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NTA बनने से पहले कैसे होता था मेडिकल एंट्रेंस एग्जाम? जानिए कितनी मजबूत थी प्रश्नपत्र सुरक्षा व्यवस्था

देश में मेडिकल कॉलेजों में प्रवेश के लिए होने वाली NEET परीक्षा हाल के वर्षों में कई बार विवादों के केंद्र में रही है। पेपर लीक और परीक्षा प्रक्रिया को लेकर उठे सवालों के बीच यह जानना दिलचस्प है कि NTA के अस्तित्व में आने से पहले मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं का संचालन किस तरह किया जाता था और प्रश्नपत्रों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित की जाती थी।

CBSE संभालता था पूरी परीक्षा प्रक्रिया

NTA की स्थापना से पहले मेडिकल प्रवेश परीक्षा आयोजित कराने की जिम्मेदारी केंद्रीय माध्यमिक शिक्षा बोर्ड (CBSE) के पास थी। उस समय ऑल इंडिया प्री-मेडिकल टेस्ट (AIPMT) देश की प्रमुख मेडिकल प्रवेश परीक्षा हुआ करती थी। प्रश्नपत्र तैयार करने, परीक्षा केंद्रों का संचालन, मूल्यांकन और परिणाम घोषित करने तक का पूरा काम CBSE ही देखता था। परीक्षा ऑफलाइन मोड में होती थी और उम्मीदवारों को OMR शीट पर उत्तर दर्ज करने होते थे।

एक परीक्षा नहीं, कई विकल्प थे छात्रों के सामने

आज जहां अधिकांश मेडिकल सीटों के लिए NEET ही एकमात्र रास्ता है, वहीं पहले स्थिति अलग थी। AIIMS, JIPMER और CMC वेल्लोर जैसे प्रतिष्ठित संस्थान अपनी अलग प्रवेश परीक्षाएं आयोजित करते थे। इसके अलावा कई राज्यों की अपनी मेडिकल प्रवेश परीक्षाएं भी होती थीं। नतीजतन छात्रों को विभिन्न संस्थानों में दाखिले के लिए कई शहरों में जाकर अलग-अलग परीक्षाएं देनी पड़ती थीं।

प्रश्नपत्रों की सुरक्षा पर रहता था खास फोकस

परीक्षा की गोपनीयता बनाए रखने के लिए सख्त सुरक्षा प्रबंध किए जाते थे। प्रश्नपत्रों की छपाई सीमित और अत्यधिक सुरक्षित प्रिंटिंग इकाइयों में होती थी। छपाई के बाद पेपर सीधे परीक्षा केंद्रों तक नहीं भेजे जाते थे, बल्कि उन्हें सरकारी बैंकों या ट्रेजरी के सुरक्षित लॉकरों में सीलबंद रखा जाता था। परीक्षा के दिन या उससे कुछ समय पहले ही कड़ी निगरानी में उन्हें केंद्रों तक पहुंचाया जाता था।

कम उम्मीदवार, कम केंद्र और आसान निगरानी

उस समय मेडिकल सीटों की संख्या और परीक्षार्थियों का आंकड़ा आज की तुलना में काफी कम था। इसी कारण परीक्षा केंद्रों की संख्या भी सीमित रहती थी। कम केंद्र होने से प्रशासन के लिए निगरानी और प्रबंधन अपेक्षाकृत आसान हो जाता था। अधिकारियों के लिए प्रत्येक केंद्र पर नियंत्रण बनाए रखना संभव था, जिससे गड़बड़ी की संभावनाएं कम हो जाती थीं।

तकनीक का सीमित दखल भी था एक कारण

उस दौर में सोशल मीडिया और स्मार्टफोन का प्रसार आज जितना व्यापक नहीं था। व्हाट्सएप, टेलीग्राम और अन्य डिजिटल प्लेटफॉर्म परीक्षा व्यवस्था का हिस्सा नहीं थे। ऐसे में किसी भी तरह की जानकारी का तेजी से प्रसार करना मुश्किल था। तकनीकी संसाधनों की सीमित उपलब्धता के कारण संगठित पेपर लीक नेटवर्क या हाई-टेक सॉल्वर गैंग भी उतने सक्रिय नहीं थे जितने आज देखने को मिलते हैं।

क्यों बदली गई व्यवस्था?

छात्रों को कई परीक्षाओं के दबाव से राहत देने और देशभर में मेडिकल प्रवेश प्रक्रिया को एक समान बनाने के उद्देश्य से बाद में NEET को प्रमुख परीक्षा के रूप में लागू किया गया। इसके बाद NTA का गठन हुआ, जिसने राष्ट्रीय स्तर की विभिन्न प्रवेश परीक्षाओं के आयोजन की जिम्मेदारी संभाली। हालांकि परीक्षार्थियों की संख्या और परीक्षा केंद्रों के विस्तार के साथ नई चुनौतियां भी सामने आई हैं, जिनसे निपटने के लिए लगातार सुधार किए जा रहे हैं।

(Photo : AI Generated)