थे। यानी कम समय के भीतर दोनों नेताओं की दूसरी साझा कार राइड ने इस तस्वीर को और खास बना दिया।

दिल्ली में बैठक के बाद एक ही कार से प्रदर्शनी पहुंचे मोदी-पुतिन

शुक्रवार को दिल्ली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन के बीच द्विपक्षीय मुलाकात हुई। दोनों देशों के बीच संबंधों, सहयोग और आपसी हितों से जुड़े मुद्दों पर बातचीत के बाद दोनों नेता एक ही कार में सवार होकर इनोप्रोम प्रदर्शनी तक गए।

इस दौरान जिस वाहन ने सबसे ज्यादा ध्यान आकर्षित किया, वह कोई सामान्य सरकारी गाड़ी नहीं थी। यह रूसी राष्ट्रपति पुतिन की खास बख्तरबंद लिमोजिन ‘ऑरस सीनेट’ थी। इस कार को रूस के राष्ट्रपति की सुरक्षा और आधिकारिक यात्राओं के लिए तैयार किया गया है। इसका डिजाइन, सुरक्षा इंतजाम और भारी-भरकम बनावट इसे दुनिया की चर्चित सरकारी कारों में शामिल करते हैं।

मोदी और पुतिन का इस कार में साथ बैठना इसलिए भी महत्वपूर्ण माना गया, क्योंकि दोनों नेताओं के बीच लंबे समय से व्यक्तिगत संपर्क और राजनीतिक संवाद रहा है। अंतरराष्ट्रीय मंच पर जब दो देशों के प्रमुख एक साथ यात्रा करते हैं, तो उस दौरान उनकी बॉडी लैंग्वेज, बातचीत और सहजता भी लोगों का ध्यान खींचती है।

दिल्ली की इस यात्रा के बाद एक बार फिर सवाल उठने लगा कि आखिर प्रधानमंत्री मोदी की विदेशी नेताओं के साथ कार में बैठकर यात्रा करने की परंपरा कितनी पुरानी है और इसे कूटनीतिक नजरिए से इतना खास क्यों माना जाता है?

12 दिन पहले भी साथ नजर आए थे दोनों नेता

मोदी-पुतिन की ताजा कार राइड को समझने के लिए 31 अगस्त की घटना पर नजर डालना जरूरी है। इससे करीब 12 दिन पहले दोनों नेता किर्गिस्तान के बिश्केक में एक साथ कार में सफर करते हुए दिखाई दिए थे। दोनों की यह तस्वीर सामने आने के बाद भी कार डिप्लोमेसी को लेकर चर्चा हुई थी।

आमतौर पर किसी देश के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति की यात्रा के दौरान सुरक्षा प्रोटोकॉल काफी सख्त होते हैं। अलग-अलग देशों के नेता अपने-अपने सुरक्षा वाहनों में चलते हैं और कार्यक्रमों के बीच उनकी आवाजाही भी तय व्यवस्था के अनुसार होती है। ऐसे में जब दो शीर्ष नेता एक ही वाहन में यात्रा करते हैं, तो यह सामान्य प्रोटोकॉल से अलग नजर आने वाला दृश्य बन जाता है।

मोदी और पुतिन की लगातार दूसरी साझा कार राइड को दोनों नेताओं के बीच सहज संबंधों के संदर्भ में देखा जा रहा है। हालांकि, किसी कार यात्रा के आधार पर दोनों नेताओं की निजी बातचीत या उसके दौरान लिए गए फैसलों के बारे में अनुमान लगाना सही नहीं होगा। फिर भी कूटनीतिक दुनिया में इस तरह की तस्वीरों का अपना प्रतीकात्मक महत्व होता है।

मोदी की कार डिप्लोमेसी का सिलसिला नया नहीं

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के कार्यकाल में कई ऐसे मौके आए हैं, जब वह विदेशी राष्ट्राध्यक्षों के साथ एक ही कार में सफर करते दिखाई दिए। 2014 में प्रधानमंत्री बनने के बाद से मोदी कई विश्व नेताओं के साथ कार राइड कर चुके हैं। इनमें अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा, फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों समेत कई प्रमुख नाम शामिल हैं।

अब तक ऐसी करीब 11 कार राइड का जिक्र किया जाता है, जिनमें प्रधानमंत्री मोदी अलग-अलग देशों के शीर्ष नेताओं के साथ वाहन में बैठे। इन यात्राओं को अक्सर भारत के अंतरराष्ट्रीय संबंधों और नेताओं के बीच व्यक्तिगत तालमेल की तस्वीर के तौर पर देखा गया।

यहां यह समझना जरूरी है कि हर कार यात्रा का संदेश एक जैसा नहीं होता। किसी मौके पर यह सुरक्षा व्यवस्था का हिस्सा हो सकती है, तो किसी अवसर पर कार्यक्रम स्थल तक पहुंचने का सुविधाजनक तरीका। लेकिन जब दो बड़े देशों के नेता सार्वजनिक रूप से एक साथ कार में नजर आते हैं, तो तस्वीर राजनीतिक और कूटनीतिक चर्चा का विषय जरूर बन जाती है।

मोदी के कार्यकाल में ऐसी तस्वीरों ने कई बार सुर्खियां बटोरी हैं। इनका असर सिर्फ भारत की राजनीति तक सीमित नहीं रहता, बल्कि विदेशी मीडिया और अंतरराष्ट्रीय विश्लेषकों का ध्यान भी इस ओर जाता है कि दुनिया के प्रमुख नेताओं के बीच संबंध किस तरह विकसित हो रहे हैं।

ओबामा से मैक्रों तक, इन नेताओं के साथ कार में बैठे मोदी

प्रधानमंत्री मोदी और विदेशी नेताओं की कार यात्राओं की बात करें, तो अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति बराक ओबामा के साथ उनकी कार राइड काफी चर्चित रही है। दोनों नेताओं के बीच भारत-अमेरिका संबंधों को मजबूत करने पर लगातार जोर दिया गया। ऐसे में साथ कार में बैठना दोनों देशों के शीर्ष नेतृत्व के बीच संवाद और सहजता का प्रतीक माना गया।

फ्रांस के राष्ट्रपति इमैनुएल मैक्रों के साथ भी प्रधानमंत्री मोदी की कार यात्रा चर्चा में रही है। भारत और फ्रांस के बीच रणनीतिक साझेदारी, रक्षा सहयोग और वैश्विक मुद्दों पर संवाद लंबे समय से महत्वपूर्ण रहा है। दोनों नेताओं की साथ तस्वीरों ने इस रिश्ते की गर्मजोशी को दिखाने का काम किया।

इसी तरह प्रधानमंत्री मोदी अन्य कई देशों के नेताओं के साथ भी साझा वाहन में सफर करते नजर आ चुके हैं। इन यात्राओं की परिस्थितियां अलग-अलग रही हैं, लेकिन इन सभी में एक बात समान रही कि दो शीर्ष नेता औपचारिक मंच से बाहर अपेक्षाकृत सहज माहौल में साथ दिखाई दिए।

यही वजह है कि मोदी-पुतिन की ताजा कार राइड को भी सिर्फ एक यात्रा के रूप में नहीं देखा जा रहा। दोनों देशों के बीच लंबे समय से चले आ रहे राजनीतिक और रणनीतिक संबंधों के संदर्भ में इस तस्वीर का महत्व बढ़ जाता है।

पुतिन की ‘ऑरस सीनेट’ क्यों है इतनी खास?

अब बात उस कार की, जिसमें प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन ने सफर किया। यह कार है रूस की लग्जरी और सुरक्षा से लैस लिमोजिन ‘ऑरस सीनेट’। इसे रूसी राष्ट्रपति की आधिकारिक कार के तौर पर जाना जाता है। दिखने में यह एक शानदार लग्जरी कार है, लेकिन इसके अंदर सुरक्षा के लिए कई विशेष इंतजाम किए गए हैं।

रिपोर्ट के मुताबिक, पुतिन की यह बख्तरबंद कार करीब 7 टन वजनी है। इतनी भारी कार का निर्माण सामान्य लग्जरी वाहनों से काफी अलग होता है। इसमें यात्रियों की सुरक्षा को प्राथमिकता दी जाती है और वाहन की संरचना को इस तरह तैयार किया जाता है कि वह गंभीर खतरों से बचाव कर सके।

ऑरस सीनेट की सबसे चर्चित खूबियों में इसका भारी-भरकम दरवाजा भी शामिल है। बताया जाता है कि कार के एक दरवाजे का वजन करीब 900 किलोग्राम तक है। इतना भारी दरवाजा सामान्य तरीके से खोलना मुश्किल होगा, इसलिए इसमें हाइड्रोलिक सिस्टम का इस्तेमाल किया जाता है।

इस तरह के फीचर्स से अंदाजा लगाया जा सकता है कि यह कार सिर्फ दिखावे या आराम के लिए नहीं बनाई गई। इसके पीछे सुरक्षा, तकनीक और राष्ट्रपति की आधिकारिक जरूरतों को ध्यान में रखकर की गई इंजीनियरिंग है।

250 किमी प्रति घंटे की रफ्तार, अमेरिकी ‘द बीस्ट’ से तुलना

ऑरस सीनेट की एक और खासियत इसकी बताई जाने वाली टॉप स्पीड है। उपलब्ध जानकारी के मुताबिक, यह कार करीब 250 किलोमीटर प्रति घंटे की रफ्तार से दौड़ सकती है। बख्तरबंद कारों के मामले में इतनी तेज रफ्तार काफी महत्वपूर्ण मानी जाती है, क्योंकि भारी सुरक्षा उपकरणों के बावजूद वाहन को जरूरत पड़ने पर तेजी से आगे बढ़ना होता है।

इसी वजह से इसकी तुलना अमेरिका के राष्ट्रपति की आधिकारिक कार ‘द बीस्ट’ से भी की जाती है। अमेरिकी राष्ट्रपति की कार को दुनिया की सबसे सुरक्षित सरकारी कारों में गिना जाता है। इसकी टॉप स्पीड करीब 112 किलोमीटर प्रति घंटे बताई जाती है।

इस तुलना में ऑरस सीनेट की बताई गई गति ‘द बीस्ट’ से काफी ज्यादा नजर आती है। हालांकि, किसी भी राष्ट्रपति की कार की सुरक्षा का आकलन केवल उसकी रफ्तार से नहीं किया जा सकता। बुलेट प्रूफ सुरक्षा, विस्फोट से बचाव, संचार व्यवस्था और अन्य तकनीकी सुविधाएं भी उतनी ही महत्वपूर्ण होती हैं।

ऑरस सीनेट को पूरी तरह बुलेट और ब्लास्ट प्रूफ वाहन के रूप में पेश किया जाता है। इसका उद्देश्य राष्ट्रपति को यात्रा के दौरान संभावित खतरों से सुरक्षित रखना है। ऐसी कारों में सुरक्षा से जुड़े कई इंतजाम सार्वजनिक तौर पर पूरी तरह उपलब्ध नहीं होते, क्योंकि उनमें से कुछ जानकारी गोपनीय भी रखी जाती है।

क्या है ‘कार डिप्लोमेसी’, जिसे लेकर इतनी चर्चा होती है?

कार डिप्लोमेसी का मतलब आसान भाषा में समझें, तो यह तब होती है जब दो देशों के शीर्ष नेता किसी औपचारिक कार्यक्रम के दौरान एक ही कार में साथ सफर करते हैं। आमतौर पर राष्ट्राध्यक्षों की यात्राएं सुरक्षा और प्रोटोकॉल के अनुसार तय होती हैं। लेकिन जब दो नेता एक ही वाहन में बैठते हैं, तो यह दृश्य अपने आप में अलग नजर आता है।

कूटनीतिक नजरिए से कार डिप्लोमेसी को नेताओं के बीच व्यक्तिगत सहजता, भरोसे और दोस्ताना संबंधों के प्रतीक के रूप में देखा जाता है। इसका मतलब यह नहीं कि हर साझा कार यात्रा के पीछे कोई गुप्त समझौता या बड़ा राजनीतिक फैसला होता है। कई बार यह केवल कार्यक्रम की व्यवस्था भी हो सकती है।

फिर भी, जब दुनिया के दो बड़े देशों के नेता एक साथ कार में बैठते हैं, तो इसका प्रतीकात्मक प्रभाव जरूर पड़ता है। यह तस्वीर लोगों को बताती है कि दोनों नेता सार्वजनिक मंच की औपचारिकता से बाहर भी एक साथ समय बिताने में सहज हैं।

कार डिप्लोमेसी को इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि किसी औपचारिक बैठक में दोनों नेता अपने-अपने प्रतिनिधिमंडल के साथ बैठते हैं। लेकिन कार में सफर के दौरान माहौल अपेक्षाकृत कम औपचारिक हो सकता है। हालांकि, उस दौरान क्या बातचीत हुई, इसकी पुष्टि तस्वीर से नहीं की जा सकती।

भारत-रूस रिश्तों के संदर्भ में क्यों अहम है यह तस्वीर?

भारत और रूस के बीच संबंध कई दशकों पुराने हैं। रक्षा, ऊर्जा, व्यापार और रणनीतिक सहयोग जैसे क्षेत्रों में दोनों देशों के बीच लगातार संवाद रहा है। प्रधानमंत्री मोदी और राष्ट्रपति पुतिन के बीच भी कई वर्षों से व्यक्तिगत स्तर पर मुलाकातें होती रही हैं।

ऐसे में दोनों नेताओं की साझा कार राइड को भारत-रूस संबंधों की गर्मजोशी के संदर्भ में देखा जा रहा है। यह तस्वीर दोनों नेताओं के बीच संवाद की सहजता को सामने लाती है और लोगों का ध्यान खींचती है।

हालांकि, किसी भी अंतरराष्ट्रीय रिश्ते की मजबूती का आकलन केवल कार यात्रा या तस्वीरों से नहीं किया जा सकता। इसके लिए व्यापारिक आंकड़े, रणनीतिक फैसले, समझौते और दोनों देशों की नीतियों को देखना जरूरी होता है। फिर भी कूटनीति में प्रतीकात्मक इशारों की भूमिका कम नहीं होती।

मोदी-पुतिन की यह कार राइड भी इसी वजह से चर्चा में है। 12 दिनों के भीतर दोनों नेताओं का दूसरी बार साथ वाहन में नजर आना, पुतिन की खास ऑरस सीनेट और कार डिप्लोमेसी का पहलू—इन सभी ने इस छोटे से दृश्य को अंतरराष्ट्रीय चर्चा का विषय बना दिया है।

तस्वीर छोटी, संदेश बड़ा

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और रूसी राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की दिल्ली में साथ कार यात्रा ने एक बार फिर दिखाया कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में छोटी-सी तस्वीर भी बड़ी चर्चा पैदा कर सकती है। दोनों नेताओं का एक ही वाहन में बैठना, वह भी पुतिन की खास बख्तरबंद ऑरस सीनेट में, लोगों के लिए आकर्षण का केंद्र बना।

इससे पहले 31 अगस्त को बिश्केक में हुई साझा कार राइड ने भी ध्यान खींचा था। अब दिल्ली में दोबारा ऐसा दृश्य सामने आने के बाद कार डिप्लोमेसी का विषय फिर चर्चा में है।

प्रधानमंत्री मोदी 2014 के बाद से कई विश्व नेताओं के साथ ऐसी यात्राएं कर चुके हैं। ओबामा और मैक्रों जैसे नेताओं के साथ उनकी कार राइड के उदाहरण दिए जाते हैं। वहीं पुतिन की ऑरस सीनेट अपनी सुरक्षा, वजन और तकनीकी खूबियों के कारण खुद में खास है।

कुल मिलाकर, मोदी-पुतिन की कार राइड को भारत-रूस संबंधों की सहजता और दोनों नेताओं के व्यक्तिगत तालमेल के प्रतीक के रूप में देखा जा रहा है। हालांकि, इसके वास्तविक कूटनीतिक संदेश को समझने के लिए तस्वीर के साथ-साथ दोनों देशों के बीच होने वाली बातचीत और फैसलों पर भी नजर रखना जरूरी होगा।