Skip to main content

The Scoopp

 

NATO समिट में ट्रंप का सहयोगियों पर बड़ा हमला, बोले- ईरान संकट ने बता दिया कौन है अमेरिका का असली साथी

ईरान को लेकर बढ़ते तनाव के बीच अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने NATO सहयोगी देशों पर तीखी नाराजगी जताई है। तुर्किये की राजधानी अंकारा में आयोजित NATO शिखर सम्मेलन में पहुंचने के बाद ट्रंप ने कहा कि हालिया संकट के दौरान कई सहयोगी देशों ने अमेरिका का अपेक्षित साथ नहीं दिया। उनके मुताबिक इस पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया कि मुश्किल वक्त में कौन-से देश वास्तव में अमेरिका के साथ खड़े रहते हैं और कौन पीछे हट जाते हैं।

ट्रंप ने पत्रकारों से बातचीत में कहा कि अमेरिका को इस अभियान के दौरान किसी सैन्य सहायता की आवश्यकता नहीं थी, लेकिन वह यह जरूर देखना चाहते थे कि सहयोगी देशों का रवैया क्या रहता है। उन्होंने दावा किया कि उन्होंने जानबूझकर स्थिति पर नजर रखी ताकि यह समझ सकें कि NATO की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था व्यवहारिक रूप से कितनी मजबूत है। ट्रंप ने कहा कि वर्षों से अमेरिका अपने सहयोगी देशों की सुरक्षा सुनिश्चित करता आया है, लेकिन जब अमेरिका पर चुनौती आती है तो कई देश पीछे हट जाते हैं।

राष्ट्रपति ट्रंप ने कहा कि ईरान के खिलाफ कार्रवाई के दौरान कुछ NATO सदस्य देशों ने अपने सैन्य अड्डों का इस्तेमाल करने की अनुमति नहीं दी। इतना ही नहीं, रणनीतिक दृष्टि से बेहद महत्वपूर्ण होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा को लेकर भी कई सहयोगी देशों ने सैन्य सहयोग देने से इनकार कर दिया। ट्रंप ने कहा कि ऐसे फैसलों ने NATO की एकजुटता और गठबंधन की वास्तविक प्रतिबद्धता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

उन्होंने कहा कि अगर किसी सैन्य गठबंधन का उद्देश्य केवल शांति के समय साथ खड़ा होना है और संकट के समय सदस्य देश अलग-अलग रास्ता चुनते हैं, तो फिर उस गठबंधन की उपयोगिता पर चर्चा होना स्वाभाविक है। ट्रंप के अनुसार, इस पूरे घटनाक्रम ने उनके पुराने संदेहों को और मजबूत किया है कि अमेरिका पर गठबंधन का बोझ अधिक है जबकि बदले में समान स्तर का सहयोग नहीं मिलता।

अंकारा में तुर्किये के राष्ट्रपति रेचेप तैयप एर्दोआन के साथ मुलाकात के दौरान भी ट्रंप ने इस मुद्दे को उठाया। उन्होंने कहा कि तुर्किये ने क्षेत्रीय हालात को समझते हुए संतुलित रुख अपनाया और तनाव कम करने के प्रयास किए। ट्रंप ने एर्दोआन की सराहना करते हुए कहा कि तुर्किये के पास मजबूत सैन्य क्षमता होने के बावजूद उसने सीधे युद्ध में शामिल होने के बजाय जिम्मेदार रवैया अपनाया, जिसकी सराहना की जानी चाहिए।

ट्रंप ने कहा कि उनका उद्देश्य किसी नए युद्ध को बढ़ावा देना नहीं है, बल्कि क्षेत्र में स्थिरता बनाए रखना है। उन्होंने यह भी दावा किया कि तुर्किये और अमेरिका दोनों इस बात पर सहमत हैं कि ईरान को परमाणु हथियार हासिल नहीं करने दिए जाने चाहिए। उनके अनुसार, इस मुद्दे पर दोनों देशों की सोच काफी हद तक समान है।

अमेरिकी राष्ट्रपति ने इटली की प्रधानमंत्री जॉर्जिया मेलोनी का भी नाम लेते हुए उनकी आलोचना की। ट्रंप ने कहा कि ईरान से जुड़े अमेरिकी अभियान और होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा के मामले में इटली का सहयोग उम्मीद के मुताबिक नहीं रहा। हालांकि उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि उनके व्यक्तिगत संबंध मेलोनी के साथ अच्छे हैं और वह उन्हें एक अच्छी नेता मानते हैं, लेकिन इस विशेष मामले में उनका फैसला सही नहीं था।

ट्रंप ने कहा कि यूरोप की अर्थव्यवस्था खाड़ी क्षेत्र से आने वाले तेल पर काफी हद तक निर्भर है। इसके विपरीत अमेरिका ऊर्जा संसाधनों के मामले में काफी आत्मनिर्भर है। ऐसे में अमेरिका यदि होर्मुज स्ट्रेट की सुरक्षा के लिए कदम उठाता है तो उसका उद्देश्य केवल अपने हितों की रक्षा करना नहीं, बल्कि वैश्विक ऊर्जा आपूर्ति और अंतरराष्ट्रीय स्थिरता बनाए रखना भी होता है। उन्होंने कहा कि जिन देशों को इस मार्ग से सबसे अधिक लाभ मिलता है, उन्हें भी समान जिम्मेदारी निभानी चाहिए।

राष्ट्रपति ट्रंप ने दोहराया कि अमेरिका ने वर्षों तक NATO देशों की सुरक्षा पर भारी खर्च किया है। उन्होंने कहा कि अमेरिकी करदाताओं के पैसे से यूरोप की सुरक्षा मजबूत की गई, लेकिन जब अमेरिका ने सहयोग की उम्मीद की तो कई देशों का रवैया निराशाजनक रहा। उन्होंने कहा कि यह स्थिति भविष्य में NATO की भूमिका और सदस्य देशों की जिम्मेदारियों पर नई बहस को जन्म दे सकती है।

ट्रंप ने यह भी कहा कि ईरान के खिलाफ अमेरिकी कार्रवाई को पारंपरिक युद्ध कहना सही नहीं होगा। उनके अनुसार यह अभियान केवल ईरान की परमाणु क्षमताओं को कमजोर करने के उद्देश्य से चलाया गया है। उन्होंने कहा कि अमेरिका किसी लंबे सैन्य संघर्ष में शामिल होने का इच्छुक नहीं है, बल्कि उसका मकसद यह सुनिश्चित करना है कि ईरान परमाणु हथियार विकसित न कर सके।

उन्होंने यह भी दावा किया कि इस अभियान का लक्ष्य किसी देश पर कब्जा करना या शासन परिवर्तन कराना नहीं था। ट्रंप ने कहा कि यदि क्षेत्र में परमाणु हथियारों की होड़ बढ़ती है तो उसका असर केवल मध्य पूर्व तक सीमित नहीं रहेगा बल्कि पूरी दुनिया की सुरक्षा प्रभावित होगी। इसलिए अमेरिका इस मुद्दे को वैश्विक सुरक्षा से जुड़ा विषय मानता है।

ईरान संकट को लेकर ट्रंप पहले भी कई यूरोपीय नेताओं की आलोचना कर चुके हैं। उन्होंने हाल के दिनों में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री कीर स्टार्मर के नेतृत्व पर सवाल उठाए थे और कहा था कि संकट की घड़ी में मजबूत नेतृत्व की जरूरत होती है। इसके अलावा उन्होंने सोशल मीडिया के जरिए भी कई यूरोपीय नेताओं पर निशाना साधा था, जिससे ट्रांस-अटलांटिक संबंधों को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई थीं।

NATO महासचिव मार्क रुटे ने गठबंधन के भीतर एकजुटता बनाए रखने की कोशिश की, लेकिन ट्रंप के ताजा बयान से यह स्पष्ट हो गया कि सदस्य देशों के बीच मतभेद अभी भी बने हुए हैं। राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि ट्रंप लगातार NATO देशों पर रक्षा खर्च बढ़ाने और अमेरिका पर निर्भरता कम करने का दबाव बनाते रहे हैं। ईरान संकट ने इस बहस को एक बार फिर तेज कर दिया है।

अंकारा में आयोजित NATO शिखर सम्मेलन में मध्य पूर्व की सुरक्षा स्थिति, ईरान के साथ बढ़ता तनाव, ऊर्जा आपूर्ति की सुरक्षा, सामूहिक रक्षा व्यवस्था और सदस्य देशों के बीच समन्वय जैसे कई महत्वपूर्ण मुद्दों पर चर्चा होने की संभावना है। विशेषज्ञों का मानना है कि ट्रंप के बयान इन चर्चाओं को और अधिक संवेदनशील बना सकते हैं।

ट्रंप ने अंत में कहा कि अमेरिका अपने सहयोगियों के साथ मजबूत संबंध चाहता है, लेकिन यह संबंध केवल शब्दों तक सीमित नहीं होने चाहिए। उनके अनुसार किसी भी सैन्य गठबंधन की वास्तविक परीक्षा संकट के समय होती है और हालिया घटनाओं ने कई महत्वपूर्ण सवाल खड़े कर दिए हैं। उन्होंने संकेत दिया कि भविष्य में अमेरिका अपने सहयोगियों से अधिक स्पष्ट और ठोस समर्थन की अपेक्षा करेगा ताकि NATO की सामूहिक सुरक्षा व्यवस्था पहले से अधिक प्रभावी और विश्वसनीय बन सके।